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Monday, 27 December, 2010

विनायक सेन को मिली सजा का भाव समझिए

राजद्रोह के आरोप में डाॅ। विनायक सेन और उनके दो साथियों को मिली उम्रकैद की सजा सही है या गलत, इसका निर्णय तो ऊपरी अदालत करेगी लेकिन छत्तीसगढ़ की स्थानीय अदालत ने अपने फैसले से उन लोगों को कड़ा संदेश दे दिया है जो जन सेवा की आड़ में अपने को कानून और देश से ऊपर समझने लगते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर कुछ भी कह देना सही नहीं है। ऐसा करने वालों को कड़ा सबक सिखाए जाने की जरूरत है।

यह देख कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि सेन को मिली सजा के खिलाफ कई बड़े पत्रकारों, लेखकों और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने आवाज उठाई। सेन के साथ काम कर चुके या कर रहे लोगों ने भी उन्हें भला आदमी बताते हुए अदालती फैसले पर हैरानी जताई है और इसे घोर अन्याय करार दिया है। यहां सवाल यह है कि जब माओवादी या नक्सली सुरक्षा बलों या निहत्थे ग्रामीणों पर हमला करते हैं और सरकार को चुनौती देने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेते हैं तब यह बड़े पत्रकार, लेखक, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन कहां चले जाते हैं, तब क्यों यह खामोश हो जाते हैं और पुलिसिया कार्रवाई होते ही उसकी निंदा करने के लिए फिर खड़े हो जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि सेन 80 के दशक से ही छत्तीसगढ़ में रह कर रोगियों की सेवा कर रहे हैं लेकिन इतने भर से यह पाप धुल नहीं जाता कि उन्होंने राज्य के खिलाफ माओवादियों का साथ दिया।

अदालत ने सेन सहित दो अन्य लोगों- नक्सल विचारक नाराय्ाण सान्य्ााल अ©र क¨लकाता के कार¨बारी पीय्ाूष गुहा क¨ भारतीय्ा दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्र¨ह) अ©र 120बी (षड्य्ांत्र) तथा छत्तीसगढ़ विशेष ल¨क सुरक्षा कानून के तहत द¨षी ठहराय्ाा है। अदालती आदेश पर उंगली उठाने वालों को यह पता होना चाहिए कि कोई भी अदालत पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में फैसला नहीं सुनाती उस पर से यदि उम्रकैद जैसी बड़ी सजा दी जा रही है तो उसके पीछे पर्याप्त कारणों का मजबूत आधार जरूर होगा। छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े करने से पहले यह भी सोचना चाहिए कि आखिर उनकी विनायक सेन से क्या व्यक्तिगत दुश्मनी हो सकती है। सरकार और पुलिस की लड़ाई तो माओवादियों, नक्सलियों से है और जो उनका साथ देगा वह कानून की जद में आएगा ही भले ही उसने कितने परोपकार के कार्य किये हों या फिर मानवता के लिए कितना भी बड़ा बलिदान दिया हो। कानून सबके लिए बराबर है। सेन पर यदि कोई फौजदारी अथवा अन्य मुकदमा होता तो उनके मानवतावादी कार्यों के चलते शायद अदालत उन्हें कुछ राहत दे भी देती लेकिन राजद्रोह जैसे संगीन आरोप में उन्हें कोई रियायत न देकर अदालत ने जो संदेश देश भर में दिया है उसकी सराहना की जानी चाहिए।

अदालती निर्णय की आलोचना कर हम मात्र एक व्यक्ति को बचाना चाह रहे हैं जबकि ऐसा करने से उन लोगों के हौसले बुलंद होंगे जो अपने बयानों और कार्यों के चलते न सिर्फ लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं बल्कि देश के आंतरिक मामलों को विश्व में विवादित बनाकर सरकार की मुश्किलें भी बढ़ाते हैं। नक्सलियों से जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सेन, कोबाद गांदी और अरुंधति राय जैसे लोगों के चलते सरकार के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। सेन और कोबाद जैसे लोगों पर आरोप है कि वह नक्सलियों के प्रबुद्ध वर्ग हैं और उनकी विचारधारा को फैला रहे हैं। यदि यह आरोप सही है तो उन्हें खुल कर अपना कार्य करना चाहिए क्योंकि जन सेवा की आड़ में ऐसा कर वह सभी को मूर्ख बना रहे हैं।

निश्चित रूप से जन सेवा के कार्यों के लिए विनायक सेन की सराहना होनी चाहिए लेकिन यदि उन्होंने राज्य्ा के खिलाफ संघर्ष का नेटवर्क तैय्ाार करने के लिए माअ¨वादिय्ा¨ं के साथ साठगांठ की, (इस आरोप में वह दोषी ठहराये गये हैं) तो इसकी निंदा भी की जानी चाहिए। विनायक सेन को मिली सजा के विरोध में खड़े लोगों को यह समझना चाहिए कि उनका समर्थन अरुंधति राय और हुर्रियत नेता गिलानी जैसे लोगों का हौसला बढ़ाएगा और भारतीय सरजमीं पर ही भारत विरोधी बातें करने की और घटनाएं होती रहेंगी। सेन को मिली सजा की मात्रा कितनी सही है या कितनी गलत इसका निर्णय करने का अधिकार ऊपरी अदालत पर छोड़ दें क्योंकि देश का न्याय तंत्र बेहद लोकतांत्रिक और परिपक्व है।

जय हिन्द, जय हिन्दी
नीरज कुमार दुबे

Monday, 13 December, 2010

शहादत पर सियासत से कैसे रुकेगा आतंकवाद?

