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Tuesday, 8 December, 2009

हेडली पर आरोप तय होना बड़ी कामयाबी


अमेरिकी अदालत द्वारा पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक और लश्कर-ए-तैयबा के संदिग्ध आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली के खिलाफ मुंबई हमलों की साजिश में शामिल होने का आरोप तय करना भारत के लिए एक बड़ी कामयाबी है। इसके अलावा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत को पहली बार अमेरिका से सही मदद मिलती दिख रही है क्योंकि हेडली-राणा मामले में चल रही जांच के नतीजे साझा करने के लिए एफबीआई का एक दल भारत आया हुआ है। यह भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान उनके समक्ष जताई गई मामले में करीबी सहयोग करने की राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रतिबध्दता दर्शाता है। गौरतलब है कि ओबामा ने वादा किया था कि एफबीआई की जांच के नतीजों को साझा करने में अमेरिका पूरा समर्थन देगा।

मुंबई हमला मामले में पाकिस्तान की अदालतों ने तो एक साल बाद भी अनमना सा रवैया अपनाया हुआ है जबकि अमेरिकी अदालत ने अक्तूबर में गिरफ्तार किए गए हेडली पर आरोप भी तय कर दिए हैं। सोमवार को शिकागो की एक अदालत ने हेडली पर मुम्बई हमलों की साजिश में शामिल होने और उसके तथा लश्कर एवं हरकत-उल-जेहाद इस्लामी (हूजी) के बीच सम्पर्क स्थापित करवाने वाले पाकिस्तानी सेना के मेजर से सम्बन्ध रखने का आरोप तय किया। शिकागो में फेडरल कोर्ट में दायर आरोपपत्र में कहा गया कि हेडली ने मुम्बई में हमलों से पहले दो साल से ज्यादा वक्त तक अपने लक्ष्यों की सघन रेकी की थी। उसने सितम्बर 2006, फरवरी तथा सितम्बर 2007, अप्रैल एवं जुलाई 2008 में मुम्बई की पांच बार यात्रा की थी। इस दौरान उसने हमलों का निशाना बनाए जाने वाले लक्ष्यों की फोटो और वीडियो तस्वीरें ली थीं। हेडली के खिलाफ आपराधिक सूचना, भारत में सार्वजनिक स्थानों पर बम विस्फोट करने की योजना बनाने, भारत तथा डेनमार्क में लोगों की हत्या करने और हड़कंप मचाने, विदेशी आतंकवादी साजिशों में साजोसामान संबंधी सहयोग करने, लश्कर-ए-तैयबा को भी ऐसी ही मदद करने तथा भारत में अमेरिकी नागरिकों की हत्या करने के आरोप तय किए गए हैं। इलिनाय के अमेरिकी अटार्नी पैट्रिक जे। फिट्जगेराल्ड और फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआई) के शिकागो कार्यालय के स्पेशल एजेंट इंचार्ज ने आरोपों की घोषणा की।

हेडली और उसके एक अन्य सहयोगी तहव्वुर हुसैन राणा को लश्कर की शह पर भारत में हमले करने और डेनमार्क के एक अखबार को निशाना बनाने की साजिश रचने के आरोप में अक्तूबर में एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया था। मेजर रहमान का नाम पहले इस मामले में शामिल नहीं था लेकिन राणा और हेडली के खिलाफ आरोपों की शुरुआती जांच में रहमान का नाम भी सामने आया। रहमान ने हेडली तथा उससे जुड़े अन्य लोगों के बीच बातचीत करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। हेडली पर लगाए गए आरोपों के मुताबिक उसने 15 फरवरी 2006 को फिलाडेल्फिया में अपना नाम दाउद गिलानी से बदलकर डेविड कोलमैन हेडली रख लिया था। उसने ऐसा इसलिए किया ताकि भारत में घुसने में आसानी हो और इस प्रयास में वह न तो मुस्लिम और न ही पाकिस्तानी नागरिक लगे। आरोप के मुताबिक सितम्बर 2006 से जुलाई 2008 के बीच हेडली ने जितनी बार भारत की यात्रा की, वह लौटकर पाकिस्तान ही गया और वहां अपने सह-षडयंत्रकारियों से मिलकर उन्हें हमलों का निशाना बनाए जाने वाले स्थानों के फोटो और वीडियो दिखाए। आरोपों में कहा गया है कि मार्च 2008 में हेडली और उनके सह-षडयंत्रकारियों ने हमलावरों के दल के मुम्बई में समुद्र के रास्ते दाखिल होने के सम्भावित स्थलों के बारे में बातचीत की थी। हेडली को निर्देश दिए गए थे कि वह मुम्बई में बंदरगाह के अंदर और उसके आसपास नौकाएं लाए तथा वह सर्विलांस वीडियो अपने साथ रखे जो उसने अप्रैल 2008 में भारत यात्रा के दौरान बनाया था।

बहरहाल, आरोप तय होने के बाद अब उम्मीद है कि अमेरिकी अदालत जल्द से जल्द इस मामले की सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुनाएगी। अमेरिका इस संबंध में भारत को जो सूचनाएं मुहैया करा रहा है, उस पर मीडिया की खबरों के अनुसार भारतीय सुरक्षा एजेंसियां त्वरित कदम उठा रही हैं। दोनों देशों के बीच जारी इस सहयोग ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत किया है। आपसी विश्वास को बढ़ाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। एफबीआई प्रमुख राबर्ट एस मुलर का यह कहना कि एफबीआई अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से साझीदारी बढ़ाने की दिशा में काम जारी रखेगी, बहुत सकारात्मक बयान है इससे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों के नेटवर्क का पता लगाने और उनसे निपटने में आसानी होगी। हेडली का मामला आतंकवाद से लड़ाई में वैश्विक सहयोग की जरूरत दर्शाता है, इस बात को ध्यान में रख कर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को तेज किया जाना चाहिए।

भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 26 November, 2009

26/11: एक वर्ष बाद भी जख्म हैं ताजा

मुंबई पर आतंकवादी हमले को हुए आज एक वर्ष भले हो गया हो लेकिन उस दौरान जो जख्म मिले वह अब तक भरे नहीं हैं। क्योंकि इस हमले के मुख्य षडयंत्रकर्ता अभी भी कानूनी पकड़ से दूर सीमा पार बैठे हैं। यही नहीं जैसा कि प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों कहा, उन्हें मिल रही खुफिया सूचनाओं के मुताबिक पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन भारत पर 26/11 जैसे हमले की साजिश रच रहे हैं। वह तो भला हो एफबीआई का जिसने भारत पर से एक बड़ा खतरा तब टाल दिया जब उसने डेविड कोलमन हेडली और तहाव्वुर हसन राणा को गिरफ्तार कर खुलासा किया कि यह दोनों लश्कर-ए-तैयबा के निर्देश पर भारत और डेनमार्क में आतंकवादी हमले करने की साजिश रच रहे थे। हेडली और राणा से पूछताछ से जो खुलासे हुए हैं उन्होंने कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये हैं। सवाल यह है कि हमारा खुफिया तंत्र मुंबई हमले के बाद एक बार फिर क्यों विफल रहा जब वह हेडली और राणा के भारत दौरे के उद्देश्यों को नहीं जान पाया।

26/11 और उससे पहले जयपुर, अहमदाबाद, दिल्ली, असम आदि राज्यों में जो बम विस्फोटों की घटनाएं हुईं, उसने केन्द्रीय गृहमंत्री के कामकाज पर सवालिया निशान लगाया तो शिवराज पाटिल की इस पद से विदाई हुई और उसके बाद पी। चिदंबरम इस पद पर आए। यह सही है कि चिदंबरम ने एक प्रोफेशनल की भांति अपने मंत्रालय पर ध्यान दिया और देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। चिदंबरम की पहलों का भी इसमें योगदान कहा जाएगा कि 26/11 के बाद देश पर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ लेकिन चिदंबरम लगता है कि सिर्फ आतंकवाद पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए हुए हैं देश में पनप रहे नक्सलवाद/माओवाद के प्रति उनके बयानों में ही गंभीरता दिखती है। कभी तो वह इनके खिलाफ कार्रवाई की बात कहते हैं तो कभी बयान देते हैं कि केन्द्र उनके खिलाफ कोई अभियान नहीं चला रहा। आतंकवाद या किसी ऐसी ही अन्य बुराई से लड़ने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है इसमें राजनीति नहीं आड़े आने देनी चाहिए।

समय आ गया है जब आतंकवाद के खिलाफ बयान और साझा घोषणापत्र जारी करने से आगे बढ़ा जाए। वैसे आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना सिर्फ सरकार का ही काम नहीं है, इस पर यदि विजय पानी है तो हम सभी को अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहना चाहिए। आइए आज सबसे पहले उन निर्दोष लोगों की आत्माओं की शांति के लिए प्रभु से प्रार्थना करें जिन्होंने मुंबई हमले के दौरान अपनी जान गंवाई। साथ ही हम यह भी प्रण्ा लें कि आतंकवाद के खिलाफ हम सभी एक रहेंगे, इसमें कोई राजनीति आड़े नहीं आने दी जाएगी, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हमारे बीच कोई मतभेद नहीं रहेगा, जब कभी देश पर बुरी नजर उठाने की कोशिश की गई तो सुरक्षा बलों समेत आम जन उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे। भारत माता की जय।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 7 August, 2009

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी सफलता


अमेरिकी ड्रोन के मिसाइल हमले में पाकिस्तान के सर्वाधिक वांछित आतंकवादी बैतुल्ला महसूद का मारा जाना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी जीत है। महसूद के मारे जाने से पाक तालिबान तालिबान सदस्य अपनी गतिविधियों को स्थगित करने पर मजबूर होंगे। यह जीत मुख्य रूप से अमेरिका की है और उसने अपने उस रुख को सही साबित किया है जिसमें उसने पाक के कबायली क्षेत्रों में आतंकवाद के खिलाफ अभियान की कमान पाक के हाथों में देने से मना कर दिया था।

बैतुल्ला का मारा जाना कितनी बड़ी कामयाबी है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि अमेरिका ने उस पर 50 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम रख रखा था। पाकिस्तान सरकार ने भी महसूद के मारे जाने पर 615000 डॉलर के इनाम की घोषणा की थी। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या और पाकिस्तान भर में कई आत्मघाती हमलों की साजिश रचने के आरोपी तहरीक-ए-तालिबान प्रमुख महसूद की मौत से राहत भले पाकिस्तान और अमेरिका को मिली हो लेकिन आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में यह घटना मील का पत्थर है।

दूसरी ओर भारत में मुंबई महानगर में छह साल पहले गेटवे आफ इंडिया तथा जावेरी बाजार में दो विस्फोट करने के आरोप में एक दंपत्ति सहित लश्कर-ए-तैयबा के तीन सदस्यों को मौत की सजा सुनाया जाना भी सराहनीय कदम है। गौरतलब है कि इन विस्फोटों में 52 लोग मारे गए और 244 अन्य घायल हुए थे। अदालत का यह फैसला आतंकवाद में शामिल लोगों के लिए एक संदेश है कि यदि वे बर्बर काम करेंगे तो कानून उन्हें नहीं बख्शेगा।

