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Wednesday, 31 December, 2008

कट्टरपंथियों को लोकतंत्र का तमाचा


बांग्लादेश में चुनावी नतीजे शेख हसीना और बांग्लादेश के लिए तो सुखद रहे ही साथ ही यह भारत के लिए भी अच्छे कहे जा सकते हैं क्योंकि एक तो हसीना के आने से बांग्लादेश से भारत विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगने के आसार हैं तो दूसरी ओर इन चुनावों में जिस प्रकार कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी का सफाया हुआ है उससे सभी कट्टरपंथी संगठनों को सीख मिलेगी। भारत के जम्मू-कश्मीर में कट्टरपंथी अलगाववादियों को चुनावों में झटका लगने के बाद बांग्लादेश में भी कट्टरपंथियों को जनता का झटका वाकई अच्छे भविष्य का संकेत है।

चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बीएनपी नीत गठबंधन के महत्वपूर्ण धड़े जमियत-ए-इस्लामी को करारी हार का सामना करना पड़ा है और चुनाव में इस कट्टरपंथी पार्टी के सभी सिपहसालार धूल चाटते नजर आए। उल्लेखनीय है कि जमियत-ए-इस्लामी ने 1971 के बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का पक्ष लिया था। इस चुनाव में पार्टी को दो सीटों से संतोष करना पड़ा जबकि 2001 के चुनाव में उसे 20 सीटें हासिल हुई थी। जमियत-ए-इस्लामी के प्रमुख मोतिउर रहमान तथा महासचिव अली अहसन मोहम्मद मुजाहिद ने हार स्वीकार कर ली है।

अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना भारत के करीब हैं। वह 1996-2001 के दौरान सत्ताा में रहीं। इस दौरान दोनों देशों के आपसी संबंध बेहतरीन रहे। उनके शासनकाल में ऐतिहासिक गंगा जल बंटवारा समझौता हुआ। हसीना की भारत से निकटता को देखते हुए ही भारत ने उम्मीद जताई है कि नई सरकार वहां से चलाए जा रहे आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को तवज्जो देगी। भारत ने पूर्ववर्ती सरकार को भी बांग्लादेश के इलाकों से चलाई जा रही आतंकवादी कार्रवाइयों से अवगत कराया था। लेकिन कहा गया कि यह गलत है। अब सरकार को बांग्लादेश के समक्ष उल्फा तथा अन्य उग्रवादी संगठनों के वहां स्थित ठिकानों पर कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाना चाहिये।

भारत के पड़ोसियों पर निगाह डालें तो नेपाल में नई सरकार के साथ भारत ने अच्छा सामंजस्य बनाया है। अब बांग्लादेश में भारत समर्थक सरकार आने जा रही है। श्रीलंका तो भारत के साथ है ही। सरकार को प्रयत्न होना चाहिए कि सभी पड़ोसी देशों से भारत विरोधी गतिविधियों पर रोक लगे। पाकिस्तान पर भी इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा रहा है। अब इंतजार है तो इन प्रयासों के सफल होने का। यदि विदेशी धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं हो तो भारत में आतंकवाद नहीं फैल सकता। इसलिए इस ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।

नीरज कुमार दुबे

Wednesday, 24 December, 2008

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हुई राजनीतिक लड़ाई में तब्दील


दस दिन पहले शुरू हुये संसद के सत्र के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा आतंकवाद था और इसे लेकर लगभग सभी दलों ने एकजुटता प्रदर्शित भी की थी। लेकिन सत्र समाप्ति तक आते-आते यह एकजुटता तार-तार हो गई और सभी दल अपनी ढपली अपना राग अलापने लगे जिससे कि आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई थोड़ी कमजोर हुई।

इस लड़ाई को कमजोर करने का काम सबसे पहले केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले ने किया जिन्होंने मुंबई हमलों में शहीद हुये हेमंत करकरे की मौत की परिस्थितियों पर संदेह जताया। इसके बाद तो वह जैसे पाकिस्तान में हीरो ही बन गये और पाकिस्तान सरकार ने उनका बयान अपने बचाव के लिए उपयोग किया। आतंकवाद के खिलाफ यह सरकार का कैसा प्रयास है कि उसमें इस मसले पर दो सुर हैं। एक ओर तो विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी पाकिस्तान पर आतंकवादी ढांचे नष्ट करने के लिए भारी दबाव बनाने की बात कह रहे हैं और ऐसा न होने पर सभी विकल्प खुले होने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर अंतुले के बयान से पाकिस्तानी पक्ष यह कहने में सफल हुआ है कि भारत के एक मंत्री ने सच कहने का साहस दिखाया है।

यह आतंकवाद के खिलाफ कैसी लड़ाई है कि हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान पर दबाव बनाने की बात कहते-कहते बीच में ही साफ कर गये कि भारत युध्द नहीं चाहता। प्रधानमंत्री जी, यह सही है कि युध्द में किसी का भला नहीं है लेकिन कम से कम इस बात को सार्वजनिक रूप से तो नहीं कहना चाहिये था। आपने तो पाकिस्तान को रिलेक्स कर दिया जोकि अब तक काफी तनाव में था। संभव था कि भारतीय हमले की आशंका के चलते वह आतंकवादी ढांचों को नष्ट करने की दिशा में कुछ कदम उठाता। खैर आपने भी कुछ सोचकर ही यह बयान दिया होगा लेकिन यह बयान जनमानस को शायद ही भाये। आपसे अपेक्षा थी कि आप अपने मंत्री अंतुले के खिलाफ भी कोई कदम उठाते। जिस मंत्री (शिवराज पाटिल) की नाकामी से आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर विफलता मिली उसे तो आपने मंत्रिमंडल से हटा दिया लेकिन जिस मंत्री के कारण उस कवायद में पलीता लगा जिसमें आतंकवाद खासकर पाक जनित आतंकवाद के खिलाफ भारत विश्वव्यापी समर्थन हासिल कर रहा था, उनको क्या यूं ही बख्श दिया जायेगा। यह वोट बैंक की राजनीति नहीं तो और क्या है?

प्रधानमंत्री जी यह पहली बार है कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम को विश्वव्यापी समर्थन मिला है। इस मौके का फायदा उठाना चाहिये और समय न गंवाते हुए पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिये। पाकिस्तान की ओर से तो गीदड़ भभकियां दी जा रही हैं और हमारी ओर से 'युध्द नहीं चाहते' जैसे बयान दिये जा रहे हैं यह सब उसका हौसला ही बढ़ा रहे हैं।

इसके अलावा शहीदों की मौत पर सवाल उठाने वाले नेताओं पर भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिये। पहले कुछ नेताओं ने शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत पर सवाल उठाये और अब शहीद हेमंत करकरे और अन्यों की मौत पर सवाल उठाये जा रहे हैं। जनता आक्रोशित है, यह बात नेताओं को समझनी चाहिये। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को राजनीतिक लड़ाई में तब्दील करने से बचना चाहिये।

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 18 December, 2008

हौले-हौले से जागी सरकार, आतंकवाद के खिलाफ सभी दल हुये एक साथ


नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (एनआईए) के गठन और गैर कानूनी गतिविधि निरोधक संशोधन कानून को सभी दलों के समर्थन से लोकसभा में मिली मंजूरी दर्शाती है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पूरा देश अब एक साथ खड़ा है। यहां सवाल यह खड़ा होता है कि इस 'एकता' को बनने में इतना समय क्यों लग गया। आतंकवादी हमले तो देश में पिछले कुछ समय से लगातार हो रहे हैं फिर मुंबई हमलों के बाद ही सभी दलों को 'एकजुट' होने की क्यों सूझी? दरअसल इसके पीछे एकमात्र कारण जनता का आक्रोश है। मुंबई हमलों के बाद जिस प्रकार जनता का आक्रोश सामने आया उसके आगे सरकार को झुकना ही पड़ा।

