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Wednesday, 21 November, 2012

कसाब को फांसीः चार साल भले लगे लेकिन जीत भारत की ही हुई

26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की चौथी बरसी के ठीक पहले आतंकवादी अजमल कसाब को दी गई फांसी आतंकवाद को भारत का करारा जवाब तो है ही हमले में मारे गये नागरिकों व सुरक्षाकर्मियों को सच्ची श्रद्धांजलि भी है। कसाब की मौत की खबर निश्चित रूप से मुंबई हमले के प्रभावित परिवारों के जख्मों पर मरहम का काम भी करेगी। कसाब मामले में न्यायिक प्रक्रिया का पूरा पालन कर भारत ने यह दिखा दिया है कि वह अपने दुश्मनों के साथ जनभावनाओं के आधार पर ही फैसला नहीं करता। निचली अदालत की ओर से छह मई 2010 में कसाब को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद से उसे अपने बचाव के लिए उपलब्ध तमाम कानूनी विकल्पों को आजमाने का मौका दिया गया। सरकार ने इस बीच विपक्ष ही नहीं बल्कि जनता की भी आलोचनाओं का खूब सामना किया और उस पर आतंकवाद के खिलाफ नरम रुख रखने के आरोप भी लगे लेकिन भारत की न्यायिक प्रतिष्ठा बरकरार रखने के लिए उसने सब सहा। 26 नवंबर 2012 को भी होने वाले कार्यक्रमों में कसाब को फांसी नहीं दिये जाने पर सरकार की आलोचना की जाती लेकिन अब इन कार्यक्रमों में 'जश्न' होगा।

वैसे कसाब को फांसी पर शीघ्र ही लटकाने के संकेत तो तभी से मिलने लगे थे जब उच्चतम न्यायालय की ओर से भी मौत की सजा को बरकरार रखने के बाद कसाब ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी जिस पर राष्ट्रपति ने तुरंत ही गृह मंत्रालय की राय मांगी। गृह मंत्रालय से भी जल्द ही जवाब आया जिस पर गौर करते हुए राष्ट्रपति ने कसाब की याचिका ठुकरा दी। अब सरकार के सामने रास्ता साफ था और इंतजार था सही समय का। 26 नवंबर की वर्षगांठ और संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले सरकार ने ऐसा दांव चला कि घरेलू और बाहरी विरोधी, सभी चित हो गये। विपक्षी खेमों में सरकार को घेरने के लिए तरह तरह की रणनीति बन रही थीं लेकिन अब सरकार का हौसला बढ़ गया है क्योंकि जन समर्थन उसके साथ है।

कहा जा रहा है कि सरकार चुनावों के लिए कमर कस चुकी है। आर्थिक सुधारों पर तेजी से ध्यान देने के साथ ही घरेलू स्तर पर अपने खिलाफ उठ रहे मुद्दों से भी निपटने का प्रयास किया जा रहा है। गुजरात के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं वहां कांग्रेस अपने लिए अब कुछ ज्यादा लाभ की उम्मीद कर सकती है। 2014 से पहले पहले सरकार का प्रयास रहेगा कि विपक्ष के तरकश में मौजूद सभी तीरों को बेकार कर दिया जाए। कसाब मामले में फैसला लिए जाते समय सरकार के जेहन में अमेरिका का उदाहरण भी रहा होगा कि कैसे 9/11 के साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन को मार गिराने का लाभ बराक ओबामा को राष्ट्रपति पद के लिए दूसरा कार्यकाल हासिल करने के लिए मिला।

कसाब को दो दिन पहले पुणे की यरवदा जेल में जब ले जाया जा रहा था तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि कसाब को फांसी के लिए ले जाया जा रहा है लेकिन पर्दे के पीछे सारी गतिविधियां चल रही थीं। जेल के वरिष्ठ अधिकारियों को भी इस बारे में नहीं पता था और देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और महाराष्ट्र के कुछ आला पुलिस अधिकारी ही इस प्रस्तावित कार्रवाई से वाकिफ थे। पाकिस्तान सरकार को सूचना देने के लिए इस्लामाबाद स्थित भारतीय राजदूत को काम पर लगाया गया था तो वैश्विक स्तर पर सरकार मोर्चा संभाले हुए थी। गौरतलब है कि भारत ने कसाब को फांसी पर लटकाने से ठीक दो दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव का विरोध किया था जिसके तहत मृत्युदंड पर प्रतिबंध की बात कही गयी थी। 110 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था जबकि भारत, अमेरिका और चीन सहित 39 देश इस प्रस्ताव के खिलाफ थे।
निश्चित रूप से यह भारत की जनता के लिए बड़ी खुशी का अवसर है। लेकिन कुछ सवाल अब भी बाकी हैं। संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को अब तक फांसी नहीं दी गई है जिससे कोई बाहरी व्यक्ति या देश यह सवाल उठा सकता है कि अपने यहां के आतंकियों पर भारत जल्द फैसला क्यों नहीं करता। संभव है कश्मीर के हालात बिगड़ने की आशंका के चलते अफजल को फांसी टाली जा रही हो। लेकिन हमें अपनी प्रशासनिक क्षमता और सुरक्षा बलों पर भरोसा होना चाहिए क्योंकि आशंकाओं से सदैव घिरे ही रहे तो आतंकवादियों का हौसला बढ़ता रहेगा।