अपने बड़बोले बयानों से पहले भी विवाद खड़ा करते रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का यह कहना कि हेमंत करकरे ने मुंबई हमले से कुछ घंटे पहले मुझे फोन कर कहा था कि उन्हें हिंदू आतंकवादियों से खतरा है, सोची समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेतृत्व भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष की ओर से बनाए जा रहे दबाव के चलते परेशानी में है और संसद का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया तथा कई महत्वपूर्ण विधेयकों के पास नहीं होने के चलते सरकार अजीब संकट की स्थिति में है। साथ ही वाराणसी में हुए विस्फोट मामले में भी केंद्र को ही निशाने पर लिया जा रहा है।

भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जनता को उद्वेलित करने में विपक्ष कामयाब नहीं हो जाए इसके लिए कांग्रेस की ओर से देश का राजनीतिक माहौल बदलने का बीड़ा दिग्विजय सिंह ने उठाया। मुंबई हमला चूंकि देश पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला था और इसे लेकर जनता में अब भी आक्रोश है, सो दिग्विजय ने कहा कि तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को हिंदुत्ववादी ताकतों से खतरा था। हिंदुत्ववादी ताकतों से उनका सीधा आशय हमेशा से संघ परिवार से ही रहा है। जब उनके इस बयान पर विवाद हुआ और खुद उनकी ही पार्टी ने दिग्विजय के इस बयान से अपने को दूर कर लिया तो दिग्विजय भी पलटी मार गए। लेकिन पलटी मारते मारते भी दिग्विजय यह कहने से नहीं चूके कि उन्होंने मुंबई हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकवादियों’ का हाथ होने की बात नहीं की। ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द को स्थापित करने में जीजान से जुटे दिग्विजय ने यह बयान भले ही अपनी सियासी रणनीति के तहत दिया हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके इस बयान से भारत का यह पक्ष कमजोर हुआ कि मुंबई हमला पूरी तरह पाकिस्तान आधारित हमला था और इसे पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों ने अंजाम दिया।

दिग्विजय ने अपनी पार्टी के हित के लिए इस बयान से 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला तथा राष्ट्रमंडल खेल घोटाले को लेकर गर्म राजनीतिक माहौल से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश की लेकिन वेबसाइट विकीलीक्स पर जारी अमेरिकी दस्तावेजों ने पार्टी की मुश्किलें यह कह कर बढ़ा दीं कि मुंबई हमले के बाद कुछ कांग्रेसी नेताओं ने धर्म की राजनीति शुरू कर दी थी। इससे अब तक दूसरे दलों पर साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाती रही कांग्रेस खुद ही ऐसे आरोपों से घिर गई। विकीलीक्स पर जारी दस्तावेजों के मुताबिक भारत में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने देश में भेजी रिपोर्ट में कहा कि अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन मंत्री एआर अंतुले ने 26/11 में हिंदुत्ववादी ताकतों का हाथ होने का आरोप लगाया और कांग्रेस ने इस बयान का सियासी लाभ उठाने के लिए इसे खारिज नहीं किया।

दिग्विजय और विकीलीक्स के खुलासे कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावों को विरोधाभासी करार देते हैं। इससे विपक्ष के उन आरोपों को भी बल मिलता है कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों को साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर चुनावी लाभ अर्जित करती रही है।

विवादित बयान देकर भाजपा पर ही सवालों की झड़ी लगाने वाले दिग्विजय से भी कुछ सवाल पूछे जाने चाहिएं। पहला सवाल तो यही है कि यह बात उन्होंने दो वर्ष तक छिपाए क्यों रखी? उन्होंने मुंबई हमलों की जांच से जुड़ी एजेंसियों को यह बात अब तक किस कारण से नहीं बताई थी? दिग्विजय के बयान से यह सवाल भी उठता है कि कोई एटीएस प्रमुख किसी राजनीतिक पार्टी के नेता से अपनी मुश्किलें क्यों बयां करेगा? इससे तो उन आशंकाओं को बल मिलता है कि कोई जांच किसी पार्टी द्वारा निर्देशित की जा रही है। गौरतलब है कि करकरे मालेगांव विस्फोट मामले की जांच कर रहे थे और उन पर हिंदुत्ववादी ताकतों ने साध्वी प्रज्ञा और अन्य को बेबुनियाद आरोपों में फंसाने का आरोप लगाया था। दिग्विजय और करकरे के इस कथित वार्तालाप पर कांग्रेस के अन्य महासचिव जनार्दन द्विवेदी की इस सफाई को ‘मासूम’ ही कहा जाएगा कि करकरे का परिवार मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखता था इसलिए उनकी दिग्विजय से जान पहचान थी। पता नहीं कितने ऐसे एटीएस प्रमुख होंगे जिनका किसी और राज्य से नाता हो तो क्या वह भी वहां के किसी राजनीतिक पार्टी के नेता को अपनी मुश्किलें बताते हैं? यदि करकरे को कोई मुश्किल थी तो वह महाराष्ट्र के पुलिस प्रमुख, गृह सचिव, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यपाल को बता सकते थे ऐसे में वह भला दिग्विजय को क्यों चुनते। यदि वह दोनों मित्र भी थे तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि यह मित्रता कब से थी और किस स्तर की थी? जो व्यक्ति इस दुनिया में नहीं हो, उसके बारे में कोई भी दावा किया जा सकता है लेकिन ऐसा करने से पहले जरा नैतिकता की बात करने वालों को यह तो सोच लेना चाहिए कि उन्हें सिर्फ अपना सियासी भला ही क्यों नजर आता है?