जनता की ताकत को समझने वाले राजनीतिक दल जनता की 'एकता' को देखकर ही कार्रवाई को मजबूर हुये और सरकार की ओर से पहला कदम गृहमंत्री पद से शिवराज पाटिल की रवानगी रहा और उसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से विलासराव देशमुख और उपमुख्यमंत्री पद से आरआर पाटिल की छुट्टी हुई। अब महाराष्ट्र के पुलिस प्रमुख और मुंबई के पुलिस कमिश्नर पर कार्रवाई की तैयारी है। इसके अलावा सरकार की ओर से आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून और राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन के लिये विधेयक लाया गया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाने की बात तो सरकार काफी समय से कर रही थी लेकिन आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून लाने से पहले वह बचती फिर रही थी। याद कीजिये प्रधानमंत्री और शिवराज पाटिल के वह बयान जोकि उन्होंने हर आतंकवादी घटना के बाद दोहराये कि आतंकवाद से निपटने के लिए देश में पर्याप्त कड़े कानून हैं। फिर इस नये कानून की जरूरत क्यों पड़ गई? सरकार को स्वीकार करना चाहिए कि आतंकवाद से कड़ाई से निबटने के मामले में वह देर से जागी है। खैर, सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहा जाना चाहिये। न ही इसे यूपीए का यू टर्न कहा जाना चाहिये।

अब राजनीतिक दलों में जो एकता नजर आ रही है उसका कारण आसन्न लोकसभा चुनाव भी हैं। हर दल अपनी जीत सुनिश्चित करने का कोई भी प्रयास नहीं छोड़ना चाहता। हमारे देश में एक जो गलत प्रचलन है वह यह है कि यहां हर बात को राजनीति से जोड़ कर देखा जाता है। जब देश में पोटा कानून बना तो उसे भी राजनीति का शिकार होना पड़ा और कहा गया कि यह कानून एक खास संप्रदाय के लोगों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया। यह तब हुआ जबकि अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद दुनिया के बहुत से देशों ने अपने आतंकवाद विरोधी कानूनों को सख्त कर दिया लेकिन भारत ने पोटा को खत्म कर अधोगामी कदम उठाया। कानून को देश की संसद बनाती है जिसमें सभी संप्रदायों और वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है इसलिए ऐसी बातें नहीं फैलाई जानी चाहिए जिससे किसी संप्रदाय विशेष के मन को पीड़ा पहुंचे या वह अलग-थलग महसूस करे। संभवत: कांग्रेस को यही डर रहा होगा कि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून को कहीं कोई संप्रदाय विशेष अपने खिलाफ न मान ले। आतंकवाद विरोधी कानूनों को पारित किए जाने के काम में ऐसी चिंताओं का असर नहीं पड़ना चाहिए लेकिन इन चिंताओं का समाधान भी किया जाना चाहिए और यह कानून में दिखना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जब भी कानून को लागू किया जाएगा इसका पारदर्शी और उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा।

सरकार की ओर से गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने वादा किया है कि आतंकवाद पर लगाम कसने के लिए जो दो विधेयक लाये गये हैं उनमें इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि इनसे आतंकवाद को काबू भी किया जा सके और किसी के बुनियादी मानवाधिकारों का भी हनन न हो।

चिदंबरम के मुताबिक, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के कामकाज के दायरे में आठ कानूनों को रखा गया है। एजेंसी सभी तरह के आपराधिक मामलों की जांच नहीं करेगी। विधेयक के अध्याय तीन में आपराधिक घटनाओं के जांच की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों के अधीन है लेकिन विशेष मामलों में राष्ट्रीय एजेंसी जांच कार्य करेगी। अगर कोई गंभीर आपराधिक मामला किसी थाने में दर्ज होता है तो राज्य सरकार इसकी जानकारी केंद्र सरकार को देगी और केंद्र सरकार 15 दिनों के भीतर अपराध की गंभीरता का आकलन करेगी और इस बात पर निर्णय करेगी कि क्या यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सुपुर्द किया जा सकता है या नहीं। अगर केंद्र सरकार इस दौरान कोई निर्णय नहीं कर पाती है तो मामला राज्य सरकार के अधीन ही रहेगा।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी का अधिकार क्षेत्र कितना व्यापक है इस बात का अंदाजा इसी से लग जाता है कि कानून-व्यवस्था जोकि राज्यों का मामला है इसलिए सीबीआई जब भी किसी राज्य में किसी मामले में कार्रवाई करती है तो उसे वहां की सरकार की अनुमति चाहिये होती है लेकिन राष्ट्रीय जांच एजेंसी को ऐसी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके अलावा एजेंसी के सब इंस्पेक्टर से बड़े पद वाले अफसर भी देश में कहीं भी जांच करने के लिए स्वतंत्र होंगे। यह एजेंसी जिन मामलों में कार्रवाई करेगी उनकी सुनवाई के लिए विशेष अदालते स्थापित की जायेंगी। इन मामलों की सुनवाई रोजाना होगी।

गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम (संशोधन) विधेयक की खास बात यह है कि इसमें हिरासत की अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन कर दी गई है। इसके अलावा विदेशी आतंकवादियों को कोई जमानत नहीं मिलेगी। भारतीय आरोपी को भी जमानत के लिए बेहद कड़े नियम बनाये गये हैं। कानून के मुताबिक आरोपी की संपत्ति भी जब्त की जा सकेगी। इस कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय होंगे और भारत या विदेश में आतंकवादियों के लिए पैसे का इंतजाम करने वालों को पांच साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।

बहरहाल, सिर्फ इन दो विधेयकों के पास होने भर से काम नहीं चलने वाला। देश में पुलिस सुधारों की भी आवश्यकता है। इसके अलावा सुरक्षा बलों को उच्च तकनीकों और आधुनिक हथियारों से भी लैस किया जाना चाहिए। भारत को अत्यावश्यक तौर पर मुंबई जैसे हमलों से निपटने में पुलिस की शक्तियों सहित आतंकवाद विरोधी कानूनों की जड़ से लेकर शाखाओं तक समीक्षा करनी चाहिए। यदि हमें दूसरी मुंबई घटना को रोकना है तो समीक्षा से कोई भी पहलू अछूता नहीं रहना चाहिये।

इसके अलावा अन्य जिन कदमों पर गौर किया जा सकता है उनमें गृह मंत्रालय से अलग एक राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय का गठन किया जाना चाहिए तथा राष्ट्रीय खुफिया निदेशक का एक पूर्णकालिक पद बनाया जाना चाहिये तथा राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों पर अधिकारियों का एक अलग कैडर बनाया जाना चाहिये।

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 11 December, 2008

'आतंकवाद' की नहीं इसे मुद्दा बनाने के प्रयासों की हवा निकली



हाल में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद कहा गया कि 'आतंकवाद' मुद्दे की हवा निकल गई और देश की जनता ने इस मुद्दे को नकार दिया। मैं ऐसा कहने वालों से विपरीत मत रखता हूं क्योंकि आतंकवाद मुद्दे की नहीं बल्कि आतंकवाद को मुद्दा बनाने के प्रयास की हवा निकली है। जनता आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीर है और इसे सियासी हथियार बनाये जाने के खिलाफ है। इसलिए सभी पार्टियों को यह जान लेना चाहिए कि अब वो जमाना गया जब जनता को किसी भी मुद्दे पर बरगलाया जा सकता था। जनता अब जागरूक हो चुकी है। देश और उसके लिए क्या सही है, क्या गलत है, वह सब जानती है।


ऐसा नहीं है कि आतंकवाद पहली बार चुनावी मुद्दा बना था। पिछले लोकसभा चुनावों के समय तत्कालीन विपक्ष ने संसद पर हुए आतंकवादी हमले और कंधार कांड को चुनावी मुद्दा बनाया था। यही नहीं कुछ समय पहले गुजरात विधानसभा चुनावों के समय वहां की विपक्षी पार्टी की ओर से जो चुनावी विज्ञापन दिये गये उनमें भी कंधार कांड, संसद पर आतंकवादी हमला और अक्षरधाम मंदिर पर हमले को मुद्दा बनाया गया था। जनता ने उसके ऐसे प्रयास को नकार दिया।