कसाब को फांसी के साथ ही मुंबई हमला मामले की न्यायिक प्रक्रिया घरेलू स्तर पर तो पूरी हो गयी लेकिन पाकिस्तान की ओर से अब भी उन लोगों को न्याय के कठघरे में लाया जाना बाकी है जो मुंबई हमले के वास्तविक गुनहगार थे। पाकिस्तान भारत की ओर से बार बार सबूत मुहैया कराए जाने के बावजूद उन पर कार्रवाई ना करने के बहाने बनाता रहता है। उम्मीद तो नहीं है कि पाकिस्तान इस मामले में कोई कार्रवाई करेगा लेकिन भारत की ओर से कसाब को फांसी पर लटकाना बेहद सराहनीय कदम है साथ ही भारत ने मुंबई हमला मामले में विश्व को पाक की भूमिका बताने के लिए जो प्रयास किये उसकी भी सराहना की जानी चाहिए।
भारतीयों को इस 'जश्न' को मनाने का मौका देने के लिए हमें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि एक अनुभवी राजनीतिक व्यक्ति ही इस तरह का फैसला ले सकता था। वरना तो पता नहीं कब तक कसाब की याचिका राष्ट्रपति कार्यालय में लंबित अन्य दया याचिकाओं के नीचे दबी ही रहती। काश दिवंगत शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे कुछ दिन और जीवित रहते तो उन्हें एक बड़ी खुशी का अवसर प्राप्त होता साथ ही वह अपनी उस मांग (कसाब को जल्द फांसी देने) को भी पूरा होते देख लेते जोकि उन्होंने प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देते समय उनसे की थी।

भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Monday, 3 September, 2012

'राज' नीतिक आतंकवाद से भी सख्ती से निपटें


हाल ही में अफवाहें फैलाकर पूर्वोत्तर भारत के लोगों को देश के विभिन्न राज्यों से पलायन के लिए मजबूर करने वाली साजिशों के खिलाफ केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों ने तेजी से कार्रवाई की जिससे देश की एकता कायम रह सकी लेकिन दूसरी ओर उत्तर भारतीयों खासकर महाराष्ट्र में रह रहे बिहार के लोगों को स्पष्ट रूप से धमकी दे रहे राज ठाकरे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। राज ठाकरे ठीक उसी तरह 'अलगाववाद' की भावना भड़का रहे हैं जिस तरह हुर्रियत के कट्टरपंथी गुट घाटी में भड़काते हैं। आज जरूरत आतंकवाद के सभी रूपों से लड़ने की है जिनमें राज ठाकरे द्वारा फैलाया जा रहा 'राजनीतिक आतंकवाद' भी शामिल है।
आजकल मुंबई पुलिस के रहनुमा बनने का दिखावा कर रहे राज ने सभी बिहारियों को घुसपैठिया करार देने और उन्हें राज्य से खदेड़ देने की धमकी दी है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा है क्योंकि बिहार के एक युवक की गिरफ्तारी पर बिहार सरकार ने मुंबई पुलिस के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कही थी। राज ठाकरे ने हिंदी न्यूज चैनलों को भी बंद करवा देने की धमकी दी है क्योंकि उनके अनुसार वह उनकी बिहारी विरोधी टिप्पणियों के लिए उन्हें खलनायक की तरह पेश कर रहे हैं। राज ठाकरे के समर्थकों ने शुरुआत के तौर पर भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन कर रहे सिनेमाघरों पर तोड़फोड़ की। संभव है कि इस मामले में इक्का-दुक्का गिरफ्तारी हुई भी हो लेकिन क्या धमकी वाले मामले में राज ठाकरे से पूछताछ और उनके खिलाफ कार्रवाई की गई?