इस बीच, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की पुलिस ने भी आतंकवाद के खिलाफ एक सफलता हासिल करते हुए हिज्बुल मुजाहिदीन के दो आतंकवादियों को पकड़ा है जोकि पुलिस के अनुसार पाकिस्तान में प्रशिक्षित कर यहां हमले करने के लिए भेजे गये थे। पुलिस के अनुसार, इन दोनों ने स्वीकार किया है कि इनके तार पाकिस्तान स्थित आतंकवादी गुटों से जुड़े हुए हैं।

आतंकवाद के खिलाफ यह सभी सफलताएं दर्शाती हैं कि लड़ाई बिल्कुल सही दिशा में नहीं तो कमोबेश सही दिशा की ओर बढ़ती हुई लग रही है। आतंकवाद के खिलाफ हो रहे वैश्विक प्रयासों के लिए बधाई। आतंकवाद रूपी राक्षस का खात्मा करके ही कलयुग से सतयुग में प्रवेश किया जा सकता है लेकिन इसके लिए जबरदस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

नीरज कुमार दुबे

Monday, 13 July, 2009

भारत के लिए तालिबान-से बनते जा रहे हैं नक्सली


देश के कुछ भागों में नक्सली जिस तरह से तांडव मचा रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई में जिस तरह सरकार लाचार नजर आ रही है उससे यही लग रहा है वह दिन जल्द आ सकता है जब देश के सामने वैसी ही स्थिति होगी जैसी कि तालिबान ने पाकिस्तान में कर रखी है। नक्सलियों को भारत के तालिबान और भारत के तालिबान को 'जालिमान' कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि दोनों ने कत्लेआम मचाया हुआ है। भले ही इसके पीछे उनके जो भी तर्क हों लेकिन हिंसा के आगे वह सभी खारिज हो जाते हैं। नक्सलियों ने हालिया वारदात छत्ताीसगढ़ में की। वहां के राजनांदगांव जिले में नक्सलियों ने पुलिस अधीक्षक समेत 30 जवानों की हत्या कर एक बार फिर राज्य में अपनी मजबूत स्थिति का अहसास कराया। नक्सलियों ने अब तक के सबसे बड़े हमले में पहली बार किसी पुलिस अधीक्षक की हत्या की है। वहीं राज्य में नक्सलियों ने पिछले साढ़े चार सालों में लगभग 1300 लोगों की हत्या की है जिसमें पुलिसकर्मी, विशेष पुलिस अधिकारी और आम नागरिक शामिल हैं। छत्ताीसगढ़ के वन्य क्षेत्रों में करीब तीन दशक पहले शुरू हुआ नक्सलियों का आंदोलन आज इस राज्य के लिए नासूर बन गया है। नक्सलियों के लगातार बढ़ते हमले और इसमें मरने वाले पुलिस जवानों और आम आदमी की संख्या से राज्य में नक्सल समस्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। राज्य में पिछले साढ़े चार सालों में नक्सलियों ने जमकर उत्पात मचाया है और इस समस्या के कारण 1296 पुलिसकर्मियों, विशेष पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों की मृत्यु हुई है। इस आंकड़े में मारे गए गोपनीय सैनिक या सरकारी कर्मचारी शामिल नहीं हैं।

इससे पहले माओवादियों और नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल के लालगढ़ पर कब्जा कर एक तरह से प्रशासन को चुनौती दी थी। वहां मामला चूंकि राजनीति से जुड़ा था इसलिए इस पर फौरी कार्रवाई हुई। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा को घेरने के लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते इसलिए जब राज्य सरकार ने इस मामले में ढिलाई बरती तो केंद्र ने सख्ती दिखाई और उसके आदेश पर राज्य सरकार को माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई को विवश होना ही पड़ा। आखिरकार सुरक्षाबलों ने लालगढ़ को मुक्त करा लिया। इसके अलावा लोकसभा चुनावों के दौरान झारखंड, आंध्र प्रदेश, छत्ताीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार में नक्सलियों ने खूब कहर बरपाया। चुनावों के दौरान जो हिंसा कभी बूथ लुटेरे करते थे वह अब नक्सली करने लगे हैं।

कई बार खबरों में यह देखने-सुनने को मिलता रहा है कि नक्सलियों के साथ नेताओं के संबंध हैं और उनका राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता रहा है। ऐसे में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के परिणामों को लेकर संशय होना लाजिमी है। नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर केंद्रीय स्तर पर रणनीति बनाई जानी चाहिए जिसमें नक्सल प्रभावित राज्यों को विश्वास में लेकर संयुक्त कार्रवाई की जाए तो परिणाम अच्छे निकल सकते हैं। लेकिन देखना यह है कि सरकार इस समस्या की ओर गंभीर कब होती है?

बहरहाल, छत्ताीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हुए सभी पुलिसकर्मियों को श्रध्दांजलि अर्पित करते हुए भगवान से कामना करता हूं कि उनके परिजनों को इतना बल प्रदान करे कि वह इस अपार दु:ख को सहन कर सकें और उनके जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आए।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 1 May, 2009

चलो माना तो सही, लेकिन अब कुछ करोगे भी क्या?


आखिरकार अमेरिका ने आज मान ही लिया कि भारत विश्व के सर्वाधिक आतंकवाद प्रभावित देशों में से एक है। हालांकि इसके साथ ही अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अभियान की धीमी प्रक्रिया पर भी चिंता जताई है और यह भी कहा है कि भारत में हुए आतंकी हमले और ऐसी ही अन्य घटनाएं बताती हैं कि आतंकी चंदे की मोटी राशि मिलने के कारण आर्थिक रूप से काफी समृध्द हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक 'कंट्री रिपोर्ट्स आन टेरेरिज्म-2008' में कहा गया है मुंबई और देश भर में हुए ऐसे ही हमले बताते हैं कि आतंकियों को चंदे में मोटी रकम मिल रही है और वे आर्थिक रूप से बहुत समृध्द हैं। रिपोर्ट में 26/11 के मुंबई हमलों के अलावा 2008 में देश में हुए अन्य प्रमुख हमलों का भी उल्लेख है जिनमें जयपुर विस्फोट, काबुल में भारतीय दूतावास के अलावा अहमदाबाद, दिल्ली और असम के विस्फोट भी शामिल हैं। मुंबई हमलों पर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अधिकारियों का मानना है कि आतंकियों ने क्रेडिट कार्ड्स के अलावा हवाला और दान से मिले पैसे समेत कई स्रोतों का उपयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मानना है कि हमलों का उद्देश्य भारत पाक के संबंधों को बिगाड़ना, देश में हिंदू मुस्लिम हिंसा को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था को बिगाड़ना है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत का मानना है कि देश में बड़े आतंकी हमलों के पीछे लश्कर-ए-तैय्यबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (बांग्लादेश) जैसे इस्लामिक चरमपंथी संगठनों का हाथ है। वहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आतंकवादी आधुनिक तकनीक से भी भरपूर परिचित हैं। मुंबई हमलों को देश के सबसे खतरनाक हमले की उपमा देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में स्थानीय और प्रदेश की पुलिस प्रशिक्षण्ा के मामले में बहुत कमजोर है और सभी के बीच समन्वय की भारी कमी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि भारत ने बाहर से आने वाले यात्रियों की जानकारी पाने के लिए विकसित यात्री सूचना प्रणाली लागू कर दी है लेकिन यह अमेरिका और यूरोपियन संघ की प्रणाली से जानकारी बांटने के अनुरूप नहीं है।

बहरहाल, अब जब अमेरिका ने यह मान लिया है तो उसे चाहिए कि वह आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को और धारदार बनाने के लिए अपना सहयोग प्रदान करे लेकिन उसका यह सहयोग निस्वार्थ होना चाहिए लेकिन अमेरिका से ऐसी अपेक्षा करना बेकार है। लेकिन उसने बीच चुनावों में विपक्ष के हाथ बड़ा मुद्दा तो थमा ही दिया है जोकि आतंकवाद के मुद्दे पर संप्रग सरकार को पहले ही घेरे हुए है।
नोट:- यह पूरी रिपोर्ट आप निम्न लिंक पर जाकर डाउनलोड़ कर सकते हैं- http://www.scribd.com/doc/11536774/Country-Reports-on-Terrorism-Report-२००८

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 26 March, 2009

आईएसआई-तालिबान गठजोड़ की बात फिर सामने आई

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की पोल खोलती एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआई के लोग तालिबान को लगातार मदद पहुंचा रहे हैं और वर्ष 2008 में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले में आईएसआई के एजेंटों का हाथ होने के सुबूत मिलने के बाद से हालात में मामूली सा बदलाव आया है। आज के न्यूयार्क टाइम्स ने अमेरिकी सरकार के अधिकारियों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कुछ लोग दक्षिणी अफगानिस्तान में तालिबान की मुहिम को सीधे मदद मुहैया करा रहे हैं जबकि सरकारी दावा है कि आईएसआई ने चरमपंथियों से संबंध तोड़ लिए है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह की पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा था कि आईएसआई तालिबान को मदद नहीं पहुंचा रही है जबकि इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय सेना से मुकाबले के लिए आईएसआई के सहयोग में तालिबान कमांडरों को धन मुहैया कराना, सैन्य आपूर्ति और सामरिक योजना के लिए मार्गदर्शन शामिल है। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लोग तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों के सहयोग और समर्थन की व्यवस्था का समन्वय कर रहे हैं।

एक और अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जरनल ने भी अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि भरोसेमंद मुखबिरों और खास इलेक्ट्रानिक उपकरणों के जरिए तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के बीच गठजोड़ पकड़ में आया है। इसमें कहा गया है कि जलालुद्दीन हक्कानी के गुट ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर बीते साल बमबारी की थी। हमले में 54 लोग मारे गए थे। इसमें कहा गया है कि इस बात के भी सबूत हैं कि आईएसआई के लोग नियमित रूप से तालिबान कमांडरों से मुलाकात करते हैं और अफगानिस्तान में होने वाले चुनावों से पहले हिंसा का स्तर बढ़ाने या हिंसा बंद करने के बारे में विचार-विमर्श करते हैं। न्यूयार्क टाइम्स की यह रिपोर्ट आईएसआई के आला अधिकारियों के उस दावे के ठीक विपरीत है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि गुप्तचर एजेंसी ने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों से संबंध तोड़ लिए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने माना है कि उन्हें आईएसआई और तालिबान लड़ाकों की निष्ठा को समझने में दिक्कत आ रही है।

लेकिन न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक पाकिस्तान का कहना है कि अमेरिकी अधिकारी जितना खतरा समझ रहे हैं दरअसल उतना खतरा है नहीं। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का कहना है खुफिया तंत्र में आपको अपने शत्रु के भी संपर्क में रहना पड़ता है वरना आप अंधेरे में तीर चला रहे होते हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने पाकिस्तान के जिन अधिकारियों का साक्षात्कार किया उन्होंने कहा कि उन्हें तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के बीच संबंध की जानकारी है हालांकि वह इस बात से इंकार करते हैं कि समझौते से आतंकवाद मजबूत हो रहा है। अखबार का कहना है कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले के संबंध में अमेरिकी सबूतों के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने बीते साल प्रतिज्ञा ली थी कि आईएसआई से निपटा जाएगा और आतंकवादियों के साथ काम करने वालों को बर्खास्त कर दिया जाएगा। पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जरदारी सरकार का भविष्य अनिश्चित है इसलिए आईएसआई पर लगाम की बात तो वह फिलहाल सोच भी नहीं सकते।