जहां तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसे फिर से मुद्दा बनाने की बात है, तो इस संदर्भ में सिक्के के दोनों पहलुओं पर गौर करना चाहिए। पहला यह कि जब देश में धड़ाधड़ आतंकवादी हमले और श्रृंखलाबध्द बम विस्फोट हो रहे हों तो चुनावी भाषणों से यह मुद्दा गायब रहे, ऐसा संभव नहीं है। दूसरा पहलू यह है कि राजनीतिक दलों को शायद लगता है कि भावनाओं के सहारे नैया पार लगाई जा सकती है। आतंकवाद के कारण जनमानस उद्वेलित है और उसकी इन भावनाओं का लाभ उठाने का जो प्रयास किया गया उसमें शायद अति हो गई। क्योंकि आतंकवाद, आतंकवाद, आतंकवाद चिल्लाने भर से जनता को यह नहीं लगेगा कि आप उसके प्रति गंभीर हैं। आपने आतंकवाद को खत्म करने के लिए अब तक जो ठोस कदम उठाये या आतंकवाद को रोकने के लिए आपकी क्या रणनीतियां होंगी (जिन्हें सार्वजनिक किया जा सके) आदि जनता को बताइये क्योंकि सिर्फ दोषारोपण से काम नहीं चलने वाला। जब आप ऐसा करेंगे तभी जनता आपकी सुनेगी।


जम्मू-कश्मीर में तो आतंकवाद शुरू से ही चुनावी मुद्दा रहा है और वहां की जनता हर बार किसी अन्य पार्टी को इस आशा के साथ वोट देती है कि वह इसे खत्म करने की दिशा में कदम उठायेगा ताकि अमन-चैन और शांति की बहाली हो सके। लेकिन होता कुछ और है। वहां की पिछली सरकार की हीलिंग टच नीति को ही लीजिये, क्या वह कारगर सिध्द हुई?


आज देश में आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल चुनावी लाभों के लिए किया जाने लगा है। मसलन कुछ समय पहले एक दल की ओर से सरकार पर आरोप लगाया गया कि सरकार ने आर्थिक आतंकवाद फैला रखा है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान एक दल की नेता ने वहां की सरकार पर आतंकवादी होने का आरोप लगा दिया। इसी प्रकार आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए विभिन्न दल कर रहे हैं और जब आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात आत है तो वह एकजुट होने का दिखावा भर कर देते हैं।


आज जरूरत इस बात की है कि आतंकवाद को चुनावी राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाये। इस मुद्दे से निपटने के लिए पार्टी हित से ऊपर उठकर सोचा जाये। जनता को भी चाहिये कि वह आतंकवाद को चुनावी मुद्दा बनने से रोके।


नीरज कुमार दुबे

Sunday, 7 December, 2008

अब बातों से काम मत चलाइये, कुछ कर दिखाइये 'सरकार'


आतंकवाद से निपटने के लिए संघीय एजेंसी बनाये जाने पर इन दिनों गृह मंत्रालय जुटा हुआ है। खबरों के अनुसार, इस एजेंसी का खाका भी तैयार कर लिया गया है जिसे संभवत: संसद सत्र में प्रस्तुत किया जायेगा। आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार प्रयत्नशील दिख रही है यह अच्छी बात है। मनमोहन सरकार के समक्ष अब यह चुनौतीपूर्ण स्थिति है कि वह देश को दिखाये कि वाकई वह आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीर है। क्योंकि इस सरकार ने अब तक आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखा है।


मैं यहां किसी दल के पक्ष में राय नहीं व्यक्त कर रहा हूं। मैं तो आम जनमानस के मन की बात कह रहा हूं क्योंकि अहमदाबाद और मालेगांव में हुए बम विस्फोटों की बातें छोड़ दें तो जयपुर, दिल्ली और असम में हुए विस्फोटों को अंजाम देने वाले खुले घूम रहे हैं और शायद सरकार इन विस्फोटों को भूल भी चुकी हो। भूल तो वह मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों को भी चुकी है यह बात तब उभर कर सामने आई जब गत सप्ताह कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ब्रीफिंग के लिये आये। पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि मुंबई हमलों के बारे में कैबिनेट में क्या चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि यह विषय बैठक में नहीं आया। जरा सोचिये, जिस विषय पर पूरी दुनिया इस समय चर्चा कर रही है हमारी कैबिनेट ने उस विषय पर चर्चा तक गवारा नहीं समझा। यह बात अलग है कि सरकार इस विषय को राजनयिक रूप से याद रखे हुए है और विभिन्न चैनलों की मदद से पाकिस्तान पर दबाव बना रही है।