दिग्विजय के बयान के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने तथ्यों को एकत्रित कर गृहमंत्री और पुलिस विभाग से चर्चा करने की बात कही है, लेकिन सच सामने आ पाएगा इसमें संदेह है क्योंकि आखिरकार मुख्यमंत्री तो कांग्रेस पार्टी का ही है। जिस तरह दिग्विजय ने राजनीतिक दांव खेलने के लिए यह विवादित बयान दिया उसी प्रकार कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए उसकी सहयोगी राकांपा तथ्यों को एकत्रित करने की बात कर रही है। जबकि सुबूतों से यह बात साबित हो चुकी है कि समुद्र के रास्ते आए पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई हमले को अंजाम दिया और करकरे सहित विभिन्न पुलिसकर्मी उनकी गोलियों के शिकार हुए। करकरे की पत्नी ने भी दिग्विजय के बयान के बाद साफ कहा है कि उनके पति की शहादत का मजाक नहीं बनाया जाए। कविता करकरे ने कहा, ’’यह कहना गलत है कि मेरे पति को हिंदू संगठनों ने मारा है। वह आतंकी हमले में शहीद हुए हैं।’’
उक्त विवादित बयान के बाद भले ही दिग्विजय ने पलटी मार ली हो लेकिन वह भाजपा सहित संघ परिवार के निशाने पर एक बार फिर आ गए हैं। भाजपा ने इसे नया विवाद खड़ा करने की सोची समझी रणनीति बताते हुए प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष से सफाई मांगी है तो शिवसेना ने कहा कि इससे यह बात साफ हो गई है कि कांग्रेस नेता मालेगांव मामले की जांच को नियंत्रित कर रहे हैं। यही नहीं दिग्विजय को अपने इस बयान के लिए अपनी ही पार्टी के भीतर भी आलोचना सुनने को मिल रही है। मुंबई से कांग्रेस सांसद संजय निरूपम ने दिग्विजय के बयान को गैरजरूरी करार दिया है।

दिग्विजय के इस बयान के सियासी कारणों पर निगाह डाली जाए तो फौरी तौर पर कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों पर खड़ी चुनौतियों के अलावा असम विधानसभा चुनाव भी हैं। दिग्विजय को हाल ही में असम का प्रभार सौंपा गया है। संभव है उन्होंने अल्पसंख्यक वोटों को लुभाने के लिए यह चाल चली हो। पहले भी वह उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दिल्ली के बाटला मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के आजमगढ़ स्थित घर जाकर राजनीतिक बवाल खड़ा कर चुके हैं।

आजकल आरएसएस और हिंदुत्ववादी ताकतों को विशेष रूप से अपने निशाने पर लिए दिग्विजय कांग्रेस में दूसरे ‘अर्जुन सिंह’ बनने की कवायद में जुटे हुए हैं। यह सही है कि उन्होंने अपने बयानों से अब तक जो विवाद खड़े किए उससे कांग्रेस भी मुश्किलों में फंसी चाहे वह नक्सल समस्या से निबटने में चिदंबरम की विफलता को लेकर उनका लिखा लेख हो या फिर बाटला मुठभेड़ पर सवाल उठाने का, सभी मामलों में कांग्रेस मीडिया से आसानी से पल्ला नहीं छुड़ा पाई। लेकिन एक बात काबिले गौर है कि दिग्विजय जो भी विवाद खड़ा करें पार्टी के बड़े वर्ग का समर्थन उन्हें हासिल रहता है। चिदंबरम पर दिग्विजय की टिप्पणी के बाद ‘कांग्रेस संदेश’ में पार्टी अध्यक्ष ने नक्सल समस्या पर अपना जो मत रखा वह दिग्विजय के मत से मिलता जुलता था। यही नहीं दिग्विजय ने ही सबसे पहले ‘हिंदू आतंकवाद’ का मुद्दा उठाया और जब चिदंबरम ने भी यही बात कही तो यह बड़ा मुद्दा बन गया। दिग्विजय संघ और सिमी को एक जैसा काफी समय पहले से बताते रहे हैं लेकिन जब राहुल गांधी ने यही बात कही तो यह भी बड़ा मुद्दा बन गया। साफ है कि कांग्रेस के भीतर से उन्हें शह हासिल है। वह पहले तीर छोड़ते हैं यदि वह निशाने पर जा लगे तो पार्टी आलाकमान उसे बड़ा हथियार बना देता है।
अपने बयान पर विवाद होने के बाद अब भले ही दिग्विजय कह रहे हैं कि उनके कहने का मतलब यह नहीं था कि मुंबई हमले को आरएसएस ने अंजाम दिया लेकिन आरएसएस की छवि बिगाड़ने के अपने दायित्व को बखूभी निभा रहे दिग्विजय ने अपना काम तो कर ही दिया। पर विकीलीक्स के खुलासों से कांग्रेस मुश्किल में आ गई है क्योंकि एक तो इस पर वह स्पष्ट रूप से कुछ कह नहीं पा रही है दूसरे विपक्ष के अनुसार इससे कांग्रेस की इस योजना पर कुछ तो ग्रहण लगा ही है कि साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर लाभ अर्जित किया जाए।