एक बात और वह यह कि आईएसआई पर भरोसा करने के कितने भी बयान किसी की भी ओर से आ जाएं लेकिन वह भरोसा करने लायक संगठन है ही नहीं क्योंकि उसकी बुनियाद ही भारत विरोध पर रखी गई है।

नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 3 March, 2009

पाक को आतंकवादी देश घोषित किया जाए


लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर दुस्साह हमला वाकई दिल दहला देने वाला है। पाकिस्तान से संचालित आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा है यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। इस हमले ने एक बात को और स्पष्ट किया है कि पाक सरकार का देश की कानून व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं रह गया है और आतंकी जो चाहे कर सकते हैं इसलिए आतंकवादी ढांचों को नष्ट करने की दिशा में कदम उठाना खुद पाकिस्तान के हित में है। अभी कल ही अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स का बयान आया था कि तमाम आतंकवादी संगठनों के लिए पाकिस्तान सुरक्षित पनाहगाह है और आज यह हमला हो गया। यह हमला उस खतरे की घातकता को रेखांकित करता है जो पाकिस्तान केंद्रित आतंकवाद से उपज रहा है। भारत हमेशा से ही पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचों को ध्वस्त करने पर जोर दे रहा है और इस हमले ने एक बार फिर ऐसा करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

अब समय आ गया है जब दुनिया को भारत की चिंताओं को समझना चाहिए। यह घटना पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के लिए विश्व समुदाय को विवश करेगी। यह केवल क्रिकेट पर हमला नहीं है बल्कि शांति चाहने वाले विश्व बंधुत्व पर भी हमला है।

वैसे श्रीलंका अगर भारत के पाक दौरा रद्द करने के बाद उसकी जगह खेलने के लिए राजी नहीं होता तो उसके क्रिकेटर आतंकवादी हमले से बच सकते थे। गौरतलब है कि टीम आज जब मेजबान के खिलाफ दूसरे क्रिकेट टेस्ट के तीसरे दिन के खेल के लिए गद्दाफी स्टेडियम जा रही थी तो टीम बस पर हुए आतंकी हमले में उसके छह क्रिकेटर जख्मी हो गये। श्रीलंका अगर जल्दबाजी में आयोजित की गई श्रृंखला में खेलने के लिए राजी नहीं होता तो यह त्रासदी टल सकती थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक भारत को जनवरी-फरवरी में पाकिस्तान का दौरा करना था लेकिन मुंबई में 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले के बाद इस दौरे को रद्द कर दिया गया। भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से महेंद्र सिंह धोनी की टीम को सरहद पार जाने की इजाजत नहीं दी थी। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसी टीमों के पहले दौरे पर आने से इंकार करने के बाद घर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से महरूम पाकिस्तान भारत का विकल्प ढूंढने के लिए बेताब था।

तत्कालीन अध्यक्ष अर्जुन रणतुंगा की अगुआई में श्रीलंका क्रिकेट ने पाकिस्तान की मदद के लिए हाथ बढ़ाया और टीम दो चरण का दौरा करने पर राजी हुई जो अब आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया है। श्रीलंका ने जनवरी में पाकिस्तान में वनडे श्रृंखला खेली जिसमें कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। भारत के खिलाफ घरेलू सरजमीं पर वनडे श्रृंखला में शिकस्त के बाद टीम पिछले महीने के मध्य में टेस्ट श्रृंखला के लिए पाकिस्तान लौटी थी। भारत के खिलाफ श्रृंखला का आयोजन भी जल्दबाजी में किया गया था। महेला जयवर्धने की टीम का दौरा अगर सफल रहता तो पाकिस्तान को क्रिकेट जगत को यह साबित करने में मदद मिलती कि देश खेलने के लिए सुरक्षित है। लेकिन श्रीलंकाई टीम पर हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय मेजबान के रूप में पाकिस्तान के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।

नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 24 February, 2009

26/11: टेप से खुली आईएसआई की पोल

मुंबई हमलों के मामले में आज तक ने एक बड़ा खुलासा किया है। हमलों के दौरान आतंकियों और पाकिस्‍तान में बैठे उनके आकाओं के बीच हो रही बातचीत का टेप आज तक के हाथ लगा है. इस टेप में रिकॉर्ड बातचीत से साफ पता चलता है कि मुंबई के हमलावरों को पाकिस्‍तान से सारे निर्देश दिए जा रहे थे. ये रिकार्डिंग करीब सात घंटे की है, जिससे ये बिल्कुल साफ हो जाता है कि मुंबई हमले की साजिश रचने वाले आकाओं की सैनिक कुशलता कितनी ज्यादा थी और इस हमले के लिए उन्होंने कितनी बड़ी तैयारी की थी.

मुंबई के आतंकवादियों के फोन चौबीसों घंटे पाकिस्तान में आतंक के वार रूम से जुड़े रहे। पाकिस्तान से कैसे खेला गया आतंक का खूनी खेल, पल-पल कैसे और किसने दी आतंकियों को कमांड, पहली बार आप खुद सुनें अपने कानों से आतंक के खौफनाक टेप. आतंक के वार रूम में बैठे आकाओं के पास नरीमन हाउस, ताज और ट्राइडेंट का पूरा खाका मौजूद था और इसी बिनाह पर पाकिस्तान में बैठे आतंक के आका मुंबई में मोर्चा लिए हर आतंकवादी को ये तक बता रहे थे कि उन्हें कब छुपना है और कब सामने आना है, कब ग्रेनेड फेंकने हैं, कब गोलियां चलानी हैं और कब आग लगानी है.

मुँबई में मोर्चा आतंकवादियों को लेना था। लेकिन उनकी पोजीशन क्या होगी ये सरहद पर पाक में बैठे मास्टरमाइंड तय कर रहे थे. वो बता रहे थे कि कैसे एक को सीढ़ियां कवर करनी है और दूसरे को क्रॉस फायरिंग के लिए पोजीशन बदलनी है. वो बता रहे थे कि किस तरह दीवार से चिपक कर खड़े होने पर ग्रेनेड फटने की सूरत में जान को खतरा हो सकता है. जाहिर है एक-एक कोने की खूबियों और कमियों से वो अच्छी तरह वाकिफ थे. ऐसी कमांड सिर्फ वही लोग दे सकते हैं जो या तो खुद आर्मी की ट्रेनिंग ले चुके हों और ऐसी सैनिक कार्रवाइयों का जिन्हें अच्छा-खासा अनुभव हो। सवाल उठता है कि आतंकवादियों के मास्टरमाइंड कहीं वो लोग तो नहीं जिनका पाक सेना से कभी कोई रिश्ता रहा हो.

दुनिया में आतंकवादी हमले का ये पहला ऐसा मामला होगा जिसमें आतंकवादियों को एक दूसरे मुल्क में बैठे उनके आका लाइव कमांड दे रहे थे। कमांड पाकिस्तान से मिल रहा था और ऑपरेशन मुंबई में चल रहा था. मुंबई हमले के दौरान आतंकवादियों की सबसे ज्यादा दिलचस्पी ताज को बर्बाद करने में थी. पाकिस्तान में बैठे आतंक के आका बार-बार एक ही बात पर जोर दे रहे थे कि पूरे ताज को आग के हवाले कर दो. ताज में छुपे आतंकवादियों को शायद उर्दू ठीक से नहीं आती थी, इसीलिए वो लगातार पंजाबी में बात कर रहे थे.

ताज का मंजर हंगामाखेज था। ताज में चार आतंकी दाखिल हुए। एक घंटे तक कत्लेआम मचाने के बाद आतंकियों ने ताज के कमरा नंबर 632 में अपना ठिकाना बना लिया. दो आतंकवादी इस कमरे में ही रहे जबकि दो किसी और माकूल ठिकाने की तलाश में ताज के गलियारों में निकल पड़े. लेकिन रिमोट कंट्रोल पाक में बैठे आकाओं के हाथ में था जो फोन पर ही रणनीति बना रहे थे. पेश है ताज में घुसे आतंकियों और उनके आकाओं की बातचीत के अंश:

आका: आप अपना ख्याल रखाना, सीढ़ियां कवर हैं या नहीं? नीचे से कोई ऊपर न आए।
'आतंकी: कुछ भी कवर नहीं है। हम तो बहुत ऊपर बैठे हैं, वो दोनों पता नहीं कहां चले गए हैं?
आका: मेरा भाई, सीढ़ियां जरूर कवर करो, अगर वो ऊपर आ गए तो आपका ऊपर कमरे में बैठने का कोई फायदा नहीं। हॉलनुमा कमरा देखना था.
आतंकी: मैंने बहुत कहा, वो आ ही नहीं रहे हैं। मैं उन्हें बार-बार कह रहा हूं.
आका: उन्होंने दूसरी तरफ पोजिशन ले ली होगी। वो गए कहां हैं? कितनी दूर गए हैं?
आतंकी: उन्हें तो नजदीक ही भेजा था, अब दूर चले गए होंगे।आका: नीचे तो नहीं गए क्या?
आतंकी: नहीं उन्हें मालूम है कि नीचे काम शुरू हो गया है। अब पता नहीं.
आका: ग्रेनेड है आपके पास? ग्रेनेड बेशक नीचे फेंको। ग्रेनेड अच्छा भला वफा करता है. एक ग्रेनेड फेंकते हो तो वो 15-20 मिनट सोचते हैं कि आगे बढ़ें कि नहीं.
आतंकी: अच्छा एक ग्रेनेड फेंकता हूं।

रणनीति का अहम हिस्सा था आतंकियों को मोर्चा लेने के पैंतरे बताना और आका ये काम कुछ इस अंदाज में कर रहे थे.
आका: ऊपर कमरों को आग लगा दो, जो कमरे खाली करोगो, आग लगा देना मेरे भाई। आपने पता है क्या काम करना है. उन्हें नीचे लेकर आना है, पुलिस है नीचे, नीचे पूरा पहरा दो, मैंने कहा था कि हर 15 -20 मिनट बाद ग्रेनेड फेंक दिया करो, वो फेंक रहे हो ना?
आतंकी: ठीक है अब ऊपर से आते समय सरप्रराइज देकर आएंगे, दरवाजा एंट्री बड़ी जबरदस्त है, शीशे बहुत बड़े-बड़े हैं।
आका: शीशे तोड़ दो।आतंकी: नहीं-नहीं कमरा स्ट्रॉंग होल्ड के लिए है.
आका: हां, स्ट्रॉंग होल्ड के लिए ढूंढ लिया क्या?आतंकी: बड़ा बेहतरीन कमरा है। वैसे महफूज है, डबल-डबल किचन है, बाथ है, एक छोटा सा बाज़ार लगता है.
आका: यहां पानी है क्या?
आतंकी: हां।पाक: पानी की बाल्टी अपने पास रखनी है. तौलिया और पानी की बाल्टी अपने पास रखनी है. आंसू गैस के जो गोले पुलिस वाले मारेंगे तो पानी और तौलिये ने आपका बचाव करना है.