हम सभी कहते रहे हैं कि भारत शक्तिशाली देश बनने की ओर अग्रसर है। दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में हमारी काबिलियत का डंका बज रहा है लेकिन जब अपनी सुरक्षा की बात आई है तो हम दूसरों से दबाव बनवा रहे हैं। क्या अमेरिका पर जब हमला हुआ तो उसने अफगानिस्तान पर दबाव बनाने के लिए किसी की मदद ली थी? क्या जब इजराइल पर गाजा पट्टी से कोई गोला दागा जाता है तो वह उसका त्वरित जवाब देने के लिए किसी की मदद लेता है? क्या रूस ने पिछले दिनों जार्जिया पर हमला करने के लिए किसी से पूछना भी मुनासिब समझा। पश्चिमी देशों और यूरोपीय देशों की नाराजगी को धता बताकर वह जार्जिया में अपनी कार्रवाई को अंजाम देने में सफल रहा। मैं यहां यह नहीं कह रहा कि इन सब उदाहरणों में से कौन-सी कार्रवाई सही थी और कौन-सी गलत। लेकिन इतना तो है कि जब खुद पर बात आई तो सबने पहले अपने देश की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।


मैंने पिछले दिनों कई ऐसे ओपिनियन पोल देखे जिनमें देश की जनता ने पाकिस्तान के विरुध्द कार्रवाई के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की थी लेकिन मुझे लगता है कि हमारे यहां राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यह सही है कि हम वार्ता के जरिये समस्यायें हल करना चाहते हैं, पहला प्रयास यह होना भी चाहिये लेकिन हर बार यही प्रयास हो और उससे कोई हल नहीं निकले तो उस प्रयास को बदलना ही चाहिये। जैसे डॉक्टर किसी दवा के असर न करने पर मरीज के लिए नई दवा लिख देता है उसी प्रकार हमें भी अपना प्रयास बदलने की जरूरत है।


आज का भारत युवाओं का भारत है। इस भारत के युवाओं के सपने अच्छी नौकरी या खुद का व्यवसाय, मैट्रो शहर में अच्छा घर, कार तथा अन्य सुविधायें हैं। वह देश की तरक्की में अपनी मेहनत से योगदान देने को तत्पर है लेकिन उसे भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्त माहौल तो दीजिये।


आतंकवाद से निपटने के लिए सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा बल्कि अब कुछ कर के दिखाना होगा। आज वाकई देश में एक ऐसे सख्त आतंकवाद निरोधक कानून की जरूरत है जिससे कि आतंकवादियों के हौसले पस्त किये जा सकें। लेकिन यह भी सही है कि पूर्व में पोटा जैसा सख्त कानून होते हुए भी संसद पर हमला, कंधार कांड, जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला, अक्षरधाम मंदिर पर हमला और जम्मू में रघुनाथ मंदिर पर हमला तथा लालकिले पर हमला आदि घटनाएं हुई थीं और उस कानून को आतंकवाद से लड़ने की बजाय एक वर्ग विशेष के खिलाफ कानून के तौर पर ज्यादा देखा गया था।
लेकिन इसके बावजूद सख्त आतंकवाद निरोधी कानून की प्रासंगिकता खत्म नहीं हो जाती। आज आतंकवाद जिस तेजी से अपने पांव पसार रहा है ऐसे में राजनीतिक हित पूरे करने की सोच की बजाय देश के बारे में सोचना होगा। लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से ही काम नहीं चलने वाला। आतंकवाद से लड़ने की यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो और सख्त कानून को भेदभाव रहित तरीके से लागू करने की मंशा हो तो आतंकवाद से निपटना कोई असंभव कार्य नहीं है।