राज ठाकरे जिस अंदाज में 'भड़काऊ' राजनीति कर रहे हैं क्या उस पर लगाम लगाने का माद्दा किसी में नहीं है? आज महाराष्ट्र की कई विपक्षी पार्टियों में से एक एमएनएस का यह नेता यदि विपक्ष में रह कर इस तरह की दादागिरी कर रहा है तो सोचिए यदि उसकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह क्या करेगा? राज ठाकरे उत्तर भारतीय विरोध तक ही सीमित नहीं हैं। राज ने एक टीवी कार्यक्रम में पाकिस्तानी कलाकारों के साथ मंच साझा करने के प्रति सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले को भी चेतावनी दी और उनसे ऐसा नहीं करने को कहा। खबरें हैं कि ऐसी ही चेतावनी माधुरी दीक्षित को भी दी गई है। कुछ समय पहले कुछ विदेशी कलाकारों की एमएनएस कार्यकर्ताओं ने पिटाई भी की थी और फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ कर निर्माताओं से सह-कलाकारों की भूमिका में महाराष्ट्र के लोगों को लेने को कहा था।

राज ठाकरे जिस 'हौसले' के साथ कभी उत्तर भारतीयों के खिलाफ आग उगलते हैं तो कभी बिहारियों के महापर्व 'छठ पूजा' का मजाक उड़ाते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती उससे साफ है कि उन्हें राजनीतिक शह प्राप्त है। आरोप लगते हैं कि यह शह किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस ने उन्हें दी हुई है ताकि वह शिवसेना भाजपा के मतों में विभाजन करा सकें। कांग्रेस जानती है कि राज ठाकरे जितने मजबूत होंगे शिवसेना भाजपा उतने ही कमजोर होंगे। हाल ही में मुंबई पुलिस के प्रमुख को जब राज ने हटाने की मांग की तो दो दिन बाद ही उन्हें हटा दिया गया और कहा गया कि उनके तबादले की योजना पहले से ही थी और राज की मांग से इसका लेना देना नहीं है।

लेकिन हकीकत को बयां करने के लिए और भी वाकये काफी हैं। जब राज उत्तर भारतीयों के खिलाफ आग उगलते हैं तो महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता तो चुप बैठे रहते हैं लेकिन दिल्ली में उत्तरी राज्यों के नेता जरूर इसकी निंदा करते हैं क्योंकि उन्हें वहां पर अपने वोटों की फिक्र है। शिवसेना भी चूंकि मराठी मानुष की ही राजनीति करती है इसलिए उसकी ओर से विरोध का सवाल ही नहीं उठता। राकांपा की ओर से गृह मंत्रालय संभाल रहे आरआर पाटिल राज विरोधी के रूप में पहचाने जाने के कारण उनकी टिप्पणियों पर नाराजगी प्रकट करते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी के अजित पवार जोकि राज्य के उपमुख्यमंत्री भी हैं, वह हिंदी दिवस संबंधी प्रश्न का भी मराठी में जवाब देते हुए कहते हैं कि मैं महाराष्ट्र का नेता हूं और मराठी में ही बोलूंगा। हैरत तो इस बात की होती है कि उत्तर भारत में ही प्रमुखतः जनाधार रखने वाली भाजपा के महाराष्ट्र के नेता भी राज ठाकरे की ओर से उत्तर भारतीयों के खिलाफ विषवमन के दौरान चुप बैठे रहते हैं दिल्ली में एकाध नेताओं से राज के बयानों की आलोचना करवा कर खानापूर्ति कर दी जाती है। दरअसल भाजपा को लगता है कि शिवसेना यदि कमजोर हुई तो राज का सहारा लिया जा सकता है। यदि राज ठाकरे के माध्यम से सभी पार्टियों के नेता राजनीतिक हित नहीं साध रहे हैं तो क्या नितिन गडकरी, पृथ्वीराज चव्हाण राज ठाकरे के बयानों की निंदा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं?

भावनाएं भड़काने के लिए राज ठाकरे के खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले चल रहे हैं लेकिन सरकारी ढि़लाई के चलते ही उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो पा रहे। जब तक राज ठाकरे जैसे व्यक्ति को कड़ी सजा नहीं मिलेगी उनका हौसला बढ़ता जाएगा। जरूरत इस बात की है कि राज ठाकरे के खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई महाराष्ट्र के बाहर की अदालत में की जाए क्योंकि लगता है कि महाराष्ट्र सरकार या तो राज ठाकरे को गिरफ्तार नहीं करवाना चाहती या फिर उनकी संभावित गिरफ्तारी से उनके समर्थकों के भड़क जाने से डरती है। यदि सरकार कड़ा रुख अख्तियार कर ले तो राज ठाकरे और उनके समर्थक चूं भी नहीं कर सकते लेकिन सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की साफ कमी है।

