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Thursday 11 December 2008

'आतंकवाद' की नहीं इसे मुद्दा बनाने के प्रयासों की हवा निकली



हाल में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद कहा गया कि 'आतंकवाद' मुद्दे की हवा निकल गई और देश की जनता ने इस मुद्दे को नकार दिया। मैं ऐसा कहने वालों से विपरीत मत रखता हूं क्योंकि आतंकवाद मुद्दे की नहीं बल्कि आतंकवाद को मुद्दा बनाने के प्रयास की हवा निकली है। जनता आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीर है और इसे सियासी हथियार बनाये जाने के खिलाफ है। इसलिए सभी पार्टियों को यह जान लेना चाहिए कि अब वो जमाना गया जब जनता को किसी भी मुद्दे पर बरगलाया जा सकता था। जनता अब जागरूक हो चुकी है। देश और उसके लिए क्या सही है, क्या गलत है, वह सब जानती है।


ऐसा नहीं है कि आतंकवाद पहली बार चुनावी मुद्दा बना था। पिछले लोकसभा चुनावों के समय तत्कालीन विपक्ष ने संसद पर हुए आतंकवादी हमले और कंधार कांड को चुनावी मुद्दा बनाया था। यही नहीं कुछ समय पहले गुजरात विधानसभा चुनावों के समय वहां की विपक्षी पार्टी की ओर से जो चुनावी विज्ञापन दिये गये उनमें भी कंधार कांड, संसद पर आतंकवादी हमला और अक्षरधाम मंदिर पर हमले को मुद्दा बनाया गया था। जनता ने उसके ऐसे प्रयास को नकार दिया।


जहां तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसे फिर से मुद्दा बनाने की बात है, तो इस संदर्भ में सिक्के के दोनों पहलुओं पर गौर करना चाहिए। पहला यह कि जब देश में धड़ाधड़ आतंकवादी हमले और श्रृंखलाबध्द बम विस्फोट हो रहे हों तो चुनावी भाषणों से यह मुद्दा गायब रहे, ऐसा संभव नहीं है। दूसरा पहलू यह है कि राजनीतिक दलों को शायद लगता है कि भावनाओं के सहारे नैया पार लगाई जा सकती है। आतंकवाद के कारण जनमानस उद्वेलित है और उसकी इन भावनाओं का लाभ उठाने का जो प्रयास किया गया उसमें शायद अति हो गई। क्योंकि आतंकवाद, आतंकवाद, आतंकवाद चिल्लाने भर से जनता को यह नहीं लगेगा कि आप उसके प्रति गंभीर हैं। आपने आतंकवाद को खत्म करने के लिए अब तक जो ठोस कदम उठाये या आतंकवाद को रोकने के लिए आपकी क्या रणनीतियां होंगी (जिन्हें सार्वजनिक किया जा सके) आदि जनता को बताइये क्योंकि सिर्फ दोषारोपण से काम नहीं चलने वाला। जब आप ऐसा करेंगे तभी जनता आपकी सुनेगी।


जम्मू-कश्मीर में तो आतंकवाद शुरू से ही चुनावी मुद्दा रहा है और वहां की जनता हर बार किसी अन्य पार्टी को इस आशा के साथ वोट देती है कि वह इसे खत्म करने की दिशा में कदम उठायेगा ताकि अमन-चैन और शांति की बहाली हो सके। लेकिन होता कुछ और है। वहां की पिछली सरकार की हीलिंग टच नीति को ही लीजिये, क्या वह कारगर सिध्द हुई?


आज देश में आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल चुनावी लाभों के लिए किया जाने लगा है। मसलन कुछ समय पहले एक दल की ओर से सरकार पर आरोप लगाया गया कि सरकार ने आर्थिक आतंकवाद फैला रखा है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान एक दल की नेता ने वहां की सरकार पर आतंकवादी होने का आरोप लगा दिया। इसी प्रकार आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए विभिन्न दल कर रहे हैं और जब आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात आत है तो वह एकजुट होने का दिखावा भर कर देते हैं।


आज जरूरत इस बात की है कि आतंकवाद को चुनावी राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाये। इस मुद्दे से निपटने के लिए पार्टी हित से ऊपर उठकर सोचा जाये। जनता को भी चाहिये कि वह आतंकवाद को चुनावी मुद्दा बनने से रोके।


नीरज कुमार दुबे

1 comment:

संजीव कुमार सिन्हा said...

नीरजजी, आपने सामयिक और महत्‍वपूर्ण मुद्दे पर अपने विचार प्रस्‍तुत किए हैं। आपके इस विचार से मैं पूरी तौर पर सहमत हूं कि आतंकवाद मुद्दे की नहीं बल्कि आतंकवाद को मुद्दा बनाने के प्रयास की हवा निकली है। लेकिन आपके इस विचार से मैं असहमत हूं कि आतंकवाद को चुनावी राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाये और जनता को भी चाहिये कि वह आतंकवाद को चुनावी मुद्दा बनने से रोके।सुरक्षा व्‍यवस्‍था के मुद्दे पर संप्रग सरकार पूरी तौर पर विफल साबित हुई है। संप्रग शासन में हुए आतंकवादी घटनाओं में सात हजार लाशों के ढेर लग चुके हैं। देश भर में लोग भय और दहशत के साये में जीने को विवश हो गये हैं। ऐसे में आतंकवाद को क्‍यों नहीं चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्षी दल का कर्तव्‍य है सरकार की विफलताओं को मुद्दा बनाना। चुनाव ही ऐसा समय होता है जब शासक को उसकी गलतियों के लिए सबक सिखा सकें। आज अराजनीतिक नहीं बल्कि राजनीतिक होने की जरूरत हैं।