हमारे यहां लोग आतंकवाद से लड़ने के लिए टाडा या पोटा कानून को लेकर भले उलझे हुए हों लेकिन अमेरिका ने 11 सितम्बर को हुए आतंकवादी हमले से सीख लेते हुए पोटा से भी सख्त कानून 'यूएसए-पैट्रियोट एक्ट' 26 अक्टूबर 2001 को बनाया। इसका असर भी देखने को मिल रहा है कि भले ही अमेरिका के आतंकवादियों के निशाने पर होने की कितनी ही खबरें आती हों लेकिन अमेरिका में 11 सितम्बर के बाद से कोई आतंकवादी घटना नहीं घटी है साथ ही इस कानून से लोगों के अधिकारों का भी हनन नहीं हुआ है। यही नहीं लंदन में 7 जुलाई 2005 को हुए आतंकवादी हमलों के बाद ब्रिटेन ने भी 30 मार्च 2006 को सख्त कानून 'टेररिज्म एक्ट-2006' बनाया। फिलीपीन्स ने भी आतंकवाद की वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर मिल रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए फरवरी 2007 में सख्त आतंकवाद निरोधक कानून बनाया जिसे 'ह्यूमन सिक्योरिटी एक्ट ऑफ 2007' के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा आस्ट्रेलिया में सत्तापक्ष और विपक्ष ने 2004 में आपस में सहयोग कर आतंकवाद निरोधी कानून बनाया। लेकिन अपने यहां विभिन्न दलों में इसको लेकर मतैक्य नहीं है।


नीरज कुमार दुबे

हौसला बढ़ाने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद


ब्लॉग जगत में मेरा जिस प्रकार स्वागत हुआ, उससे मैं अभिभूत हूं। वाकई अपने भावों की अभिव्यक्ति का यह एक सशक्त माध्यम है। एक ऐसा मंच है जहां आपकी बात सुनने के लिए गंभीर लोग मौजूद हैं। देशभक्ति का जज्बा लोगों में किस कदर भरा है, यह मेरे लेख पर आई प्रतिक्रियाओं से भी ज्ञात हुआ। वाकई मैं आप सभी का समर्थन पाकर स्वयं को धन्य महसूस कर रहा हूं। आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई जारी रहेगी। पहले देश से इस आतंकवाद रूपी राक्षस का संहार करेंगे उसके बाद दुनिया से ताकि विश्व में अमन, चैन, शांति और भाईचारे का वास हो।


मैं श्री संजीव कुमार सिन्हा, श्री गिरिश बिल्लोरे 'मुकुल', श्री अक्षय मान, श्री अशोक मधुप, श्रीमती रचना गौड़ 'भारती' जी, श्री प्रवीण त्रिवेदी, श्री दिनेश राय द्विवेदी, श्री धीरू सिंह, श्री दिगम्बर नासवा और श्री राजीव जी आदि का विशेष रूप से धन्यवाद व्यक्त करना चाहता हूं। आप लोगों द्वारा व्यक्त किये गये शब्दों ने मन में अतिरिक्त ऊर्जा भरने का काम किया। मैं आप सभी को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि अपने 'लक्ष्य' की प्राप्ति के लिए पूरी ईमानदारी के साथ कर्तव्य निभाऊंगा। आप सभी को धन्यवाद देर से व्यक्त कर सका इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। दरअसल व्यस्तता इतनी रहती है कि 24 में से सिर्फ चार घंटे ही सो पाता हूं। उन चार घंटों में से कुछ समय निकालकर यह पत्र लिख रहा हूं जिसे रविवार को पोस्ट करूंगा।

प्रभु हमारे देश को आतंकवाद रूपी राक्षस से दूर रखे और हम सभी भारतवासी सुखी, समृध्द और स्वस्थ रहें, ऐसी मेरी हृदय से कामना है। आप सभी के लिए ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ

नीरज कुमार दुबे

Sunday, 30 November, 2008

आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता ही शहीदों को सच्ची श्रध्दांजलि होगी