पाकिस्तान में बैठे आका बार-बार समझा रहे थे कि ग्रेनेड को कैसे और कब इस्तेमाल करना है और इधर आतंकी भी मिनट-दर-मिनट का हाल आकाओं को बता रहे थे।

आका: पोजिशन बदलो, पोजिशन बदलो, इकट्ठे मत बैठो पोजिशन बदलो। जहां से वो आ रहे हैं वहां ग्रेनेड फेंको.
आतंकी: सोहैब ने फायर किया तो वो पीछे भाग गए हैं।
आका: अच्छा मेरे भाई। चारों इकट्ठे न बैठो, फैल जाओ ताकि कोई भी ऊपर आएगा तो एक पोजिशन को कवर करेगा तो तीन जगह से फायर खाएगा भी ना.
आतंकी: फिर हम साथ वाले कमरे में चले जाएं क्या ?
आका: अच्छा, साथ वाला है? सामने कोई नहीं है क्या?
आतंकी: नहीं-नहीं। फिर तो हम ही आमने-सामने हो जाएंगे.

पूरी बातचीत से साफ है कि ताज के अंदर आतंकी थे और सीमापार उनके हुक्मरान। यानी मुंबई के हमलावरों की डोर पाकिस्तान के कंट्रोल रूम में थी. फोन पर ही वो मुंबई में सब कुछ करा रहे थे जो वो चाहते थे.

आपस में वो जिस तरह बातचीत कर रहे थे उससे साफ जाहिर है कि एक खास टीम आतंकवादियों को कमांड देने के काम में लगी थी। ठीक वैसे ही जैसे जंग के वक्त सेना के आला अफसर बैठकर रणनीति बनाते हैं और फौज के दस्तों को आगे की रणनीति बताते हैं। यही हो रहा था मुंबई हमलों के दौरान. पर सवाल ये कि आतंकवादियों के वार रूम की कमान किसके हाथों में थी? आतंक के वार रूम में कितने लोग थे? और वो कौन थे? इन तमाम सवालों के जवाब पाकिस्तान ने अब तक नहीं दिए हैं.

तारीख 27 नवंबर, वक्त रात एक बज कर चार मिनट, जगह होटल ताज

ऑपरेशन बेशक मुंबई में चल रहा था लेकिन उसका रिमोट कंट्रोल था पाकिस्तान में. मुंबई में छुपे आतंकवादी पाकिस्तान में बैठे अपने कमांडरों को एक-एक पल की खबर दे रहे थे और उसी के आदार पर पाक कमांडर बना रहे थे आगे की रणनीति।

पाक: आपको बताया था कि कमरे में कैमरे लगे हैं, आप लाइट बंद कर दो, सारे बटन बंद कर दो, जहां भी कैमरा दिखाई पड़े फायर मार दो। इन सब चीज़ों का ख़्याल रखो मेरा वीर. ये सब चीजें आपको एक्सपोज़ करने वाली हैं, कि आप कितने आदमी हो, कहां हो, किस हालत में हो, आपकी सारी सिक्यूरिटी बाहर आती है.
ताज: हमें पता नहीं चल रहा है कि कैमरे कहां हैं? कहां नहीं हैं?
पाक: क्यों नहीं नज़र आता है? ऊपर क्या लगा है? लाइट लगी है ना? लाइट के अलावा क्या है?
ताज: मसलन लाइटें लगी हैं। पता नहीं किस-किस चीज़ का बटन है?

दरअसल मुंबई पुलिस और कमांडो आतंकवादियों का लोकेशन पता करने के लिए होटल के सीसीटीवी का इस्तेमाल कर रहे थे. वहां से पुलिस कंट्रोल रूम को खबर मिली कि आतंकवादी होटल की छठी मंजिल के कमरा नंबर 632 में हैं. लेकिन पाकिस्तान के आतंकी वार रूम तक खबर पहुंची कि वो कमरा नंबर 360 या 361 में हैं. आकाओं को लगा कि उनके मोहरे फंस रहे हैं, बस इसीलिए उन्होंने फौरन सीसीटी कैमरों को नष्ट करने का हुक्म दिया और साथ ही होटल को आग के हवाले करने का फरमान दे दिया.

ताज: हर साइड पर बड़े-बड़े कम्प्यूटर पड़े हैं। 22-22 30-30 इंच के कम्प्यूटर पड़े हैं.
पाक: उनको जलाया नहीं?
ताज: बस हम अभी आग लगाने लगे हैं। इंशाअल्लाह देखना अब थोड़ी देर बाद ही आपको आग नज़र आएगी.
पाक: आग हमें यहां तक नजर आए तभी तो है। शोले उठते नज़र आएं.
ताज: अभी थोड़ी देर में ही आपको नज़र आएगी आग लगी हुई।
ताज: बात सुनो, दो भाई गए हैं समंदर वाली साइड की तरफ कमरा खोलने के लिए। जब खोल लेंगे तो फिर हम इस कमरे को आग लगा के उधर आ जाते हैं.
पाक: अच्छा आग लगादो मेरे वीर, लेट न करो।
ताज: कमरा एक ही है हमारे पास. अगर आग लगा दी तो हम कहां जाएंगे
पाक: अच्छा आप सबसे ऊपरी मंजिल पर हो? गली में जो कालीन पड़े हैं पर्दे भी, उनको आग लगा दो दूसरी तरफ जाकर।
ताज: वही बताया न। दूसरे भाई आते हैं तो आग लगाते हैं.
पाक: बहुत लेट हो जाओगे। ग्रेनेड भी नहीं फेंका है. कितनी देर लगती है ग्रेनेड फेंकने में? नीचे बहुत गाड़ियां खड़ी हैं.
ताज: दोनों को बार-बार भेज रहा हूं। वो फेंकते ही नहीं, ऐसे ही वापस आ जाते हैं. पता नहीं क्या कर रहे हैं? वो कहते हैं कि फेंकते हैं पर फेंकते नहीं.
पाक: ग्रेनेड फेंकना कौन सा बड़ा काम है? पिन खींचों और नीचे फेंक दो।
ताज: जो हमने डिब्बा फेंका है ना उससे सारे होटल में धूंआ ही धूंआ हो गया है।
पाक: तो फिर क्या हुआ? उससे परेशान नहीं होना है। जो कुछ होना था, वो हो गया. थोड़ी देर में वो खत्म हो जाएगा. आप अपना काम जारी रखो.
ताज: ठीक है।
पाक: फोन जब भी करेंगे, तब अटेंड करना है। आग वाले काम में देर नहीं करनी.
ताज: आग अभी लग जाएगी इंशाहअल्लाह।

पाकिस्तान के वार रूम से कमांड देने वाले लोग कौन थे? वार रूम से जब भी मुंबई में आतंकवादियों के पास फोन आता तो उधर से ज्यादातर तीन ही लोग बात किया करते थे। जुंदल, वसी और काफा. मुंबई में मोर्चा लिए आतंकवादी हर बार बातचीत के दौरान भी सिर्फ इन्हीं के नाम ले रहे थे. हां, बीच में दो-चार बार एक बुजुर्ग का भी जिक्र आता है और जिस तरह से इस बुजुर्ग का जिक्र आता है या जिस तरीके से वो ज्यादातर खामोश रहता है उससे ऐसा लगता है कि वार रूम में बैठे आतंक के आकाओं में उसका कद सबसे बड़ा था. पर ये चारों कौन थे और क्या ये उनके असली नाम थे या कोड नेम. फिलहाल इसका जवाब पाकिस्तान ने नहीं दिया है. वैसे इस पूरी बातचीत की एक और अहम बात ये है कि फोन हर बार वार रूम से ही किया जाता था. मुंबई आए आतंकवादियों ने अपनी तरफ से एक भी कॉल उन्हें नहीं किया था. शायद ये भी उनकी साजिश का एक हिस्सा था.

आज तक.com से साभार
नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 17 February, 2009

अब... तालिबान से बचो!


पाकिस्तान से संचालित हो रहा आतंकवाद न केवल क्षेत्र में बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा पैदा कर रहा है। आतंकवाद के इस नये खतरे पर रोक लगाना पाकिस्तान के वश की बात नहीं है क्योंकि वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी खुद कह चुके हैं कि तालिबान पाकिस्तान पर कब्जा करना चाहता है। इस समय भारत, अमेरिका और शेष अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस नये खतरे की गंभीरता समझने की और खतरे को खत्म करने के लिए और कदम उठाने की जरूरत है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी प्रतिनिधि रिचर्ड होलब्रूक ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा है कि पाकिस्तान से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहा तालिबान पाकिस्तान के साथ-साथ भारत और अमेरिका के लिए भी समान खतरा पैदा कर रहा है। होलब्रूक ने कहा कि 60 साल में पहली बार भारत, पाकिस्तान और अमेरिका सभी एक ही शत्रु का सामना कर रहे हैं।

पाकिस्तान सरकार ने तालिबान के आतंक से बचने के लिए उसके साथ पिछले साल मई में एक शांति समझौता किया था लेकिन कुछ ही महीनों में यह टूट गया। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि उग्रवादियों ने फिर संगठित होने के लिए शांति समझौते का इस्तेमाल किया। होलब्रूक ने अपनी हाल की पाकिस्तान यात्रा के बारे में बताया कि जब मैं कबायली इलाकों में था तो मैं स्वात नहीं गया लेकिन मैं पेशावर गया। मैंने स्वात की जनता से बातचीत की तो वे वास्तव में आतंकित दिखे। उन्होंने कहा कि स्वात ने पाकिस्तान के लोगों पर हकीकत में और गहराई से असर डाला है और ऐसा केवल पेशावर में ही नहीं बल्कि लाहौर और इस्लामाबाद में भी है।

ंइस्लामाबाद से केवल 160 किलोमीटर दूर स्थित स्वात में वस्तुत: तालिबान का नियंत्रण है जिसने पाकिस्तानी सेना को मुश्किल समय में डाल दिया है और अपने उग्रवादियों की रिहाई के लिए उसने विदेशियों सहित अनेक लोगों का अपहरण किया है। अभी हाल ही में खबर आई कि एक चीनी अधिकारी को छुड़वाने के लिए पाक ने कई तालिबानियों को छोड़ा था।

लग तो यही रहा है कि तालिबान पाक पर अपना शिंकजा कसता जा रहा है क्योंकि तालिबान के आगे झुकते हुए पाकिस्तान सरकार ने स्वात घाटी समेत उत्तार पश्चिमी फ्रंटियर प्रान्त के हिस्सों में शरीयत कानून लागू करने की मांग मान ली है। आतंकवादियों के साथ शांति समझौतों के अमेरिका द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद प्रान्त की सरकार और तहरीक ए निफाज ए शरीया मोहम्मदी (टीएनएसएम) के बीच एक समझौते पर दस्तखत किए गए। इस करार के तहत शरीयत या इस्लामी कानून के खिलाफ जाने वाले सभी नियम कायदों को खत्म कर दिया गया है और इस बात पर सहमति बनी है कि इलाके में सैनिक मौजूद रहेंगे और सिर्फ हमला किए जाने पर ही कार्रवाई करेंगे। देश और फ्रंटियर प्रान्त की सरकारें क्षेत्र में इस्लामी कानूनों पर अमल की निगरानी करेंगी। यह घोषणा स्वात घाटी में आतंक फैला रहे तालिबान की ओर से 10 दिवसीय संघर्षविराम के एलान के बाद की गई है। इससे पहले आतंकवादियों के साथ किए गए अनेक समझौते नाकाम साबित हो चुके है और अमेरिका ने ऐसे करार को दहशतगर्दों को फिर से एकजुट होने का मौका मानते हुए उनकी आलोचना की थी।