बहरहाल, इस प्रकरण से कांग्रेस के सामने जो नई मुश्किल खड़ी हुई है उससे बाहर निकलना इतना आसान नहीं है क्योंकि विकीलीक्स के खुलासों ने विपक्ष को भी धारदार हथियार मुहैया करा दिया है। 2009 के लोकसभा चुनावों में एक बार फिर विजय प्राप्त करने के बाद शायद ही कांग्रेस ने सोचा होगा कि डेढ़ साल के भीतर सरकार बड़ी मुश्किलों का सामना करती दिखाई देगी। अब देखना यह है कि मुंबई हमले को राजनीतिक रंग देने की दिग्विजय की कवायद क्या गुल खिलाती है? यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या सचमुच इसके कारण देश का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दों से हट जाएगा?

आज संसद पर हुए आतंकवादी हमले को पूरे 9 वर्ष हो गए इस मौके पर संसद हमले के दौरान शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों और संसद भवन कर्मचारियों को सच्चे मन से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उम्मीद करता हूं कि सरकार कुम्भकर्णी नींद से जागेगी और इस हमले के गुनहगार अफजल गुरु को फांसी की सजा पर जल्द से जल्द तामील करेगी।

जय हिन्द
भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Monday, 30 August, 2010

आतंकवाद तो पहले ही काला है, इसे किसी और रंग में न रंगें


केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने आतंकवाद को ‘भगवा’ रंग से जोड़कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जब जरूरत आतंकवाद से निपटने के उपायों को पुख्ता बनाने की और इसके विरोध में एक साथ खड़े होने की है तो गृहमंत्री शायद इसमें व्यस्त रहे कि पहले आतंकवाद का ‘प्रतीक रंग’ तय कर दिया जाए। पिछले सप्ताह नई दिल्ली में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और पुलिस महानिरीक्षकों के तीन दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कह दिया कि हाल ही में हुए कई बम विस्फोटों से ‘भगवा आतंकवाद’ का नया स्वरूप सामने आया है। चिदम्बरम ने यह बात कह कर साम्प्रदायिक सौहाद्र्र कायम रखने के अपने ही सरकार के वादे को तोड़ने का प्रयास तो किया ही साथ ही अपनी पार्टी और सरकार को भी मुश्किल में डाल दिया। चिदम्बरम के इस बयान का विरोध सिर्फ विपक्ष ने ही नहीं बल्कि खुद उनकी पार्टी ने भी किया है। कांग्रेस ने साफ किया है कि आतंकवाद को भगवा रंग से जोड़ा जाना सही नहीं है क्योंकि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता है।

यह आश्चर्यजनक है कि चिदम्बरम की यह टिप्पणी उसी सम्मेलन में आई जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की आंतरिक सुरक्षा और एकता के समक्ष विभिन्न प्रकार की चुनौतियों पर चिंता जताई थी। यह अपने आप में बड़ा विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि प्रधानमंत्री तो अमन चैन कायम रखने पर जोर दें और गृहमंत्री ऐसा बयान दे डालें जिससे समुदायों के बीच खाई पैदा हो या फिर किसी समुदाय को हेय दृष्टि से देखा जाए। आतंकवाद को भगवा रंग से जोड़ने के चिदम्बरम के बयान को बतौर गृहमंत्री उनकी तीसरी बड़ी गलती भी कहा जा सकता है। इससे पहले वह पिछले वर्ष तेलंगाना मुद्दे पर जल्दबाजी दिखा कर केंद्र और राज्य सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर चुके थे। दूसरी गलती उन्होंने खुद नक्सलियों से निपटने में रणनीतिक विफलता की स्वीकारते हुए प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा देने का प्रस्ताव पेश किया था। और अब तीसरी गलती जो उन्होंने की है उस पर भी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। अपने इस बयान से चिदम्बरम जहां समूचे संघ परिवार के निशाने पर आ गए हैं वहीं हिन्दू संगठनों को घेरने का बहाना ढूंढने वालों को एक ‘बढ़िया’ मौका मिल गया है।