राज ठाकरे वैसे तो बड़े शेर बनते हैं लेकिन जब मुंबई में सबसे बड़ा आतंकवादी हमला '26/11' को अंजाम दिया जा रहा था तब वह और उनके समर्थक हालात संभल जाने तक छिपे ही रहे। तब सीमा पार से आए आतंकवादियों से भिड़ने के लिए एनएसजी की जो टीम दिल्ली से भेजी गई थी उनमें बिहार के लोग भी थे जोकि प्रांतवाद या भाषावाद की भावना नहीं रखते थे। मुंबई और महाराष्ट्र के विकास में उत्तर भारतीयों का भी उतना ही योगदान रहा है जितना कि महाराष्ट्र के लोगों का। आज हिंदी फिल्म उद्योग में राज कर रहे कई प्रमुख अभिनेता, अभिनेत्री मूल रूप से उत्तर भारत के हैं। यही नहीं बॉलीवुड में इधर ऐसे सफल निर्देशकों की बाढ़ आई है जोकि उत्तर भारत खासकर बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उत्तर और दक्षिण भारत की ऐसी सैकड़ों कंपनियां हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में अपनी इकाई स्थापित कर लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराया हुआ है।

बहरहाल, महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय यदि आज आशंकित मन से हैं तो इसका प्रमुख कारण यही है कि उनका नेतृत्व करने वाला कोई प्रमुख नेता नहीं है। उत्तर भारतीयों को वहां सिर्फ वोटर के रूप में ही देखा जाता है। चुनावों के समय भले उन्हें याद किया जाता हो लेकिन उसके बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। हाल ही में जब पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ अफवाहें फैलाई गईं तो पूर्वोत्तर राज्यों के मंत्री कई राज्यों में हालात का जायजा लेने गये लेकिन ऐसा कुछ कभी भी महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर आए संकट के दौरान नहीं देखा जाता। उत्तर भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए मुंबई आना तो भाता है लेकिन अपने राज्य से जुड़े लोगों की सुध वह अपनी राजधानियों में बैठे बैठे बयान जारी कर ही ले लेते हैं।

यह सही है कि राज ठाकरे को आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से अपनी पार्टी का आधार बढ़ाने का पूरा हक है। लेकिन इसके लिए उन्हें सत्ता पक्ष या अन्य विपक्षी दलों को निशाने पर लेना चाहिए। सरकार की कारगुजारियों और एमएनएस के नेतृत्व वाली नगर पालिकाओं के कार्यों की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए। प्रांतवाद या भाषावाद की भावनाएं भड़का कर राजनीतिक हित साधना गलत है।

आज जरूरत इस बात की है कि राज ठाकरे जैसे लोगों की वाणी पर लगाम लगाने में सरकारों की असफलता को देख कर अदालतों को स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ा फैसला सुनाना चाहिए क्योंकि बात सिर्फ बिहारियों की नहीं बल्कि भारत के एक राज्य के लोगों के प्रति दूसरे राज्य के लोगों के मन में भावनाएं भड़काने का है। आज जो व्यक्ति प्रांत और भाषा के नाम पर लोगों को भड़का रहा है कल को वह धर्म और जाति के नाम पर भी लोगों को भड़का सकता है। चुनाव आयोग को भी चाहिए कि वह राजनेताओं के विवादित बयानों पर चुनावों के समय ही नोटिस नहीं भेजे बल्कि किसी भी समय दिये गये नेताओं के विवादित बयानों पर विचार कर कड़ी कार्रवाई करे। यदि राज जैसे लोगों के बढ़ते हौसले पर लगाम नहीं लगाई गई तो कल को विभिन्न राज्यों में उनके जैसे लोग खड़े हो सकते हैं और फिर 'अनेकता में एकता' की हमारी विशिष्ट पहचान खतरे में पड़ सकती है।