लोकतंत्र की दुहाई देने वाले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी की इस समझौते पर यह प्रतिक्रिया अचरज भरी लगी कि स्वात में हुआ समझौता मुल्क के लिए फायदेमंद होगा। गिलानी ने कहा कि उनकी सरकार का मानना है कि आतंकवाद से निपटने के लिए सेना का इस्तेमाल एकमात्र विकल्प नहीं है।

उल्लेखनीय है कि तालिबान आतंकवादी क्षेत्र में शरीयत को बेरहमी से लागू कर रहे हैं। इसकी आड़ में उन्होंने लड़कियों के अनेक स्कूलों को आग के हवाले कर दिया है। साथ ही वे सरकारी इमारतों, अदालतों और सुरक्षा बलों पर भी कई बार हमले कर चुके हैं। इस्लामाबाद से करीब 160 किलोमीटर दूर स्थित खूबसूरत घाटी स्वात करीब दो साल पहले पर्यटकों का प्रिय प्रिय स्थल थी। खूबसूरत वादियों वाली इस घाटी में अब तालिबान का खौफ छा चुका है। तालिबान नेता फजलुल्ला ने घाटी में शरीयत लागू करने का हिंसक अभियान छेड़ा था जिसे सफलता मिल गई है।

बहरहाल होलब्रूक की इस बात को गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिये कि तालिबान इस समय सबसे बड़ा खतरा है। भारत को अन्य मुद्दों पर गौर करने के साथ ही इस नई मुसीबत से भी पार पाने के लिए रणनीति बनानी चाहिये।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 13 February, 2009

ना ना करते आखिर इकरार कर बैठे

तमाम आनाकानी के बाद पाकिस्तान ने मुंबई हमलों में अपने नागरिकों की संलिप्तता को आखिरकार स्वीकार कर लिया है। ऐसा उसने हृदय परिवर्तन होने के कारण नहीं बल्कि मजबूरी में किया है। यह मजबूरी अमेरिका द्वारा रोकी गई सहायता और उस पर पड़ रहा अंतरराष्ट्रीय दबाव थी। लेकिन पाकिस्तान या फिर उसके यहां मौजूद भारत विरोधी तत्व अभी इतने भी मजबूर नहीं हुये हैं कि वह भारत पर हमले बंद कर दें।

अमेरिका के एक शीर्ष खुफिया अधिकारी ने आशंका जताई है कि पाकिस्तान स्थित संगठन भारत के खिलाफ और हमले कर सकते हैं और कहा है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ सख्त उपाय नहीं करता तब तक उसके भारत के साथ संबंध सुधरने की संभावना कम है और परमाणु युध्द का खतरा बना रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया सेवा के नए निदेशक डेनिस सी. ब्लेयर ने अपनी सालाना जोखिम आकलन रिपोर्ट में कहा कि भारत विरोधी उग्रवादी संगठनों को पाकिस्तान के समर्थन देने की भारत की चिंताएं दूर करने के लिए जब तक पाकिस्तान टिकाऊ, ठोस और सार्थक कदम नहीं उठा लेता तब तक दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता प्रक्रिया नाकाम रहेगी। उन्होंने आशंका जताई कि पाकिस्तान जब तक उसके देश में स्थित संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता तब तक भारत के खिलाफ और हमले हो सकते हैं तथा भारत-पाकिस्तान संघर्ष भड़कने का जोखिम बढ़ सकता है। सीनेट की चयन समिति के समक्ष पेश अपनी रिपोर्ट में ब्लेयर ने कहा कि यह मामला विशेषकर नवंबर 2008 के मुंबई के आतंकवादी हमलों के आलोक में है।

भारत ने भी पाकिस्तान की स्वीकारोक्ति के बाद ज्यादा प्रसन्नता नहीं जताते हुए यह स्पष्ट कर सही कदम उठाया है कि पाकिस्तान से संबंध इसी बात पर निर्भर करेंगे कि उसने मुंबई हमलों के मामले में क्या कार्रवाई की। साथ ही भारत ने पाकिस्तान से यह भी स्पष्ट कहा है कि अब वह तय करे कि वह भारत के साथ कैसे रिश्ते चाहता है। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को लोकसभा में मुंबई आतंकवादी हमलों पर अनुवर्ती कार्रवाई के संबंध में अपनी ओर से दिए गए बयान में यह भी साफ किया कि एक दिसंबर 2008 से पाकिस्तान के साथ रुकी समग्र वार्ता के तहत निकट भविष्य में कोई बैठक नहीं होगी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ संबंध के मामले में हम ऐसे मोड़ पर आ गए हैं कि अब पाकिस्तान के अधिकारी स्वयं तय करें कि वे भविष्य में भारत के साथ किस प्रकार का संबंध रखना चाहते हैं। मुखर्जी ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की आम जनता के साथ कोई झगड़ा नहीं है और हम उनके हित कल्याण की कामना करते हैं और हमें नहीं लगता कि इस हालात के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाए अथवा उन्हें इसका परिणाम झेलना पड़े।

अभी दो-तीन दिन पहले ही अल कायदा ने भारत को चेतावनी दी थी कि यदि उसने पाकिस्तान के खिलाफ युध्द छेड़ा तो उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे। इससे साफ है कि अल कायदा को किसकी शह मिल रही है। पाकिस्तान को यदि आगे बढ़ना है तो उसे मन से साफ होना होगा और आतंकवादियों के विरुध्द वाकई लड़ाई छेड़नी होगी। छद्म लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ और असली लड़ाई भारत के खिलाफ की नीति से उसका भला होने वाला नहीं है।

बहरहाल भारत ने मुंबई हमलों में पाकिस्तानी सरजमीन पर आधारित तत्वों की संलिप्तता की पाकिस्तान की स्वीकारोक्ति और इस संबंध में की गई गिरफ्तारियों को एक सकारात्मक घटनाक्रम करार देते हुए कहा है कि पाकिस्तान की ओर से उठाए गए मुद्दों की जांच करने के बाद जो हो सकेगा उसके साथ साझेदारी करेगा। उम्मीद की जानी चाहिये कि सब कुछ सही दिशा में आगे बढ़ेगा। लेकिन फिर भी भारत सरकार को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि मीडिया में आ रही रिपोर्टों की मानें तो आतंकवादी बस सही समय के इंतजार में हैं।

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 5 February, 2009

जब सुर ही एक नहीं तो आतंकवाद से कैसे निबटेंगे?

यह केन्द्रीय स्तर पर कैसी व्यवस्था है कि आतंकवाद के मामले पर सरकार के मंत्री और उसके अधिकारी अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने साफ कहा है कि पाकिस्तान ने मुंबई हमलों पर भारत की ओर से उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने भी स्पष्ट कहा है कि पाकिस्तान ने भारत के दस्तावेजों पर कुछ सवाल भेजे थे जिनका जवाब दे दिया गया है।

नारायणन ने टीवी समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन को दिये एक साक्षात्कार में यहां तक कहा था कि पाकिस्तान मुंबई के आतंकवादी हमलों पर उसी तरीके से तफ्तीश कर रहा है जैसी किसी जांच एजेंसी को करनी चाहिये। नारायण्ान ने सीएनएन आईबीएन के डेविल्स एडवोकेट कार्यक्रम में करण थापर से कहा- मैं जिस बात से अवगत हूं वह यह है कि सबूतों का दस्तावेज मिलने के बाद पाकिस्तान सरकार ने हमें जवाब दिया और कुछ सवाल पूछे जिनके जवाब हमने मुहैया करा दिए हैं। नारायणन ने कहा था कि जहां तक हमारा सवाल है हमारा मानना है कि पाकिस्तान सच तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है।

यह संयोग ही है कि दोनों ओर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने मुंबई आतंकवादी हमले को लेकर अपनी-अपनी सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोहम्मद अली दुर्रानी ने जब यह स्वीकार किया कि मुंबई हमलों में शामिल एकमात्र जीवित गिरफ्तार आतंकवादी अजमल कसाब पाकिस्तानी है तो उन्हें प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने तत्काल बर्खास्त कर दिया। उस दौरान वहां खबरें आईं कि इस बर्खास्तगी के मामले को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी प्रधानमंत्री से नाराज हैं क्योंकि उनके ध्यान में लाये बिना यह कार्रवाई की गई और इस संबंध में उन्हें मीडिया से ही ज्ञात हुआ। ऐसा ही कुछ भारत में भी हुआ जब यहां के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि पाकिस्तान ने भारत के सबूतों पर जवाब भेजा है। जबकि गृह मंत्री और विदेश मंत्री ने इसके विपरीत बयान दिये। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री कार्यालय नारायणन के बचाव में उतर आया और बाकायदा एक विज्ञप्ति जारी कर पीएमओ ने सरकार के कर्ताधर्ताओं के बीच किसी मतभेद को नकारते हुये कहा कि नारायणन के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया।
वाकई देश के सामने यह अजीब-सी स्थिति है कि वह किसकी बात पर भरोसा करे? मंत्रियों की बात का या फिर अधिकारियों की बात का। साफ है कि आतंकवाद के खिलाफ पुरजोर तरीके से लड़ने की बात कर रही सरकार में इस लड़ाई को लेकर एकता का अभाव है। वरना एक ही मसले पर सरकार के विभिन्न सुर नहीं होते।
यही नहीं यह भी अजीब-सी स्थिति है कि जो मंत्री कुछ समय पहले तक पाकिस्तान के खिलाफ सभी विकल्प खुले होने की बात कह रहे थे वही अब कह रहे हैं कि भारत के पास इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। गौरतलब है कि विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि भारत ने अपनी ओर से पाकिस्तान को सबूत पेश कर दिये हैं और उसके जवाब का इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
प्रणव ने कहा- कोई विकल्प नहीं है जबकि रक्षा मंत्री ए।के. एंटनी अभी भी कह रहे हैं कि भारत के सभी विकल्प खुले हैं। लेकिन वह यह नहीं बता रहे कि यह विकल्प कौन से हैं। यदि सभी विकल्प की बात हो रही है तो दो या तीन या फिर उससे भी ज्यादा विकल्प संभव हैं। इनमें से एक तो बता दीजिये सरकार ताकि लोगों को भरोसा हो सके कि आतंकवाद के खिलाफ आपकी लड़ाई सिर्फ कागजी नहीं है।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जयपुर में एक रैली में कहा कि भारत आतंकवाद को नेस्तनाबूद कर देगा और पड़ोसी देश के मंसूबों को कामयाब नहीं होने देगा। लेकिन उन्होंने यह बताने से गुरेज किया कि उनकी सरकार ने आतंकवाद को रोकने के लिए अब तक क्या किया है। सरकार ने आतंकवादी गतिविधियों की रोकथाम के लिए पिछले दिनों जिस राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया उसके विस्तार का काम बहुत ही धीमी गति (इस संबंध में दिनांक 4 फरवरी 2009 को नवभारत टाइम्स, दिल्ली ने खबर भी प्रकाशित की है।) से चल रहा है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ जनता को ही जागरूक होना पड़ेगा। याद करिये मुंबई की जनता का वह उदाहरण जिसके दबाव से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तथा केंद्रीय गृहमंत्री को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। ऐसा ही दबाव संप्रग सरकार पर बनाया जाये ताकि वह चेते और आतंकवाद के खिलाफ वाकई कुछ करके दिखाये। सिर्फ रोज-रोज की बयानबाजी से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 27 January, 2009