जरा ‘भगवा आतंकवाद’ संबंधी टिप्पणी की टाइमिंग देखिये। अगले माह संभवतः दूसरे सप्ताह में अयोध्या विवाद पर अदालत अपना फैसला सुना सकती है तो उसी माह चैथे सप्ताह के अंत में या फिर अक्तूबर की शुरुआत में बिहार में विधानसभा के चुनाव होने हैं। अयोध्या में रामजन्मभूमि पर राम मंदिर की मांग सीधे संघ परिवार और भाजपा से जुड़ी है तो बिहार में चुनावों पर भाजपा का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है क्योंकि वह वहां सत्तारुढ़ गठबंधन में है। बिहार में जाहिर है चिदम्बरम की उक्त टिप्पणी से राजनीतिक गर्मी पैदा होगी। वहां कांग्रेस अपने आप को खड़ा करने के लिए मुख्य रूप से मुस्लिम मतों की ओर ताक रही है। साथ ही चिदम्बरम की इस टिप्पणी से वहां भाजपा के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी होंगी क्योंकि उसे एक तो खुद अपनी सहयोगी जद-यू से जूझना होगा जोकि सीटों के बंटवारे और नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार के लिए नहीं आने देने को लेकर उस पर पहले से ही दबाव बनाए हुए है। दूसरा भाजपा को वहां इस मुद्दे पर विपक्ष के हमलों को भी झेलना होगा। लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने तो हिन्दू संगठनों पर पाबंदी लगाने की मांग कर ‘भगवा आतंकवाद’ को चुनावी मुद्दा बनाने के प्रबल संकेत भी दे दिए हैं। जाहिर है बिहार विधानसभा चुनावों की सरगर्मी बढ़ाने का काम गृहमंत्री की टिप्पणी ने भलीभांति कर दिया है।

लेकिन हमारे नेतागण शायद भूल रहे हैं कि आतंकवाद तो मुद्दा बन सकता है लेकिन आतंकवाद को कोई रंग देना या उसे किसी धर्म अथवा वर्ग विशेष से जोड़ना मुद्दा नहीं बन सकता। जब लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अफजल गुरु को चुनावी मुद्दा बनाया था तो इसे एक खास समुदाय के विरोध के तौर पर देखा गया लेकिन जनता ने इस मुद्दे की हवा निकाल दी। अब ऐसा ही कुछ ‘भगवा आतंकवाद’ के मुद्दे का भी हश्र हो सकता है। वैसे बात यहां इन मुद्दों के राजनीतिक हश्र होने अथवा नहीं होने की नहीं है, बात यह है कि इस बयान से हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुंची है। हर हिन्दू संघी अथवा भाजपाई तो है नहीं, जो इसे राजनीतिक ‘तीर’ मान कर सह जाए और वार करने की अपनी बारी का इंतजार करे। आम लोगों के लिए धर्म राजनीति से परे होता है। यह बात राजनीतिज्ञों को क्यों नहीं समझ आती?

चिदम्बरम की छवि कुशल प्रशासक की रही है इसलिए ‘भगवा आतंकवाद’ संबंधी उनकी टिप्पणी पर हैरत होती है। उन जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ को यह पता होना चाहिए कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। हरा, नीला, भगवा, गुलाबी आदि रंगों से आतंकवाद को नहीं जोड़ा जा सकता। यदि आतंकवाद से किसी रंग को जोड़ने की बाध्यता ही है तो उसे काले रंग से जोड़ दें क्योंकि आतंकवाद जहां भी कहर बरपाता है वहां सिर्फ काला अध्याय ही छोड़ता है। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि ‘भगवा आतंकवाद’ संबंधी टिप्पणी करते समय चिदम्बरम के जेहन में क्यों सिर्फ साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और देवेंद्र गुप्ता के ही नाम आए? वह क्यों भूल गए पुणे धमाके के आरोपियों यासीन भटकल, रियाज भटकल और बंगलुरु धमाके के आरोपी मदनी को? यही नहीं गत सप्ताह कनाडा की पुलिस ने वहां की संसद को उड़ाने की साजिश का पर्दाफाश करते हुए जिन लोगों को पकड़ा है उनमें एक भारतीय भी है जिसका नाम है मिसबाहुद्दीन अहमद। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन नामों से उनके धर्मों को जोड़ना का मेरा अभिप्राय नहीं है। ऐसा किया भी नहीं जाना चाहिए। यह सभी उक्त लोग यदि आतंकवादी कृत्यों में शामिल हैं तो इन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए। लेकिन यह गलत होगा कि राजनीतिक अथवा अन्य कारणों से इन लोगों के चलते किसी धर्म विशेष पर निशाना साधा जाए या उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।