इस वर्ष की शुरुआत उत्तर प्रदेश के रामपुर में सीआरपीएफ के कैम्प पर हुये आतंकवादी हमले से हुई जिसमें कई जवान मारे गये। उसके बाद से देश में कई सिलसिलेवार बम धमाके हुए। पहले राजस्थान, फिर गुजरात, फिर दिल्ली, उसके बाद मालेगांव, मोड्सा, फिर त्रिपुरा, उसके बाद असम और अब मुंबई में आतंकवादी हमला। इन हमलों में आम जनता को तो अपनी जान से हाथ धोना ही पड़ा साथ ही बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की भी जान गई।

यह हमले खुफिया चूक का परिणाम थे यह राजनीतिक कुप्रबंधन के। यह सोचना विश्लेषकों का काम है। मैं तो हर उस सुरक्षा बल के शहीद होने पर गमगीन हो जाता हूं जिसको खुफिया चूकों या फिर कुप्रबंधनों के कारण हुए हमलों में देश की रक्षा करते हुए अपनी शहादत देनी पड़ती है। यह शहादत सिर्फ उस व्यक्ति ने नहीं दी होती। शहादत उनके परिवारों ने भी दी होती है। किसी भी जवान या अधिकारी के शहीद होने पर उन्हें हम उस समय तो सलाम कर देते हैं लेकिन क्या 15 दिन बाद हमें उस शहीद की याद रहती है? क्या हम कभी उसके परिवार की सुध लेने जाते हैं? यही नहीं शहादत देने वालों की शहादत पर राजनीतिक रोटियां भी सेंकी जाती हैं। पिछले दिनों दिल्ली में बाटला हाउस मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा का मामला इसका सशक्त उदाहरण है। जिस शख्स ने दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के साजिशकर्ताओं अथवा अंजाम देने वालों से मुठभेड़ के दौरान सीने पर गोली खाई उसकी शहादत पर सवालिया निशान उठाये गये क्या यह सुरक्षा बलों के मनोबल को गिराने का प्रयास नहीं है?

यही नहीं मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में देश ने हेमंत करकरे, अशोक आम्टे, विजय सलास्कर जैसे पुलिस के वरिष्ठ और जांबाज अधिकारी और शशांक शिंदे, प्रमाश मोरे, बापूसाहेब दुरुगड़े, तुकाराम ओंबले, नाना साहेब भोंसले, अरुण चिते, जयवंत पाटिल, योगेश पाटिल, एमसी चौधरी और अंबादास पवार जैसे कर्मठ सिपाहियों के साथ ही एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को खो दिया। इसके अलावा 185 लोगों की जानें गईं, सो अलग। कौन है इनका जवाबदेह? क्या गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तथा अन्य अधिकारियों के इस्तीफे इन सबकी जान लौटा सकेंगे? जिस तरह हम इन घटनाओं को अंजाम देने वालों को सजा देने की मांग करते हैं उसी प्रकार ऐसी चूकें करने वालों को भी कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।

बहुत दिनों से मेरे मन में आतंकवाद के खिलाफ कुछ कर गुजरने की बात चल रही थी। आतंकवादी जब देश के किसी भी हिस्से को छलनी करते हैं तो खून खौल उठता है। भगवान से यही तमन्ना है कि मैं स्वाभाविक या हादसे में मृत्यु का शिकार नहीं बनूं। इन आतंकवादियों से लड़ते हुए ही देश के लिए वीरगति को प्राप्त होऊं। मेरा यह भी मानना है कि आतंकवाद से लड़ना सिर्फ सरकार के बस की बात नहीं है इसके लिए हर भारतीय को एकजुट होना होगा। धर्म, जाति, राजनीति से परे हटकर हमें सोचना होगा कि यदि देश ही नहीं रहेगा तो बाकी सब बातों का क्या महत्व रहेगा। आइये, इस ब्लॉग के जरिये हम आतंकवाद से लड़ने का संकल्प एकजुटता के साथ लें। फिर कोई आतंकवादी भारत माता को कहीं घाव पहुंचाने ना पाये, इसके लिए हम सभी सजग हों। आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता ही शहीदों को सच्ची श्रध्दांजलि होगी।

भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Wednesday, 1 October, 2008