आइये... जो शहीद हुये हैं उनकी जरा याद करें कुर्बानी



आइये जानें उन अमर शहीदों की वीरगाथाओं के बारे में जिन्हें इस वर्ष अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। आइये सैल्यूट करें उन अमर शहीदों को जिन्होंने देश की खुशहाली और अमन के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये।

26 जनवरी 2009 को जब गणतंत्र दिवस की परेड देखने गया तो भारत भर की सांस्कृतिक छटा तो राजपथ पर देखने को मिली ही साथ ही देश के उन महान शहीदों को याद करने का भी मौका मिला जिन्होंने मुस्कुराते हुये अपने प्राण देश पर न्योछावर कर दिये। इस वर्ष जिन शहीदों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनका नाम लिये जाने पर आंखें भर आईं और उनके अमर बलिदान को याद कर यही शपथ ली कि भारत मां तेरे लाल तुम पर कभी आंच नहीं आने देंगे। यहां एक मशहूर कविता की कुछ लाइनें व्यक्त कर अपने हृदय में उभर रही भावनाओं को व्यक्त कर रहा हूं।

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

मां तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊं सजा कर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण

गान अर्पित प्राण अर्पित
रक्त का कण कण समर्पित
चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

मांज दो तलवार, लाओ न देरी
बांध दो कस कर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया घनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण क्षण समर्पित
चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

तोड़ता हूं मोह का बन्धन, क्षमा दो
गांव मेरे, द्वार, घर, आंगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बायें हाथ में ध्वज को थमा दो

यह सुमन लो, यह चमन लो
नीड़ का त्रण त्रण समर्पित
चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

इस वर्ष जिन लोगों को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। आइये जानते हैं उनकी वीर गाथाओं के बारे में-

श्री आर. पी. डेंगदोह, मेघालय पुलिस सेवा

6 नवंबर, 2007 को यह सूचना मिली कि स्वचालित राइफलों तथा बड़ी मात्रा में विस्फोटकों से लैस लगभग दस उग्रवादियों ने मेघालय के जंगलों में एक शिविर डाल रखा है। श्री आर. पी. डेंगदोह उग्रवादियों के विरुध्द कार्रवाई में पुलिस दल को नेतृत्व प्रदान करने के लिए स्वेच्छा से आगे आये। पुलिस दल अगले दिन सूर्योदय से ठीक पहले मौके पर पहुंचा तथा उग्रवादियों को शिविर से बाहर खदेड़ने के लिए शिविर पर टूट पड़ा। उग्रवादियों ने आक्रमण दल पर भारी गोलीबारी कर दी। श्री डेंगदोह ने बहादुरी से गोलीबारी का जवाब दिया तथा एक उग्रवादी को मार गिराया। तथापि, उनको भी एक गोली लग गई। गंभीर घाव की परवाह न करते हुये उन्होंने दल का नेतृत्व जारी रखा तथा दो दुर्दांत उग्रवादियों को बंदी बनाने में कामयाब हो गये।

श्री आर। पी. डेंगदोह ने उग्रवादियों के विरुध्द लड़ाई में अनुकरणीय कर्तव्यपरायणता तथा उत्कृष्ट बहादुरी का प्रदर्शन किया तथा सर्वोच्च बलिदान दिया।

सहायक कमाण्डेंट श्री प्रमोद कुमार सत्पथी
विशेष आपरेशन ग्रुप, उड़ीसा राज्य सशस्त्र पुलिस के प्रशिक्षण प्रभारी

15 फरवरी, 2008 की रात भारी मात्रा में हथियारों से लैस 500 से भी अधिक नक्सलवादियों ने भुवनेश्वर के इर्द-गिर्द अनेक स्थानों पर एक साथ पुलिस पर आक्रमण कर दिया तथा बहुत से हथियार लूट लिये और कई पुलिस कर्मियों को मार दिया। तत्पश्चात् वे पास के जंगलों में छिप गये।

विशेष आपरेशन ग्रुप के सहायक कमाण्डेंट, प्रमोद कुमार सतपथी मात्र 20 पुलिस कर्मियों के साथ जंगल के अंदर ऊंचे स्थान पर मोर्चा लिये नक्सलियों के पास पहुंचे और उन पर तुरंत धावा बोल दिया। नक्सलियों ने पुलिस दल पर भारी गोलीबारी की और लगभग दो घंटे तक चलने वाली भीषण मुठभेड़ में श्री सतपथी ने अनुकरणीय बहादुरी के साथ ऑपरेशन का नेतृत्व किया तथा सर्वोच्च बलिदान दिया।
श्री प्रमोद कुमार सतपथी ने नक्सलियों के विरुध्द लड़ते हुये उच्च कोटि की वीरता तथा कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन किया।

आई सी- 45618 कर्नल जोजन थॉमस
जाट रेजिमेंट/45 राष्ट्रीय राइफल

जम्मू-कश्मीर में तैनात 45 राष्ट्रीय राइफल बटालियन के कमान अफसर कर्नल जोजन थॉमस को 22 अगस्त, 2008 को प्रात: 03.30 बजे एक आतंकवादी समूह का पता चला। कर्नल थॉमस उपलब्ध सैनिकों के साथ तुरंत उस क्षेत्र की ओर गये और शीघ्र ही भयंकर गोलीबारी शुरू हो गयी। मोर्चे पर अगुवाई करते हुये कर्नल थॉमस शीघ्र आगे बढ़े तथा बिल्कुल नजदीक से दो आतंकवादियों का सफाया कर दिया। इस कार्रवाई के दौरान उन्हें गोलियों के गंभीर घाव लगे। इसके बावजूद उन्होंने गुत्थम-गुत्था की भयंकर लड़ाई में तीसरे दुर्दांत आतंकवादी का सफाया कर दिया।

कर्नल जोजन थॉमस ने तीन कट्टर आतंकवादियों का सफाया करने में अनुकरणीय नेतृत्व तथा असाधारण बहादुरी का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

श्री मोहन चन्द शर्मा, निरीक्षक, दिल्ली पुलिस

श्री मोहन चन्द शर्मा, इन्सपेक्टर, दिल्ली पुलिस को 19 सितम्बर 2008 को एक खास सूचना मिली कि दिल्ली श्रृंखलाबध्द बम धमाकों के संबंध में वांछित एक संदिग्ध व्यक्ति जामिया नगर, दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में स्थित बाटला हाउस के एक फ्लैट में छिपा हुआ है।

श्री शर्मा सात सदस्यीय दल का नेतृत्व करते हुये तुरंत उस फ्लैट पर पहुंचे। ज्यों ही उन्होंने फ्लैट में अन्य दरवाजे से प्रवेश किया, उनको फ्लैट के अंदर छुपे हुये आतंकवादियों की ओर से गोलीबारी का पहली बौछार लगी। निर्भीकता के साथ उन्होंने गोलीबारी का जवाब दिया। इस प्रकार शुरू हुई दोनों तरफ की गोलीबारी में दो आतंकवादी मारे गये तथा एक पकड़ा गया।

श्री मोहन चन्द शर्मा ने आतंकवादियों से लड़ते हुये अनुकरणीय साहस कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

13621503 हवलदार बहादुर सिंह बोहरा
10वीं बटालियन पैराशूअ रेजिमेंट (विशेष बल)

हवलदार बहादुर सिंह बोहरा जम्मू-कश्मीर के लवांज के सामान्य क्षेत्र में तलाशी आपरेशन हेतु तैनात आक्रमण दल के स्क्वाड कमांडर थे। उन्होंने 25 सितम्बर, 2008 को शाम 6.15 बजे आतंकवादी दल को देखा तथा उन्हें बीच में ही रोकने के लिए शीघ्रता से आगे बढ़े। इस प्रक्रिया के दौरान, हवलदार बहादुर सिंह बोहरा शत्रु की भारी गोलीबारी की चपेट में आ गये। निर्भीकता के साथ वह आतंकवादियों पर टूट पड़े तथा उनमें से एक को मार गिराया। तथापि, उन्हें गोलियों के गहरे घाव लगे। सुरक्षित स्थान पर ले जाये जाने से इंकार करते हुये उन्होंने आक्रमण जारी रखा तथा बिल्कुल नजदीक से दो और आतंकवादियों को मार गिराया।

इस प्रकार, हवलदार बहादुर सिंह बोहरा ने आतंकवादियों के विरुध्द लड़ाई में अत्यधिक असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

श्री हेमन्त कमलाकर करकरे
संयुक्त पुलिस आयुक्त, महाराष्ट्र

26 नवम्बर, 2008 को रात्रि 9.40 बजे श्री हेमन्त कमलाकर करकरे, संयुक्त पुलिस आयुक्त तथा आतंकवादी रोधी दस्ते के प्रमुख को छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन, मुंबई पर आतंकवादियों के आक्रमण के बारे में सूचना मिली।

त्वरित कार्रवाई करते हुये श्री करकरे ने बच निकलने के संभावित रास्तों पर दल भेजे और स्वयं एक छोटी सी टुकड़ी लेकर कामा अस्पताल की ओर चल पड़े जहां तब तक आतंकवादी पहुंच चुके थे। आतंकवादियों और पुलिस दल के बीच भारी गोलीबारी हुई। इसके परिणामस्वरूप आतंकवादी अपनी जगह बदलने के लिए मजबूर हो गये। श्री करकरे ने आतंकवादियों का पीछा किया। लेकिन इस कार्रवाई में उनकी जीप पर घात लगाकर हमला किया गया जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गये। फिर भी, वे आपरेशन का नेतृत्व करते रहे और एक आतंकवादी को बुरी तरह घायल कर पाने में सफल हो गये।
श्री हेमन्त कमलाकर करकरे ने आतंकवादियों के विरुध्द लड़ाई में उच्चकोटि के साहस और नेतृत्व का प्रदर्शन किया और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

श्री अशोक मारुतराव काम्टे
अपर पुलिस आयुक्त, महाराष्ट्र

26 नवम्बर, 2008 को भारी मात्रा में हथियारों से लैस दस आतंकवादियों ने मुंबई के विभिन्न स्थानों पर एक साथ आक्रमण कर दिया। श्री अशोक मारुतराव काम्टे, अपर पुलिस आयुक्त उस पुलिस टुकड़ी में शामिल थे जो दौड़कर कामा अस्पताल पहुंची थी जहां आतंकवादी घुस गये थे। आतंकवादी तथा पुलिस टुकड़ी के बीच गोलीबारी की लड़ाई शुरू हो गई। परिणामस्वरूप आतंकवादी अपनी स्थिति बदलने के लिए मजबूर हो गये थे। पुलिस टुकड़ी ने आतंकवादियों का पीछा किया परंतु इस कार्रवाई में उनकी जीप पर घात लगाकर हमला कर दिया गया तथा श्री काम्टे गंभीर रूप से घायल हो गये थे। तथापि, उन्होंने लड़ाई जारी रखी तथा एक आतंकवादी को घायल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्री अशोक मारुतराव काम्टे ने आतंकवादियों के विरुध्द लड़ाई में उच्चतम कोटि के साहस तथा नेतृत्व का प्रदर्शन किया तथा देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

श्री विजय सहदेव सालस्कर, इंस्पेक्टर
अपकर्षण रोधी प्रकोष्ठ, (एंटी एक्सटोर्शन सेल) अपराध शाखा, महाराष्ट्र

26 नवम्बर, 2008 को भारी मात्रा में हथियारों से लैस दस आतंकवादियों ने मुंबई के विभिन्न स्थानों पर एक साथ धावा बोला। श्री विजय सहदेव सालस्कर, इंस्पेक्टर, अपकर्षण रोधी प्रकोष्ठ, अपराध शाखा, उस पुलिस टुकड़ी में शामिल थे जो दौड़कर कामा अस्पताल पहुंची थी जहां आतंकवादी घुस गये थे। आतंकवादी तथा पुलिस टुकड़ी के बीच गोलीबारी की लड़ाई शुरू हो गई। परिणामस्वरूप आतंकवादी अपनी स्थिति बदलने के लिए मजबूर हो गये थे। पुलिस टुकड़ी ने आतंकवादियों का पीछा किया परंतु इस कार्रवाई में उनकी जीप पर घात लगाकर हमला कर दिया गया तथा श्री सालस्कर गंभीर रूप से घायल हो गये थे। तथापि उन्होंने लड़ाई जारी रखी तथा एक आतंकवादी को घायल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

श्री विजय सहदेव सालस्कर ने विकट परिस्थितियों में अदम्य तथा अतुल्य साहस का प्रदर्शन किया और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

श्री तुकाराम गोपाल ओम्बले
सहायक पुलिस उपनिरीक्षक, महाराष्ट्र

26 नवम्बर, 2008 को श्री तुकाराम गोपाल ओम्बले, सहायक पुलिस उप निरीक्षक डी बी मार्ग पुलिस स्टेशन में रात्रि डयूटी पर थे जब मुंबई पर आतंकवादियों ने धावा बोला था। आधी रात के करीब वायरलेस पर यह संदेश गया कि दो आतंकवादी एक कार में मेरिन ड्राइव की ओर भाग रहे हैं। श्री ओम्बले ने इसे रोकने के लिए तुरंत बेरीकेड लगा दिये। ज्यों ही, आतंकवादियों की कार रुकी उसके अंदर बैठे एक आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी। श्री ओम्बले हिम्मत दिखाते हुये कार की बायीं ओर दौड़े और एके-47 राइफल को छीनने के लिए एक आतंकवादी को धर दबोचा। इस कार्रवाई के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गये और बाद में घावों के कारण्ा वीर गति को प्राप्त हुये।

श्री तुकाराम गोपाल ओम्बले ने आतंकवादियों के विरुध्द लड़ाई में अदम्य साहस तथा असाधारण बहादुरी का प्रदर्शन किया और सर्वोच्च बलिदान दिया।

आई सी- 58660 मेजर संदीप उन्नीकृष्णन
बिहार रेजिमेंट/51 स्पेशल एक्शन ग्रुप

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने होटल ताज महल से आतंकवादियों को मार भगाने के लिए 27 नवम्बर, 2008 को किये गये कमांडो आपरेशन का नेतृत्व किया जिसमें उन्होंने 14 बंधकों को छुड़ाया। आपरेशन के दौरान उनकी टुकड़ी पर भारी गोलीबारी होने लगी जिसमें उनकी टुकड़ी का एक सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गया। मेजर संदीप ने निशाने पर गोलीबारी करके आतंकवादियों को घेर लिया और घायल कमांडो को सुरक्षित जगह ले जाकर बचा लिया। इस कार्रवाई के दौरान उनके दाएं हाथ में गोली लग गई थी। चोट के बावजूद आखिरी दम तक वे आतंकवादियों के खिलाफ लड़ते रहे।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने सखाभाव तथा ऊंचे दर्जे के नेतृत्व के साथ-साथ उत्कृष्ट वीरता का प्रदर्शन किया और राष्ट्र के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

4073611 हवलदार गजेन्द्र सिंह
पैराशूट रेजिमेंट/51 स्पेशल एक्शन ग्रुप

27 नवम्बर, 2008 की रात हवलदार गजेन्द्र सिंह, नरीमन हाउस, मुंबई में आतंकवादियों द्वारा बंधक बनाये गये लोगों को बचाने के लिए किये जा रहे आपरेशन में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। भवन की अंतिम मंजिल से आतंकवादियों का सफाया करने के बाद वे उस जगह पर जा पहुंचे जहां पर आतंकवादियों ने मोर्चा ले रखा था। ज्यों ही वे अंदर दाखिल हुये, आतंकवादियों ने ग्रेनेड से उन्हें घायल कर दिया। अडिग रहकर वह गोलियां बरसाते रहे और प्रतिपक्षी की भारी गोलियों का सामना करते हुये उन्होंने आतंकवादियों को घेर लिया। इस कार्रवाई में उन्होंने एक आतंकवादी को घायल कर दिया और अन्यों को कमरे के अंदर ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने मुठभेड़ जारी रखी लेकिन घावों के कारण वे वीरगति को प्राप्त हो गये।

हवलदार गजेन्द्र सिंह ने अति प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उत्कृष्ट वीरता का प्रदर्शन किया और आतंकवादियों के खिलाफ लड़ते हुये राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

नोट:- अशोक चक्र से सम्मानित शहीदों की वीरगाथा भारत सरकार की ओर से 26 जनवरी, 2009, सोमवार को गणतंत्र दिवस समारोह स्थल पर वितरित की गई पुस्तिका अशोक चक्र से साभार ली गई है।

जय हिन्द
नीरज कुमार दुबे

Wednesday, 21 January, 2009

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई: इंडिया टुडे ने सुझाये कई महत्वपूर्ण सुझाव



आतंकवाद के खिलाफ जारी वैश्विक जंग में सभी देश अपने-अपने हिसाब से निर्णय ले रहे हैं जिससे यह जंग संगठित अभियान नहीं बन पाई है। इधर देश में मुंबई में हुये आतंकवादी हमलों के बाद से आतंकवाद के खिलाफ गुस्से का जमकर इजहार किया जा रहा है। सभी लोग आतंकवाद के खिलाफ अपने-अपने सुझाव दे रहे हैं। इन महत्वपूर्ण सुझावों को एकत्रित कर उसे लेख में प्रकाशित करने का सराहनीय कार्य किया है प्रतिष्ठित पत्रिका इंडिया टुडे ने। जिसने आतंकवाद पर अपने विशेषांक में बड़े महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किये हैं। पहले कुछ सुझाव तो सरकार के लिए हैं जिन्हें एक कार्य योजना के रूप में लिया जा सकता है। इसके अलावा कुछ सुझाव नागरिकों के लिए भी हैं जोकि खुद उनके और राष्ट्र के लिए उपयोगी सिध्द हो सकते हैं।

आतंकवाद से कड़ाई से और त्वरित गति से निपटने के लिए जो कार्ययोजना बनाई जाए उसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हों-
-घरेलू मोर्चे की सुरक्षा
-पाकिस्तान से निपटना
-पुलिस में भारी सुधार
-एनएसजी का आधुनिकीकरण
-खुफिया तंत्र का उन्नयन
-महानगरों की सुरक्षा
-भेद्य क्षेत्रों को मजबूत बनाना
-कानून को सख्त बनाना
-आतंक की फंडिंग पर अंकुश लगाना
-समूचे कश्मीर पर विजय पाना
-नागरिकों का चार्टर

आतंकवाद से निबटने का एकल केंद्र होना चाहिये, जो खुफिया जानकारी जुटाने, उसे बांटने और समन्वय के लिए जिम्मेदार हो। इसके अलावा महत्वपूर्ण स्थानों पर अच्छी तरह प्रशिक्षित और उपकरणों से लैस क्यूआरटी हो। आंतरिक सुरक्षा के मामले देखने के लिए एक पूर्णकालिक कैबिनेट मंत्री होना चाहिये तथा गृह मंत्रालय में राष्ट्रीय सुरक्षा के विशेषज्ञ अधिकारियों का एक समर्पित काडर होना चाहिये। सरकार को चाहिये कि वह अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए छह महीने के भीतर सभी भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रदान करे। इसके अलावा विशेष कार्य बलों में सुधार कर उनमें योग्यता और विशिष्टता लाई जाये।

खाकी वर्दी वालों को अगर आतंकवाद से लोहा लेने वाला कारगर जत्था बनाना है तो उन्हें उचित प्रशिक्षण और हथियारों से लैस करना होगा। जहां तक देश की कुल आबादी के मुकाबले पुलिसवालों की संख्या के अनुपात का सवाल है तो भारत में यह सबसे कम है। यह प्रति 2000 की आबादी पर मात्र तीन का है जबकि अमेरिका में यह इससे दोगुना है।

भारत की सीमाएं अभी भी दरारों से भरी हैं। समुद्र के रास्ते उभरे नये खतरे के मद्देनजर तटों की सुरक्षा दुरुस्त करने की जरूरत है इसके लिए सीमा पर प्राथमिकता के आधार पर बाड़ लगाई जानी चाहिये। बड़े अहम प्रतिष्ठानों की शिनाख्त और सुरक्षा की जानी चाहिये। कर्मियों की संख्या घटाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिये। इसके अलावा तटीय कमान और मेरीटाइम एडवाइजर को तटीय मुद्दे देखने वाले आठ मंत्रालयों के संपर्क में रहना चाहिये।

नागरिकता विहीन तत्वों और पुराने शत्रुओं का मुकाबला करने के लिये भारतीय सेना का आधुनिकीकरण बेहद जरूरी है। इस संबंध में कार्य योजना के तहत तेजी लाएं सैन्य खरीददारियों में। खरीद का समयबध्द कार्यक्रम बनाएं और मौजूदा 6 से 8 वर्ष की अवधि को कम करें। इसके अलावा गठित करें हथियारों की खरीद को आसान बनाने के लिए अलग मंत्रालय, जिसमें स्थायी विशेषज्ञ रखे जाएं। जमीन और समुद्र में बेहतर निगरानी के लिए उपग्रह, यूएवी और लंबी दूरी के जासूसी विमान शामिल किये जाएं। तथा सटीक हमले और रात में युध्द करने की क्षमता को पुख्ता बनाया जाये।

इसके अलावा कुछ सुझाव जो नागरिकों के लिए पत्रिका ने प्रदान किये हैं। वे इस प्रकार हैं-
  • बाजार का जायजा- देखें कि आप जिन बाजारों में जाते हैं, वे सुरक्षित हैं या नहीं। अगर सुरक्षित नहीं हैं तो वहां नहीं जायें।

  • प्राथमिक उपचार सीखें- प्राथमिक उपचार का कोर्स करें ताकि आपात स्थिति में पेशेवर डॉक्टर के आने तक आप मदद कर सकें।

  • जनप्रतिनिधियों पर दबाव- अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों पर अधिक नागरिक सुरक्षा उपाय करवाने के लिए दबाव डालें।

  • सामुदायिक वार्डन बनें- संदेहास्पद गतिविधियों की सूचना देकर अपने पास-पड़ोस की निगरानी में मदद करने के लिए स्वयंसेवक बनें।

  • खुल कर दान दें- आतंकवाद के शिकार लोगों की सच्ची मदद करने वालों की तलाश करें और उदारतापूर्वक दान दें।

  • पुलिस पर नजर- पुलिस थाने में जाकर देखें कि वहां खतरे से निबटने के लिए समुचित सुविधाएं, पुलिस बल और हथियार हैं या नहीं।

  • मुस्तैद रहें- आतंकवादियों से निबटने का प्रशिक्षण लें, इसके लिए नागरिक प्रशासन से प्रशिक्षण केंद्र का पता मालूम करें।

  • पहचान का प्रमाण- राष्ट्रीय आईडी कार्ड व्यवस्था के तहत हर नागरिक को पंजीकृत कराने का अभियान बनाएं।

  • अपराधियों को खारिज करें- आपराधिक पृष्ठभूमि वालों को चुनाव में वोट न देने का संकल्प लें।

  • जुर्माना भरें- दंडित किये जाने पर अधिकारियों को रिश्वत देने के बदले अपना जुर्माना भरें।

  • सुरक्षा पर निगरानी- आपके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते हैं उनके प्रबंधकों और आप जहां काम करते हैं, उस कार्यालय से कहें कि इमारत की बनावट के खाके की प्रतियां बनाएं।

  • अपने पड़ोस पर नजर रखें- अपने पास-पड़ोस पर नजर रखें। संदिग्ध हरकतों और व्यक्तियों की सूचना पुलिस को दें।

  • अच्छी तरह लैस रहें- आपातकालीन स्थिति में जरूरी उपायों के लिए अपनी निवासी कल्याण समिति से विवरण हासिल करें।

  • संपर्क नंबर रखें- अपने क्षेत्र के आपातकालीन सेवा केंद्रों की सूची रखें, जिसमें उनका पता और फोन नंबर हो।

  • भरोसे के लोग रखें- अपने यहां भरोसे के लोगों को ही काम पर रखें और किरायेदार की पुलिस जांच अवश्य कराएं।

  • मिलन स्थल बनाएं- अपने पड़ोस में ऐसे स्थान तय करें जहां आपात के समय लोग एकत्र हो सकें।

  • नक्शा रखें- अपने कार्य के स्थल और बच्चे के स्कूल तक आने-जाने के लिए वैकिल्पक मार्ग खोज कर रखें।

  • आगे आएं- अगर आप आतंकवादी हमले के साक्षी हैं तो गवाही के लिए आगे आयें।

  • धैर्य रखें- सार्वजनिक स्थानों और वाहनों में सामान की जांच के कारण देरी होने पर धैर्य रखें।

  • आपात योजना- परिवार के लिए आपात योजना बनाएं और मित्रों के साथ इसका अभ्यास करें।

यदि उपरोक्त सुझावों पर सरकार और सभी नागरिक गौर करें और इन्हें अमल में लाया जाये तो निश्चित रूप से आतंकवाद के खिलाफ मुहिम के निर्णायक परिणाम प्राप्त होंगे। आइये, एक बार फिर शपथ लें कि आतंकवाद को मिटाना है और भारत में शांति, अमन, सुख और समृध्दि लानी है।


जय हिन्द
नीरज कुमार दुबे

Friday, 16 January, 2009

चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात


मुंबई में हुये आतंकवादी हमलों के बाद भारत के कड़े रुख को देखकर लगा था कि आतंकवाद के खिलाफ इस बार वाकई निर्णायक कार्रवाई की जायेगी। लगभग डेढ़ महीने तक भारत-पाक के बीच वाक्युध्द हुआ भी लेकिन अब ऐसा लगता है कि सरकार कड़े रुख की मुद्रा छोड़ आराम की मुद्रा में आ गई है। सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों ने दो दिनों में ऐसे संकेत दिये हैं जिससे प्रतीत होता है कि आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई अब कमजोर पड़ती जा रही है।

पहला संकेत दिया विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने जिन्होंने पाकिस्तान से मुंबई हमले के दोषियों और अन्य आतंकवादियों को सौंपने की मांग पर कुछ नरमी लाते हुए कहा कि यदि उस देश में ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाया जाता है तो भारत को कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि यह छद्म मुकदमा नहीं होना चाहिए और इसे पारदर्शी ढंग से चलाया जाना चाहिए। विदेश मंत्री पाकिस्तान से यह उम्मीद कैसे कर रहे हैं कि वह इस बारे में सही जानकारी देगा? विदेश मंत्री के इस बयान से भारत के रुख में नरमी का संकेत मिलता है क्योंकि अभी तक कहा जा रहा था कि भगोड़ों को सौंपा जाए ताकि भारत में उन पर मुकदमा चलाया जा सके। यही नहीं भारत ने इस मांग को लेकर वैश्विक स्तर पर अभियान भी चलाया था अब अचानक ही इस मांग से पीछे हटने से क्या सही संदेश जायेगा?

दूसरा संकेत दिया गृहमंत्री पी। चिदम्बरम ने, जिन्होंने अपना पद संभालते के साथ ही जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय जांच एजेंसी और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून संसद से पारित कराकर यह संदेश देने का प्रयास किया था कि आतंकवाद की अब खैर नहीं। उन्होंने उक्त कार्यों को हुये महीना भर भी नहीं गुजरा कि कह दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार के लिए वह तैयार हैं। सभी मुख्यमंत्रियों एवं उप राज्यपालों को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि यदि इन कानूनों में कोई परिवर्तन करने की जरूरत महसूस हुई तो हम कभी भी प्रावधानों पर पुनर्विचार कर सकते हैं और संसद के अगले सत्र में बदलाव रख सकते हैं। उन्होंने यह बयान देकर सही नहीं किया क्योंकि इससे देश के सॉफ्ट स्टेट होने की धारणा एक बार फिर बलवती हुई है। जब हम संसद से सर्वसम्मति से पारित किये गये कानून पर ही दृढ़ नहीं रह पायेंगे तो आतंकवाद के खिलाफ हमारी दृढ़ता कैसे कायम रह पायेगी।

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सरकार की इच्छाशक्ति में कमी क्यों आई, यह विश्लेषण का विषय है। इस समय हमें पाकिस्तान पर और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की जरूरत है लिहाजा आंतरिक मतभेदों को दरकिनार कर जनमानस के अनुरूप आतंकवाद और उसके पोषकों के खिलाफ सख्त रूख बनाये रखना चाहिये। इसी से यह लड़ाई अपनी परिणति को प्राप्त होगी।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 9 January, 2009

मुंबई हमलों से दुनिया भर को सतर्क होने की जरूरत


अमेरिकी कांग्रेस में हुई चर्चा का यह निष्कर्ष वाकई चिंता का विषय है कि मुंबई में तबाही का मंजर पैदा कर देने वाले तुलनात्मक रूप से कम आधुनिक तकनीक के हथियारों के साथ आए हमलावर दूसरे आतंकवादियों के लिए आदर्श बन सकते हैं और भविष्य में हमलों के लिए उनकी नकल कर सकते हैं। मुंबई के हमलों से मिले सबक को लेकर कांग्रेस कमेटी के साथ चर्चा में एफबीआई और न्यूयार्क पुलिस विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी है कि भारत की वित्ताीय राजधानी पर हुए हमले इस प्रकार के हमलों में आतंकवादियों द्वारा अपनाई गई रणनीति एक बड़ा मोड़ है। उन्होंने कहा- यह बेहद जरूरी है कि इन हमलों की साजिश रचने वालों को कानून के कठघरे में खड़ा किया जाए क्योंकि ऐसा नहीं करने पर इस प्रकार के और हमले हो सकते हैं।

वाकई यह समय कार्रवाई करने का है, कार्रवाई भी ऐसी होनी चाहिए जिससे आतंकवाद को कड़ा संदेश जाये। लेकिन हम अभी तक सिर्फ राजनय के माध्यम से ही पाकिस्तान पर दबाव बनाने में जुटे हुये हैं। यह कैसा राजनय है कि जिससे हमें भी खुश करने के प्रयास जारी हैं और उस राजनय से पाकिस्तान भी खुश ही है। भले ही उस पर अमेरिका सहित अन्य देशों का भारी दबाव पड़ रहा है लेकिन वह कर तो अपने मन की ही रहा है। हमला करने या गलती करने के बाद जो भय उसके चेहरे पर दिखाई देना चाहिए वह नहीं दिखाई दे रहा है।

यह भी वाकई शर्मनाक है कि सिर्फ परंपरागत हथियारों के बल पर 10 आतंकवादियों ने तबाही का एक खौफनाक मंजर पैदा कर दिया जिसमें 500 लोग हताहत हुए। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस का यह निष्कर्ष सही प्रतीत होता है कि हमलावरों का तुलनात्मक रूप से कम आधुनिक हथियारों के साथ आना एक मोड़ साबित हो सकता है। एफबीआई के प्रमुख खुफिया अधिकारी डोनाल्ड एन वान डयून ने कहा भी है कि यह हमला स्पष्ट तौर पर सफल था और दूसरे संगठन दुनिया के दूसरे हिस्सों में इस माडल की नकल करने की कोशिश करेंगे। मुंबई हमलों का सबसे बड़ा सबक इस बात को पुष्ट करता है कि कम संख्या वाले प्रशिक्षित और प्रतिबध्द हमलावर कम आधुनिक हथियारों से काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। दरअसल कमी हमारे में यह है कि हम ऐसी रणनीति पर अपना ध्यान केंद्रित करते है जो आकर्षक और गोपनीय हो। लेकिन ज्यादातर आतंकवादियों के मामले में, वे ऐसी चीज पर ध्यान देते हैं जो कारगर हों।

यह भी देखने में आया है कि आतंकवादियों का मीडिया के प्रति बेहद रुझान है और उन्होंने इसके जरिये काफी सफलता भी पाई है। मीडिया के जरिए आतंकवादियों ने दुनिया को 72 घंटों तक हिलाए रखा। निश्चित तौर पर मुंबई के हमलों ने यह दिखा दिया है कि इस तरह के हमले दुनियाभर में किए जा सकते हैं। ऐसे संभावित हमलों से सतर्क होने की बेहद आवश्यकता है। इस संबंध में गृह मंत्री पी। चिदंबरम का यह बयान कि घटना से पहले हमें सजग होना होगा, काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी को आधार बनाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को सही मुकाम तक पहुंचाया जा सकता है।

नीरज कुमार दुबे