अमेरिका में 9/11 के बाद विश्व भर में ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द चल निकला। यह शब्द उतना ही गलत है जितना कि ‘भगवा आतंकवाद’। ‘इस्लामिक आतंकवाद’, ‘भगवाकरण’, ‘भगवा आतंकवाद’ और ‘भगवा उत्पाती’ सही शब्द नहीं हैं। इनके प्रयोग से बचना चाहिए। आतंकवाद को किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि आतंकवाद तथा आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता। यदि वह लोग धर्म की दुहाई देकर अपने कार्यों को अंजाम देते हैं तो उस धर्म का उनसे बड़ा दुश्मन कोई नहीं है। क्योंकि एकाध लोगों की वजह से पूरे समुदाय को बदनाम होना पड़ता है। ऐसा ही कुछ ‘भगवा आतंकवाद’ संबंधी टिप्पणी के बाद देखने को मिल रहा है।
इसके अलावा चिदम्बरम तथा अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता यह क्यों मान कर चल रहे हैं कि सारे हिन्दू राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा भाजपा से जुड़े हुए हैं और उन्हें निशाने पर लेने से सीधे भाजपा पर निशाना सध जाएगा? इसी प्रकार सभी हिन्दू संगठनों को भाजपा से जुड़ा हुआ कैसे मान लिया जाता है? जब मंगलौर में श्रीराम सेना ने वेलेंटाइन डे के विरोध में युवाओं को पीटा तो भाजपा पर राजनीतिक हमले हुए जबकि उस संगठन से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा ही गोवा के मरगांव विस्फोट मामले में संदेह के घेरे में आए अभिनव भारत और सनातन संस्था के मामले में भी भाजपा पर निशाना साधा गया जबकि खबरों के अनुसार, अभिनव भारत के लोगों से पूछताछ में यह पता चला था कि उनकी योजना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की हत्या करने की भी थी। ऐसे में इस संगठन को कैसे भाजपा के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है? यह सही है कि भारत में भी कुछ कट्टरपंथी संगठन उभर रहे हैं जो हिंसा को माध्यम बना कर लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। लेकिन हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए कि वह संगठन हिन्दू हैं या मुसलमान या फिर कोई और। इनकी पहचान एकमात्र जिहादी संगठन के रूप में ही की जानी चाहिए।

भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना एक प्रकार से हमारे राष्ट्रीय ध्वज का भी अपमान है जिसके तीन रंगों में से एक रंग भगवा अथवा केसरिया भी है। जो भगवा रंग जीवन के लिए महत्वपूर्ण सूर्योदय, अग्नि सहित भारतीय संस्कृति का भी प्रतीक है, उसे आतंकवाद के साथ यदि ‘राजनीतिक स्वार्थवश’ जोड़ा गया है तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कोई और नहीं हो सकती।

जहां छोटे से छोटे मुद्दे को लेकर राजनीति होती है, वहां ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पर राजनीति कैसे नहीं होती। संसद में इस मुद्दे पर हुए हंगामे से यह साफ हो गया कि ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पकड़कर शीघ्र ही कई दल मुस्लिमों के बीच अपना वोट बैंक मजबूत करने के प्रयास करते दिखाई देंगे। यह कैसी विकट और विचित्र स्थिति है कि हमारे राजनीतिक दल यह मानकर चलते हैं कि ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द के प्रचार से मुस्लिम प्रसन्न होंगे। उन्हें यह पता होना चाहिए कि मुस्लिम भी जितने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ के खिलाफ हैं उतने ही ‘भगवा आतंकवाद’ के भी। कई मुस्लिम सांसदों और विद्वानों ने ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पर आपत्ति जताई है। इसके अलावा देश में हुए विभिन्न विस्फोटों के बाद मुस्लिम समुदाय ने जिस प्रकार आतंकवाद के खिलाफ विरोध प्रकट कर देश की एकता बनाए रखने की बात कही, उसे किसी को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन मुश्किल भरी बात यह है कि क्षुद्र राजनीति करने वाले दलों को सभी के ‘ब्रेन वाश’ की कला आती है जिसके बल पर वह राज करते रहे हैं।

बहरहाल, यदि चिदम्बरम हिन्दुओं की छवि कट्टरवादी की बनाना चाह रहे हैं, तो यही कहा जा सकता है कि वह गलत राह पर हैं। ‘भगवा आतंकवाद’ की बात कह कर उन्होंने सीमापार आतंकवाद, कश्मीर के बिगड़ते हालात, माओवादियों, नक्सलियों का बढ़ता आतंक, पूर्वोत्तर में उग्रवाद आदि गंभीर मुद्दों को बौना बनाने का प्रयास किया है। जो लोग कहते हैं हि ‘बांटो और राज करो’ की नीति अंग्रेजों के जमाने में थी वह गलत हैं क्योंकि यह किसी न किसी रूप में आज भी भारत में जारी है।

जय हिन्द
नीरज कुमार दुबे

Thursday, 6 May, 2010

सजा सुना तो दी, हश्र अफजल गुरु जैसा न हो

मुंबई में आतंकवादी हमलों के दोषी और मामले की सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की ओर से ‘मौत की मशीन’ करार दिये गये अजमल आमिर कसाब को मौत की सजा सुनाया जाना भी कमतर प्रतीत होता है। दरअसल यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जोकि इस हमले की साजिश में शामिल था, यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जो भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जो सीमा पार स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविरों में भारत विरोध के लिए जान लड़ा देने की कसमें खा रहा है।