भारत माता की जय
नीरज कुमार दुबे
 

Monday, 25 June, 2012

अबू हमजा की गिरफ्तारी भारत की बड़ी कामयाबी


मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के प्रमुख आरोपी और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी सैयद जबीउद्दीन उर्फ रियासत अली उर्फ अबू हमजा का सुरक्षा एजेंसियों के हत्थे चढ़ना एक बड़ी कामयाबी है। उम्मीद है कि एक बार फिर दुनिया जानेगी कि किस प्रकार पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ आतंकवाद की साजिशें बनाई जाती हैं और उन्हें अंजाम देने के लिए क्या क्या यत्न किये जाते हैं। भारत पाकिस्तान से 26/11 के दोषियों को सजा देने की समय समय पर मांग करता रहा है लेकिन पाकिस्तान की इसमें कभी रूचि रही ही नहीं। मुंबई आए दस हमलावरों में से 9 को तो भारतीय सुरक्षा बलों ने सजा दे दी और एक अभी सजा पर अमल होने के इंतजार में है लेकिन हमले के साजिशकर्ताओं में शामिल रहे लोगों में से कोई पहली बार भारतीय कानून के शिकंजे में आया है। वैसे तो इस हमले के अन्य साजिशकर्ता डेविड हेडली और तहाव्वुर हुसैन राणा भी इस समय गिरफ्त में हैं लेकिन अमेरिका की।

यह बात जांच एजेंसियों ने भी साबित की और बाद में आतंकवादी अजमल कसाब ने भी अदालत में स्वीकार की कि 26 नवंबर 2008 को जो 10 फिदायीन आतंकवादी मुम्बई आए थे, उन्हें पाकिस्तान में जिन लोगों ने प्रशिक्षण दिया था उनमें से एक नाम अबू हमजा भी था जिसने दसों आतंकवादियों को अन्य चीजों के अलावा हिन्दी बोलना भी सिखाया था। डेविड हेडली से पूछताछ के दौरान भी हमजा का नाम सामने आया था।
लश्कर में अबू का मतलब होता है सेनापति और यहां सारे अबू का जो सरदार होता है, उसे अबू हमजा कहा जाता है। मूलत: अबू हमजा फिदायीन दस्ते का लीडर होता है। इस लिहाज से देखें तो अबू हमजा का काबू में आना यकीनन बहुत बड़ी बात है। रिपोर्टों की मानें तो लश्कर में आतंकवादियों को अबू उर्फ नाम बड़ी मुश्किल से मिलता है। इस लिहाज से देखें तो मुंबई पर हमला करने आए दस आतंकवादी लश्कर के लिए बहुत महत्व रखते थे क्योंकि जो 10 आतंकवादी मुम्बई आए थे, उनमें से ज्यादातर के उर्फ नाम का पहला शब्द अबू ही था। मसलन अजमल कसाब का उर्फ नाम अबू मजाहिद है, जबकि उसके साथ सीएसटी में गोलीबारी करने वाले इस्माइल खान का उर्फ नाम था अबू इस्माइल। ताज होटल में जो 4 आतंकवादी घुसे थे, उनमें से भी 2 के उर्फ नाम के पहले अबू ही जुड़ा था। ये दो आतंकवादी थे अबू अली और अबू उमेर। अबू अली का मूल नाम जावेद था, जबकि अबू उमेर का नजीर।

26/11 के दोषी इस आतंकवादी के 26 नाम बताये जाते हैं। महाराष्ट्र के रहने वाले अबू राज्य के सभी इलाकों के बारे में अच्छी जानकारी रखता है तभी तो वह पाकिस्तान में अपने आकाओं के साथ टीवी पर पूरे ऑपरेशन को देखकर बीच-बीच में कसाब और उसके साथियों को हिंदी में निर्देश दे रहा था। 26/11 हमले के अलावा अबू हमजा की कई और आतंकवादी वारदातों में तलाश थी। फरवरी 2010 में पुणे की जर्मन बेकरी में हुए ब्लास्ट में भी वो आरोपी है। इस धमाके में 11 लोग मारे गए थे और 59 लोग घायल हुए थे। सितंबर 2010 में दिल्ली की जामा मस्जिद के पास बम प्लांट करने के मामले में भी उसका नाम आया था। मई 2006 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 10 एके 47 राइफलें बरामद हुईं थी, हमजा का नाम इस मामले में भी आया था।

अबू हमजा नाम से केवल एक ही आतंकी हो ऐसा भी नहीं है। पिछली कुछ खबरों पर गौर करें तो देखने को मिलता है कि लश्कर ने यह नाम कइयों को दिया हुआ है। जब संसद पर हमला हुआ था, तो उस वक्त भी एक अबू हमजा का नाम सामने आया था। वह अबू हमजा संसद के बाहर खड़े सुरक्षाकर्मियों के हाथों एनकाउंटर में मारा गया था। कुछ साल पहले एक अबू हमजा ठाणे पुलिस द्वारा भी पकड़ा गया था। यह अबू हमजा जम्मू-कश्मीर में हुई कई वारदातों में शामिल था, इसलिए ठाणे पुलिस ने उसे जम्मू-कश्मीर पुलिस को सौंप दिया था जिसकी हिरासत से वह भाग गया।

जय हिंद, जय हिंदी
नीरज कुमार दुबे

Wednesday, 4 April, 2012

हाफिज सईद पर इनामः एक तीर से कई निशाने


लश्कर-ए-तय्यबा के संस्थापक हाफिज सईद के सिर पर अमेरिका की ओर से एक करोड़ डालर का इनाम घोषित करने के कदम से भारत को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अमेरिका भले यह कह रहा हो कि यह इनाम मुख्य रूप से 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले में सइर्द की भूमिका के लिए रखा गया है और वह उसे सजा मिलते देखना चाहता है, लेकिन असलियत यह है कि अमेरिका ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि सईद और उसके आतंकी संगठन पाकिस्तान पर अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में नाटो के लिए सप्लाई मार्ग खोले जाने की राह में रोड़ा बने हुए हैं।

यदि अमेरिका को मुंबई हमले का इतना ही दर्द है तो उस घटना के लगभग तीन साल बाद उसे साजिशकर्ताओं को सबक सिखाने की सुध क्यों आई? अमेरिका ने जो इनाम घोषित किया है उसकी टाइमिंग देखने से तो यही प्रतीत होता है कि उसने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक तो इससे पाकिस्तान सरकार पर दबाव बनेगा दूसरा भारत की सरकार अमेरिका के इस कदम से खुश हो जाएगी तथा अमेरिकी कंपनियों को भारत से और ठेके या फिर लाभ के करार करने के अवसर मिलेंगे। दूसरा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव भी आसन्न हैं, इस कदम के पीछे घरेलू राजनीतिक कारण ही ज्यादा नजर आ रहे हैं ताकि राष्ट्रपति बराक ओबामा के विरोधियों को यह कहने का मौका नहीं मिले कि अफगानिस्तान में अमेरिका नीत नाटो सेना की बुनियादी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

यह बात सब जानते हैं कि ओसामा बिन लादेन को ढूंढने में अमेरिका को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी, उसने अपनी खुफिया एजेंसियों और उपग्रहों के जरिए वर्षों बाद आखिरकार उसे ढूंढ निकाला था। लगभग ऐसी ही मेहनत अमेरिकी बलों ने सद्दाम हुसैन को ढूंढने में भी की थी लेकिन हाफिज सईद तो वर्षों से सबके सामने है। अमेरिकी न्यूज चैनलों और खबरिया वेबसाइटों पर न जाने कितनी बार उसकी रैलियों और भाषणों की खबरें प्रसारित, प्रकाशित हुई हैं। खुद पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी राजदूत और अन्य राजनयिक सईद की गतिविधियों से नित रूबरू होते रहते होंगे। सीआईए जैसी खुफिया एजेंसी भी यह न जानती हो कि सईद कहां पर है, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। अमेरिका यदि चाहे तो सईद का भी वही अंजाम हो सकता है जोकि ओसामा का हुआ क्योंकि अमेरिकी कानून इस बात की इजाजत देते हैं कि देश के दुश्मन को कहीं भी मार गिराने का अधिकार सुरक्षा बलों को है। यदि अमेरिका सचमुच सईद को आतंकवाद का सरगना मानता है तो इनाम घोषित करने की बजाय उस पर सीधे कार्रवाई ही करनी चाहिए थी। इनाम तो उस पर घोषित किया जाता है जिसका कोई अता पता न हो दूसरी ओर सईद खुलेआम अमेरिका को कार्रवाई की चुनौती देते हुए कह रहा है कि हम गुफा में छिप कर नहीं बैठे।

बहरहाल, अब जब इनाम घोषित कर ही दिया गया है तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया जाना चाहिए और सईद को गिरफ्तार करना चाहिए। लेकिन लगता है सारा मामला कागजी प्रक्रियाओं में ही उलझ कर रह जाने वाला है क्योंकि पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक का कहना है, ‘‘मुझे मीडिया से जानकारी मिली कि उसके सर पर इनाम रखा गया है। हमें अमेरिका से या किसी अन्य राजनयिक माध्यम से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। इस विषय पर हमें मीडिया से जानकारी प्राप्त हुई है।‘‘ यह सच है कि पाकिस्तान सरकार किसी भी हालत में सईद को अमेरिका को नहीं सौंपेगी क्योंकि वह जानती है कि उसके द्वारा बनाये गये संगठनों का देश में व्यापक आधार है और देशभर में अमेरिका के खिलाफ माहौल के बीच सईद के खिलाफ कार्रवाई से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।

यह बात सभी जानते हैं कि सईद को सरकार की ओर से पूरी शह मिलती रही है और उसके द्वारा प्रदान किये गये सुरक्षाकर्मी भी दिन रात सईद की सुरक्षा में लगे रहते हैं। सईद 2008 के मुंबई हमलों के आलोक में हल्का झटका खाने के बाद पाकिस्तान की जिहादी राजनीति में फिर से अहम किरदार बनकर उभरा है। अमेरिका ने उसका नाम दुनिया के पांच सबसे वांछित आतंकवादियों की सूची में भले अब डाला हो लेकिन भारत के लिए वह पांच सबसे वांछितों की सूची में बहुत पहले से रहा है। मुंबई आतंकी हमलों के बाद पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दबाव में सईद को नजरबंद किया गया था लेकिन पिछले साल इस आतंकी ने जोरदार वापसी की और डेफा ए पाकिस्तान परिषद (डीपीसी) नामक छद्म संगठन के तहत 40 कट्टर और चरमपंथी संगठनों को एक किया। पिछले साल नवंबर में नाटो के एक हवाई हमले में 24 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने के बाद अमेरिका विरोधी भावनाओं को भुनाते हुए डीपीसी ने पूरे देश में बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित की हैं। डीपीसी में कुख्यात प्रतिबंधित संगठन सिपाह ए सहाबा भी शामिल है। इन सभी आयोजनों में सईद जैसे आतंकियों ने अमेरिका और भारत को निशाना बनाते हुए जिहाद का नारा बुलंद किया।

मुंबई हमलों के बाद एक साल से ज्यादा समय तक सईद ने अपनी गतिविधियां कम रखीं और कुछ समय तक अधिकारियों ने उसके रैलियों में भाग लेने पर रोक लगा दी। हालांकि 2011 में उसने सार्वजनिक मंचों पर कदम रखा और पिछले साल 11 अप्रैल को कश्मीरी नेता मौलवी शौकत अहमद शाह के जनाजे में शामिल हुआ। इसके बाद, सईद ने सार्वजनिक बैठकों में पीएमएल-एन अध्यक्ष रजा जफरूल हक और पूर्व विदेश मंत्री जैसे शीर्ष राजनीतिकों के साथ मंच साक्षा किया। सईद की इन राजनीतिकों के साथ मेलजोल राजनीतक पार्टियों की ओर से उसकी स्वीकार्यता को दिखाता है। जमात.उद.दावा का पाकिस्तान भर में बहुत बड़ा नेटवर्क है और 2005 के भूकंप, 2010 के बाढ़ के बाद राहत अभियान चलाकर उसने लोगों के बीच अपनी अच्छी साख बनाने की कोशिश भी की।

बहरहाल, अब यह साफ है कि हाफिज सईद को सबसे वांछित व्यक्तियों की सूची में रखने का समय संदिग्ध है क्योंकि पाकिस्तान अमेरिकी संबंध अभी बदतर स्थिति में हैं। यह पाकिस्तानी सेना पर दबाव डालने का अमेरिकी रास्ता हो सकता है। अब वाकई बड़ी हास्यास्पद स्थिति है कि इस तथ्य के बावजूद सईद के सर पर इनामी राशि रखी गई है कि वह खुलेआम पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में सार्वजनिक रैलियां करता है।

जय हिंद, जय हिंदी
नीरज कुमार दुबे

Monday, 16 January, 2012

दिग्विजय जी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी

26 जनवरी 2009 को गणतंत्र दिवस पर राज पथ पर उपस्थित जनों को रक्षा मंत्रालय की ओर से प्रकाशित जो पत्रिका दी जा रही थी उसमें देश के महत्वपूर्ण वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित होने वाले लोगों के बारे में जानकारी दी गयी थी। पत्रिका में मोहन चन्द शर्मा के बारे में लिखा गया था-

''श्री मोहन चन्द शर्मा, इन्सपेक्टर, दिल्ली पुलिस को 19 सितम्बर 2008 को एक खास सूचना मिली कि दिल्ली श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के संबंध में वांछित एक संदिग्ध व्यक्ति जामिया नगर, दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में स्थित बटला हाउस के एक फ्लैट में छिपा हुआ है। श्री शर्मा सात सदस्यीय दल का नेतृत्व करते हुये तुरंत उस फ्लैट पर पहुंचे। ज्यों ही उन्होंने फ्लैट में अन्य दरवाजे से प्रवेश किया, उनको फ्लैट के अंदर छुपे हुये आतंकवादियों की ओर से गोलीबारी का पहली बौछार लगी। निभ्रीकता के साथ उन्होंने गोलीबारी का जवाब दिया। इस प्रकार शुरू हुई दोनों तरफ की गोलीबारी में दो आतंकवादी मारे गये तथा एक पकड़ा गया। श्री मोहन चन्द शर्मा ने आतंकवादियों से लड़ते हुये अनुकरणीय साहस और कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।''

अब दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के उस बयान को देखें जिसमें वह इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए इसकी न्यायिक जांच की मांग की रट लगाये हुए हैं। यहां सवाल यह उठता है कि राष्ट्रपति की ओर से गणतंत्र दिवस पर जिस व्यक्ति को मरणोपरांत सम्मानित किया जा रहा हो और जिसकी वीरगाथा के ब्यौरे वाली सरकारी पत्रिका राज पथ पर वितरित की गयी हो, उसके अंशों पर यकीन किया जाए या फिर दिग्विजय सिंह जैसे बयानबाजी करने वाले नेता की बातों पर? सियासत के लिए नेता शहादत के महत्व को कैसे कम कर देते हैं इसकी मिसाल सिर्फ मोहन चन्द शर्मा के मामले में ही देखने को नहीं मिलती बल्कि दिग्विजय ने तो मुंबई हमले में मारे गये एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर भी अप्रत्यक्ष रूप से यह कहते हुए सवाल उठा दिया था कि वह मालेगांव धमाके की जांच के चलते कथित रूप से भगवा खेमे के निशाने पर थे। जबकि सच्चाई यह है कि करकरे आतंकवादियों की गोलीबारी में शहीद हुए थे।

दरअसल, दिग्विजय ने बटला मुठभेड़ मामले को ‘बोतल में बंद जिन्न’ के रूप में रखा हुआ है। जब कभी उन्हें जरूरत पड़ती है तो वह बोतल का ढक्कन खोल देते हैं। इस बार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यकों के मत अपनी पार्टी को दिलाने के प्रयास में इस जिन्न को बाहर निकाला। जिन्न ने भी बाहर आते ही एक दूसरे को भिड़ाने का काम शुरू कर दिया है। दिग्विजय ने जब मुठभेड़ को एक बार फिर फर्जी बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इस मामले की न्यायिक जांच के पक्षधर नहीं थे तो तुरंत ही गृह मंत्री ने इस दावे का खंडन करते हुए मुठभेड़ को ‘असली’ करार दिया। प्रदेश में सरकार बनाने की दौड़ में अपने को आगे मान रही समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां ने इस मामले में दिल्ली की शीला सरकार को घेरते हुए मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमे और उन्हें जेल भेजने की मांग की तो भाजपा ने पूरे मामले पर श्वेतपत्र की तथा प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की प्रतिक्रिया की मांग की है। कुछ छुटभैये नेताओं को भी यह मामला अनुकूल लगा तो दिल्ली में चुनाव लड़ने के इच्छुक एक शख्स ने रातोंरात लोकप्रिय होने की चाहत में बटला मुठभेड़ पर योगगुरु स्वामी रामदेव की टिप्पणी से नारज होकर उन पर कालिख फेंक दी।

कांग्रेस पर पहले भी तुष्टिकरण की नीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन हाल ही में पार्टी का ‘दोमुंहापन’ तब देखने को मिला जब केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने पर मुसलमानों को पिछड़े वर्ग के कोटे से 9 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता ने इसे उनका निजी विचार करार दिया। दिग्विजय ने बटला मुठभेड़ की असलियत पर सवाल उठाये तो गृह मंत्री ने मुठभेड़ को असली करार दिया। यदि यह ‘दोमुहांपन’ सिर्फ वोटों की ही खातिर है तो इसे काफी खतरनाक कहा जाएगा क्योंकि यह आतंकवादी ताकतों के आगे समर्पण करना ही माना जाएगा। उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी कांग्रेस को वह उदाहरण याद रखना चाहिए जिसमें भाजपा को विभिन्न चुनावों में अफजल को फांसी और आतंकवाद को मुद्दा बनाने का नतीजा भुगतना पड़ा।

दिग्विजय जोकि पूर्व में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामाजी’ कह कर संबोधित कर चुके हैं, वह अल्पसंख्यकों के हित में जो कदम उठाना चाहते हैं वह सही भले हो लेकिन उस कदम को उठाने का तरीका कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जनता यह जानना चाहती है कि जिस बटला मुठभेड़ को सरकार के अलावा तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने असली बताया हो और अदालतों ने जिसकी जांच की मांग खारिज कर दी हो, उसके ‘फर्जी’ होने की बात दिग्विजय आखिर किस विशेषज्ञता के आधार पर कह रहे हैं?

जय हिंद, जय हिंदी

नीरज कुमार दुबे