वैसे कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है उससे एक बात तो साफ हो गई है कि भारत विरोधी कार्रवाइयों को अंजाम देने वालों का यही हश्र होगा। अब यह सरकार पर है कि वह इस सजा को जल्द से जल्द अमल में लाए, यह मामला संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की तरह राजनीतिक कारणों से लटकना नहीं चाहिए, नहीं तो देश के खिलाफ साजिश करने वालों के हौसले बुलंद होंगे। कसाब किसी भी लिहाज से दया का पात्र नहीं है क्योंकि जैसा कि उज्ज्वल निकम ने कसाब का इकबालिया बयान पढ़ते हुए अदालत में कहा कि ‘‘वह खून का प्यासा है, जो यह देख कर दुःखी हुआ कि छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर मारने के लिए ज्यादा लोग नहीं हैं।’’ मुंबई में हमले का शिकार बने ज्यादातर लोग निहत्थे थे और उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था। कसाब ने बेरहमी से उन पर गोलियां चलाईं। कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल ने अपनी एके 47 राइफल और दो टैक्सियों में बम लगा कर 72 लोगों को सीधे तौर पर मारा। कसाब मनुष्य के रूप में राक्षस है, जिसे लोगों की हत्या करने में मजा आता है। यह दो मीडियाकर्मियों द्वारा खीचीं गई उसकी दो तस्वीरों में उसके चेहरे से स्पष्ट दिखता है।

इस पूरे मामले में विशेष अदालत ने न्याय के सिद्धांत का पूरी तरह पालन करते हुए यह दिखा दिया है कि भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है और यहां की न्यायिक प्रक्रिया कम से कम राजनीतिक तथा भावनात्मक कारणों से प्रभावित नहीं होती। नहीं तो जब कसाब को गिरतार किया गया था उस समय देश में भावनाओं का जो ज्वार उमड़ रहा था उसको देखते हुए उसे जनता ही नहीं पुलिस ही मार डालती, खुद मुंबई हमले के दौरान शहर पुलिस की अपराध शाखा के मुखिया रहे राकेश मारिया ने यह कहा भी है कि हमें कसाब की कई मोर्चों पर रक्षा करनी पड़ी जिसमें बाहरी तत्वों के साथ ही पुलिस विभाग के लोग भी थे क्योंकि उनमें अपने कई वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने को लेकर काफी रोष था, लेकिन भारत कोई ईरान अथवा पाकिस्तान नहीं है जहां न्यायिक प्रक्रिया का मात्र दिखावा किया जाता है। अब जब कसाब को सजा हो गई है तो उसके पास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय जाने का विकल्प खुला हुआ है लेकिन अदालतों को चाहिए कि वह यदि अपने इस अधिकार का उपयोग करता भी है तो भी जल्द से जल्द मामले को निपटाया जाना चाहिए। फिलहाल तो मुंबई हमला मामलों की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने एक वर्ष के समय में इस सबसे बड़े आतंकवादी हमले के मामले को निपटाकर रिकार्ड बना ही दिया है।

कसाब की सुरक्षा पर जो रोजाना लगभग दो लाख रुपए खर्च हो रहे हैं वह यदि देश के जरूरतमंद इलाकों में लगाया जाए तो अच्छा रहेगा इसके लिए जरूरी है कि कसाब की सजा पर जल्द से जल्द अमल किया जाए। पाकिस्तान को भी कसाब को सजा दिए जाने पर शायद ही ऐतराज हो जोकि भारत से संबंध अच्छे बनाने को कथित रूप से आतुर है। हालांकि कसाब को सजा पर अमल किये जाने पर पाकिस्तान एक बहाना यह मार सकता है कि उसके यहां मुंबई हमला मामलों के जो केस चल रहे हैं वह अब कमजोर हो गये हैं।

यह बड़ी हैरानगी वाली बात ही है कि मुंबई हमला मामलों में पाकिस्तान अब तक भारत से ठोस सबूत नहीं मिलने की बात कह रहा है लेकिन अमेरिका में टाइम्स स्कवायर पर आतंकी हमले की साजिश करने वाले फैजल शहजाद मामले में उसने बड़ी तत्परता दिखाई और चैबीस घंटे के अंदर आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को गिरतार कर लिया। पाकिस्तान खुद के आतंकवाद से पीड़ित होने का दावा करता है लेकिन इसका जनक भी तो वह खुद ही है। हेडली, राणा, फैजल शहजाद, आफिया सिद्दीकी जैसे कुछ नाम तो मात्र उदाहरण हैं। असली आका तो चेहरे पर लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर सारा खेल रच रहे हैं। जिन्हें बेनकाब किए बिना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अधूरी ही रहेगी।

आतंकवाद मुद्दे पर हमें अमेरिका से यह सीख लेनी चाहिए कि वहां 9/11 के बाद कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ। भले वहां की गुप्तचर एजेंसियों अथवा अन्य प्रशासनिक एजेंसियों की नाकामी के चलते पिछले वर्ष क्रिसमस के दौरान डेट्रायट में अमेरिकी विमान को उड़ाने का प्रयास किया गया हो और अब टाइम्स स्कवायर पर धमाके की साजिश रची गई हो, लेकिन अमेरिकी जनता की सतर्कता के कारण दोनों मामलों में क्रमशः अब्दुलमुतालब और फैजल शहजाद को सिर्फ 24 घंटे के अंदर ही कानूनी शिंकजे में ले लिया गया। हेडली और राणा का उदाहरण भी सबके सामने है। हालांकि इस मामले में अमेरिका ने जो खेल खेला, वह भी सभी जानते हैं।

कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है, उसका हर भारतीय स्वागत कर रहा है। आज हम इस हमले के दौरान शहीद हुए पुलिसकर्मियों, एनएसजी जवानों और सुरक्षा गार्डों को कोटि-कोटि नमन करते हैं और शपथ लेते हैं कि वह अपने पीछे अदम्य साहस और देशभक्ति की जो विरासत छोड़ कर गये हैं, उसे हम आगे बढ़ाएंगे साथ ही हमले के दौरन शिकार बनी मासूम जनता को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए यह शपथ भी लेते हैं कि आतंकवाद का नामोनिशां मिटा कर रहेंगे, भारत के खिलाफ उठने वाला हर कदम किसी भी सूरत में सफल नहीं होने दिया जाएगा।

इस मौके पर यह कवि श्यामलाल गुप्ता की इस कविता के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहता हूं-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हरषाने वाला
मातृभूमि का तन-मन सारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
स्वतंत्रता के भीषण रण में,
लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में,
काँपे शत्रु देखकर मन में,
मिट जावे भय संकट सारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
इस झंडे के नीचे निर्भय,
हो स्वराज जनता का निश्चय,
बोलो भारत माता की जय,
स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरों आओ,
देश-जाति पर बलि-बलि जाओ,
एक साथ सब मिलकर गाओ,
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
इसकी शान न जाने पावे,
चाहे जान भले ही जावे,
विश्व-विजय करके दिखलावे,
तब होवे प्रण-पूर्ण हमारा,
झंडा ऊँचा रहे हमारा।

भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 8 April, 2010

अब चुप क्यों हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता?

छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा जिले में हुए बर्बर माओवादी हमले की निंदा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को छोड़ कर सारा देश कर चुका है। आज जब इस बर्बर हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों के परिवार के प्रति देश भर में संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं,ऐसे में इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने शायद अपने मुंह पर पट्टी बांध ली है! कहां हैं वे मानवाधिकार कार्यकर्ता जिन्हें कथित पुलिसिया जुर्म तो नजर आ जाता है लेकिन माओवादियों ने जिस प्रकार 76 जवानों की निर्मम हत्या कर उनके पूरे घर को उजाड़ दिया,वह उन्हें नजर नहीं आ रहा है?

यदि दंतेवाडा में उल्टा हुआ होता और सुरक्षाकर्मियों ने माओवादियों पर विजय पाई होती तो ये मानवाधिकार कार्यकर्ता वातानुकूलित सभागारों में सेमिनार आयोजित करते और कालेज कैंपसों में जाकर सरकार विरोधी माहौल बनाते,लेकिन अब यह क्यों चुप हैं? उन्हें सिर्फ आदिवासियों की ही गरीबी क्यों नजर आती है। माओवादी हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मी भी गरीब परिवारों से थे,उनके बीवी बच्चों का भविष्य क्या होगा यह शायद भगवान ही जाने। लेकिन उनके लिए कम से कम संवेदना तो व्यक्त की ही जा सकती है। क्या इसके लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पास शब्दों का अभाव हो गया है?

माओवादी अथवा नक्सली झारखंड,उड़ीसा या छत्तीसगढ़ में स्कूल या कोई सरकारी कार्यालय उड़ाते हैं तो भी ये मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप ही रहते हैं जबकि यही लोग इस बात का ज्यादा रोना रोते हैं कि इलाके में सुविधाएं नहीं होने के कारण लोग असंतुष्ट हो रहे हैं। इन मानवाधिकारवादियों को अपना दोहरा रवैया छोड़ना चाहिए और सुरक्षा की दृष्टि से उठाये गये कदमों का समर्थन करना चाहिए।

आज देश में यह जनमत बन रहा है कि माओवादियों से सेना के द्वारा निपटा जाए क्योंकि अर्धसैनिक बलों पर माओवादियों ने जिस प्रकार पिछले दिनों पश्चिम बंगाल,पिछले सप्ताह उड़ीसा और इस बार छत्तीसगढ़ में धावा बोला, उससे लगता है कि हमारे अर्धसैनिक बलों के पास रणनीति और हथियारों की कमी है,यह स्थिति सेना के साथ नहीं है और उसे हर चीज में प्रशिक्षित किया गया है,ऐसे में उसकी सेवा ली जानी चाहिए और विकराल रूप लेती नक्सल समस्या से एक बार में देश को निजात दिला देनी चाहिए। फिर चाहे कितना भी बोलते रहें ये मानवाधिकार कार्यकता।

अमर शहीदों को नमन करते हुए महेश मूलचंदानी की यह कविता यहां दोहराना चाहूंगा-
जाँ पे खेला बचाया है तुमने वतन
ज़ुल्म सहते रहे गोली खाते रहे
बीच लाशों के तुम मुस्कुराते रहे
कतरे-कतरे से तुमने ये सींचा चमन
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन
साँप बनकर जो आए थे डसने हमें
कुचला पैरों से तुमने मिटाया उन्हें
कर दिया पल में ही दुश्मनों का दमन
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन

सर झुकाया नहीं सर कटाते रहे
देख बलिदान दुश्मन भी जाते रहे
माँ ने बाँधा था सर पे तुम्हारे कफ़न
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन
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भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे