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Monday, 9 May 2011

ओसामा को सम्मान देने से आखिर क्या फायदा होगा दिग्विजय जी




कभी कथित ‘भगवा आतंकवाद’ का भय दिखाकर तो कभी आतंकवाद की घटना के बहाने राजनीतिक लाभ उठाने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की ओर से अल कायदा प्रमुख को ‘ओसामा जी’ कह कर पुकारा जाना हो या फिर ओसामा बिन लादेन को समुद्र में दफनाए जाने का विरोध करना हो, दोनों ही बेहद आपत्तिजनक बाते हैं। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के इस दौर में सही या गलत की परवाह किसे है। यह वोट बैंक की राजनीति और साम्प्रदायिकता नहीं तो और क्या है कि हमारे नेता यह सोचते हैं कि लादेन के साथ जो हश्र हुआ उसको सही ठहराने से कहीं एक वर्ग की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचे। लेकिन वह भूल जाते हैं कि लादेन का किसी धर्म से वास्ता नहीं था वह सिर्फ अमेरिका का ही नहीं बल्कि इंसानियत का भी दुश्मन था और उसके द्वारा संचालित हमलों में मुस्लिम सिर्फ मारे ही नहीं गये बल्कि लादेन और उसके संगठन के कार्यों की बदौलत विश्व भर में संदिग्ध नजरों से देखे भी गये। ऐसा व्यक्ति जो अपनी कौम का ही दुश्मन बन गया हो उसके मारे जाने पर शोक कैसा? उसे सम्मानजनक तरीके से संबोधित कर यह कल्पना करना कि इससे किसी वर्ग को लुभाया जा सकेगा, बेकार की बात है।

दिग्विजय सिंह के इन बयानों से कांग्रेस पार्टी ने दूरी बनाकर सही किया क्योंकि पार्टी पर पहले ही आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बरतने और दोषियों की सजा पर कार्रवाई में देरी करने जैसे आरोप लगते रहे हैं। खबरों में कहा गया कि कांग्रेस ने इस विषय पर दिग्विजय सिंह को तलब भी किया है लेकिन खुद दिग्विजय ने ऐसी किसी बात से इंकार किया। दिग्विजय को यह देखना चाहिए कि उनके इस कदम ने उनको किन लोगों के साथ और किस श्रेणी में खड़ा किया। जहां एक ओर दिग्विजय लादेन को ‘ओसामा जी’ कह कर संबोधित कर रहे थे तो दूसरी ओर हुर्रियत कांफ्रेंस के उग्रपंथी गुट के सैय्द अली शाह गिलानी थे जो लादेन के लिय्ो जनाजे की नमाज का आह्वान कर रहे थे। तीसरी ओर कोलकाता की स्थानीय् टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम मौलाना नूरूर रहमान बरकती थे, जिन्होंने लादेन की ‘‘आत्मा की शांति‘‘ के लिए विशेष नमाज अदा की तो चैथी ओर केरल का वह व्यक्ति अथवा संगठन था, जिसकी ओर से ओसामा के मारे जाने के खिलाफ पर्चे बंटवाने की खबर आई। इससे पहले चुनावों के समय एक बार बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान की रैली में एक शख्स ओसामा के वेष में लोगों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था।

पार्टी की कथित दोगली नीतियों के चलते दूर हुए मुस्लिम मतदाताओं को वापस कांग्रेस से जोड़ने के प्रयास में दिग्विजय सिंह जब तब कोई न कोई तीर छोड़ते रहते हैं। इससे पहले उन्होंने दिल्ली में हुए विस्फोटों के बाद हुए बाटला मुठभेड़ कांड पर सवाल उठाते हुए आजमगढ़ का दौरा किया था। हालांकि उस समय दिग्विजय ने यही कहा था कि वह सच्चाई का पता लगाने के लिए इलाके का दौरा कर रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को रिपोर्ट भी सौंपी थी लेकिन जब सरकार, मानवाधिकार आयोग जैसे संस्थान मुठभेड़ को सही ठहरा चुके हों तो किसी पार्टी महासचिव की रिपोर्ट का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इस मामले में भी दिग्विजय पर वोट बैंक की राजनीति करने के आरोप लगे थे। यही नहीं उन्होंने तो मुंबई हमले के दौरान हेमंत करकरे की शहादत पर भी एक तरह से सवाल उठाया था जब उन्होंने यह कहा था कि करकरे ने उन्हें फोन कर बताया था कि वह मालेगांव धमाके की जांच के सिलसिले में संघ परिवार के निशाने पर हैं।

दिग्विजय की हालिया कथित उपलब्धियों की बात की जाए तो उनके हिस्से में ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द को प्रचलित कराने का श्रेय भी है। साथ ही वह इस बात के लिए भी विख्यात हैं कि पार्टी संगठन में राज्यों के प्रभारी मात्र होने के बावजूद राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और अन्य विषयों पर भी खूब बोलते हैं। दूसरों की संपत्ति की जांच की मांग करना उनका प्रिय शगल है तो साथ ही अपने पर हमला बोलने वाले पर तेजी से आक्रामक होना उनकी विशेष रणनीति है। बहरहाल, ओसामा को सम्मानपूर्वक संबोधन से पूर्व दिग्विजय जी को उन परिवारों या पीडि़तों के हाल पर नजर दौड़ा लेनी चाहिए थी जो विश्व भर में ओसामा की आतंकी गतिविधियों के शिकार हुए।

जय हिंद, जय हिंदी


नीरज कुमार दुबे

Monday, 2 May 2011

आखिरकार आतंकवाद की जन्मस्थली में मारा गया ओसामा बिन लादेन



आखिरकार दुनिया के नंबर एक आतंकवादी अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को दुनिया के नंबर एक देश ने मार गिराया। अपने को बहुत बड़ा बहादुर बताने और समझने वाला ओसामा कितना बहादुर था यह दुनिया ने तब देख ही लिया जब वह डर के मारे एक गुफा से दूसरी गुफा में छिपता फिर रहा था। शायद ओसामा ने अपने हिसाब वाले कोई सदकर्म ही किये होंगे जो वह आतंकवाद की जन्मस्थली पाकिस्तान में मारा गया। ओसामा का मारा जाना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक बहुत बड़ी कामयाबी है तो है ही साथ ही यह आतंकवाद के प्रतीक पर सबसे बड़ा हमला भी है। जिस तरह भले राजा बूढ़ा हो लेकिन उसके मारे जाने पर भी प्रजा को गुलाम बनना ही पड़ता है उसी तरह आतंकवाद के सबसे बड़े सरगना के मारे जाने पर निश्चित रूप से आतंकवादियों और आतंकवाद के समर्थकों का मनोबल गिरेगा। हालांकि संभावना यह भी है कि वह अपना हौसला पस्त नहीं होने का सुबूत देते हुए विश्व में कहीं भी आतंकवादी वारदात को अंजाम दें। अल कायदा, तालिबान और लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों के स्लीपर सेलों की बातें समय समय पर खुफिया एजेंसियां सामने लाती रही हैं। संभव है कि इन्हीं स्लीपर सेलों के माध्यम से किसी वारदात को अंजाम दिया जाए। हमें हाल ही में उजागर हुई अल कायदा की उस चेतावनी को नहीं भूलना चाहिए जिसमें उसने अल कायदा प्रमुख के मारे जाने पर पश्चिम तथा यूरोप पर परमाणु बम हमले की धमकी दी थी। लादेन के मारे जाने से निश्चित रूप से अमेरिका विरोध की भावना अब आतंकवादियों के मन में प्रबल होगी और अमेरिकी नागरिक, अमेरिकी प्रतिष्ठान आदि को सतर्कता बरते जाने की जरूरत है, शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने विश्व भर में अपने नागरिकों के लिये यात्रा परामर्श जारी किया है।

लादेन का पाकिस्तान में पकड़ा जाना और मारा जाना पाकिस्तान सरकार के उन दावों को भी झूठा साबित करता है कि लादेन पाकिस्तान में नहीं है या फिर लादेन मारा जा चुका है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सरकार समय समय पर यही बात दोहराते रहे हैं कि लादेन पाकिस्तान में नहीं है। यही नहीं पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और वर्तमान राष्ट्रपति तो यहां तक कह चुके हैं कि उन्हें लगता है कि लादेन मर चुका है। लादेन की अनुपस्थिति और उसके मारे जाने की झूठी बात को बार बार कह कर पाकिस्तान ने इसे सच बनाने की कोशिश की लेकिन आखिरकार पाकिस्तान का असली चेहरा सबके सामने आ ही गया। यह तो बहुत ही अच्छा हुआ कि अमेरिका ने लादेन पर कार्रवाई की बात पाकिस्तान सरकार के साथ साझा नहीं की वरना वह उसे वहां से भगा देती। गौरतलब है कि लादेन के मारे जाने के बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जरदारी को इस बारे में जानकारी दी। आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा ने भी हाल ही में अपने अमेरिकी दौरे के समय इस बात के भरसक प्रयास किये कि अमेरिका पाक में ड्रोन हमलों को रोक दे लेकिन अमेरिका जानता था कि पाकिस्तान यह निवेदन क्यों कर रहा है।

अब अमेरिका को यह बात समझनी चाहिए कि कैसे पाकिस्तान उसे कई वर्षों से ओसामा की मौजूदगी के बारे में गुमराह करता रहा जबकि पाकिस्तान से उसे सुरक्षित तरीके से छिपा रखा था। ओसामा जहां मिला वह स्थान पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के पास है और वह ऐसा इलाका है जहां सामान्य तौर पर सेना के शीर्ष सेवानिवृत्त अधिकारी रहते हैं। अब दुनिया के सामने पाकिस्तान का वह झूठ भी सामने आ गया है जिसमें वह दाऊद इब्राहिम और मुंबई हमले के कुछ आरोपियों की अपने यहां उपस्थिति की बात से इंकार करता रहा है।

दुनिया के सामने पाकिस्तान का सच सामने आने के बाद अब यह भारत के लिए सही समय है कि वह मुंबई हमले के दोषियों को उसे (भारत को) सौंपने के लिए दबाव बनाये और सीमा पर मौजूद आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाये या फिर खुद ही कार्रवाई कर इन आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को ध्वस्त कर दे क्योंकि गर्मियां शुरू हो चुकी हैं और अब पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ के प्रयास शुरू होंगे। भारत सरकार को पाकिस्तान से वार्ता शुरू करने की बजाय दीर्घकालीन दृष्टि से सोचना चाहिए और पाकिस्तान में मौजूद अपने लिए खतरों को खत्म करने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।

हमें अमेरिका से यह बात सीखनी चाहिए कि वह अपने नागरिकों पर हमलों की बात को भूलता नहीं है और उसका बदल ले कर रहता है। 9/11 को भले दस साल हो गये हों लेकिन अमेरिकी सरकार के लिए उसके जख्म हमेशा ताजा रहे और उसने आखिरकार ओसामा को मार कर बदला ले लिया जिसके बाद ओबामा ने बयान दिया कि अमेरिका ने न्याय कर दिया है। हमारे यहां तो यदि किसी को मृत्युदंड सुना भी दिया जाता है तो भी उसे जिंदा रखा जाता है कि कहीं वोट बैंक प्रभावित न हो जाए। भारत दुनिया में आतंकवाद से सर्वाधिक पीडि़त रहा है लेकिन आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में नगण्य रहा है। आज भी अफजल और अजमल कसाब को जिंदा रखा गया है। यदि उन्हें सजा सुनाए जाने के तत्काल बाद मौत के घाट उतार दिया गया होता तो आतंकवाद पीडि़तों को बड़ी राहत पहुंचती। हमारे यहां तो माओवादियों अथवा नक्सलियों के खिलाफ भी यदि सैन्य बल कोई कार्रवाई कर देते हैं तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसे मुद्दा बना देते हैं।

बहरहाल, हमें आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ी कार्रवाई के लिए अमेरिका की सराहना तो करनी ही चाहिए साथ ही सतर्कता भी बरतनी चाहिए। हमें चाहिए कि बाजार, पर्यटन स्थलों और धर्म स्थलों पर अत्यधिक सतर्कता बरतें क्योंकि आतंकवादी तथा उन्मादी अपनी ताकत दिखाने के लिए किसी भी हिंसक वारदात को अंजाम दे सकते हैं। हमें सुरक्षा एजेंसियों की जांच के दौरान भी सहयोग देना चाहिए।

दूसरी ओर, आतंकवाद के खिलाफ मिली यह सबसे बड़ी सफलता बराक ओबामा के लिए सबसे ज्यादा राहत लेकर आई है। वह घरेलू मोर्चे पर काफी चुनौतियों से जूझ रहे थे और अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में भी उन्हें कड़ी टक्कर मिलने की उम्मीद की जा रही थी क्योंकि विभिन्न सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता में कमी आने की बात कही गई थी। लेकिन अब ओबामा के मारे जाने के बाद ओसामा के लिए पुनः निर्वाचन की राह आसान हो गई है। हालांकि उन्हें इस सफलता का श्रेय कुछ हद तक पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश को भी देना चाहिए क्योंकि उन्हीं के कार्यकाल में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अमेरिकी सेना के नेतृत्व में नाटो बलों की तैनाती हुई। बुश ने आतंकवाद के खिलाफ जो आपरेशन चलाया उसे अंजाम तक ओबामा ने पहुंचाया। बुश को जहां अपने कार्यकाल में सद्दाम हुसैन मामले में सफलता मिली वहीं ओबामा को ओसामा को मारने में सफलता मिली। लेकिन इन दोनों सफलताओं में एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि जहां आधी से ज्यादा दुनिया सद्दाम को मारे जाने की विरोधी थी वहीं समूची दुनिया ओसामा के मारे जाने से खुश है।

जय हिंद, जय हिंदी

नीरज कुमार दुबे

Monday, 4 April 2011

वस्त्र भगवा पर जुबां पे ‘लाल सलाम’! यह कैसे संत हैं अग्निवेश



प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर माओवादियों और नक्सलियों के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि वह इन आरोपों पर हमेशा यही कहते रहे हैं कि वह सिर्फ मानवाधिकार की बात कर रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में माओवादियों की सभा में उनके द्वारा ‘लाल सलाम’ के नारे लगाते हुए जो सीडी सामने आई है, उससे उनका दूसरा चेहरा सबके सामने आ गया है। छत्तीसगढ़ की सरकार ने तो यहां तक कह दिया है कि हम तो अग्निवेश को संत समझते थे लेकिन वह तो संत के वेष में माओवादी निकले। रिपोर्टों के मुताबिक यह सीडी 11 जनवरी 2011 को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के करियामेटा के पास जंगलों के बीच माओवादियों की जन अदालत की है। इस जन अदालत में ‘भारत सेना वापस जाओ’ के नारों के बीच स्वामी अग्निवेश को ‘लाल सलाम’ के नारे लगाते और ‘माओवाद’ के पक्ष में बोलते हुए दिखाया गया है। यह वही जन अदालत थी जिसमें पांच अपहृत जवानों को रिहा करने का फैसला किया गया था। इन जवानों की रिहाई के लिए अग्निवेश खुद मध्यस्थता के लिए आगे आए थे और शासन ने जवानों की जिंदगी की रिहाई के लिए अग्निवेश के प्रस्ताव को स्वीकार किया था।


यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि राज्य में माओवादियों की ओर से अपहरण की दो घटनाओं में अग्निवेश मध्यस्थ बने। यही नहीं उड़ीसा के एक जिलाधिकारी का माओवादियों की ओर से अपहरण हो या फिर गत वर्ष बिहार में पुलिसकर्मियों का अपहरण, सभी मामलों में अग्निवेश ने मध्यस्थता की पेशकश की या फिर मध्यस्थता की इच्छा जताई। संभव है माओवादियों के ‘पहले अपहरण करो और फिर बाद में छोड़ दो’ के खेल में वह भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हों। अपहरण के बाद अपनी बात मनवाने के साथ ही अपहृत की रिहाई कर शायद माओवादी यह संदेश देना चाहते हैं कि वह आम लोगों को नहीं सताते। इसके अलावा यह भी संभव है कि माओवादियों की छवि सुधार में लगे अग्निवेश शायद मध्यस्थता के बाद अपहृतों की रिहाई करवा कर माओवादियों का ‘मानवीय’ चेहरा सामने लाना चाहते हैं। अब अग्निवेश कह रहे हैं कि वह जिस धर्म और जिस देश में जाते हैं वहां के नारे लगाते हैं और इसमें कुछ गलत नहीं है। यदि किसी धर्म अथवा किसी देश के पक्ष में नारे लगाने की अग्निवेश की बात को मान भी लिया जाए तो भी यह तो किसी दृष्टि से सही नहीं है कि आप वहां भारत का या फिर भारतीय सेना का अपमान सुनते रहें।


अपने को सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकारों का पक्षकार कहलवाने वाले अग्निवेश यदि सचमुच लोगों का हित सोच रहे होते तो पिछले सप्ताह के छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान उन्हें जनता का भारी विरोध नहीं झेलना पड़ता। आज जनता जागरूक हो चुकी है और वह अपना अच्छा बुरा पहचानती है। अब किसी भी घटना के राजनीतिक निहितार्थ निकालने को पहुंचे लोगों को विरोध झेलना ही पड़ता है। राज्य के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में हुई आगजनी के कारणों की पड़ताल के लिए जब अग्निवेश अपने समर्थकों के साथ प्रभावित इलाकों में पहुंचे तो लोगों ने उनका जबरदस्त विरोध किया और उनकी गाड़ी पर अंडे, टमाटर व जूते फेंके। खास बात यह रही कि अग्निवेश के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों में महिलाओं की संख्या ज्यादा थी। सभी ग्रामीण उनसे यही पूछ रहे थे कि जब 2006 में नक्सलियों ने उनके घरों में आगजनी की थी तब वह क्यों नहीं आए? सरकार ने हालांकि अग्निवेश के साथ हुई धक्कामुक्की को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर और एसएसपी का तबादला कर दिया लेकिन अब राज्य के गृहमंत्री अग्निवेश की सीडी सामने आने के बाद मान रहे हैं कि संत के रूप में अग्निवेश माओवादी निकले और अब सरकार मानती है कि एसएसपी ने कहीं भी गलती नहीं की थी।


राज्य के दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में हुई घटनाओं के पीछे माना जा रहा है कि यह नक्सलियों और पुलिस के बीच संघर्ष के कारण हुई। ग्रामीणों के घर जलाने वालों को चिन्हित करने की बात करते हुए सरकार ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं लेकिन इससे पहले उसे इस वर्ष 14 मार्च को हुई मुठभेड़ के दौरान 37 माओवादियों के मारे जाने की घटना को याद कर लेना चाहिए जिसमें माओवादियों ने जल्द ही बदला लिये जाने का ऐलान भी किया था।


बहराहाल, स्वामी अग्निवेश की सीडी मामले की जांच जारी है। मामला राजनीतिक होने के कारण शायद जांच परिणाम शीघ्र ही आ जाएं लेकिन इतना तो है ही कि पूर्व में राजनीतिज्ञ रह चुके और अब बंधुआ मुक्ति मोर्चा के प्रमुख स्वामी अग्निवेश माओवादियों का पक्ष लेकर ठीक नहीं कर रहे हैं। वह भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ रैलियों या भाषणों में हिस्सा लेते हैं तो बात समझ में आती है लेकिन लोकतंत्र के खिलाफ काम कर रहे माओवादियों और नक्सलियों के पक्ष में उनका खड़ा होना उन्हें संदिग्ध बनाता है।


जय हिन्दी, जय भारत

नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 1 February 2011

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आतंकवादी नहीं राष्ट्रवादी संगठन है

पिछले कुछ समय से संघ परिवार को लगातार आड़े हाथ ले रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द को स्थापित करने के बाद अब ‘संघी आतंकवाद’ शब्द को स्थापित करने में जी जान से जुट गये हैं इसके लिए उन्होंने 30 जनवरी 2011 को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन बयान दिया कि संघ के आतंकवाद की शुरुआत महात्मा गांधी की हत्या से हुई। इससे दो दिन पहले ही दिग्विजय ने एक नई कहानी प्रस्तुत कर देश के विभाजन के लिए जिन्ना की बजाय सावरकर को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि ‘दो राष्ट्र’ के सिद्धांत का विचार सबसे पहले वीर सावरकर ने रखा था जिसकी वजह से देश का बंटवारा हुआ। इससे पहले दिग्विजय ने मुंबई एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की मौत को अप्रत्यक्ष रूप से भगवा संगठनों के साथ जोड़कर विवाद खड़ा कर दिया था और बाद में उन्होंने यह सुबूत तो दिया कि उनकी करकरे से फोन पर बात हुई लेकिन वह बात क्या थी यह साबित करने में वह विफल रहे। दरअसल इन सब बयानों के जरिए उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर संघ को कठघरे में खड़ा करने की जो चाल चली थी उसमें वह काफी हद तक सफल रहे थे।

यह सब उस संघ को बदनाम करने की बड़ी साजिश का हिस्सा है जोकि प्रखर राष्ट्रवादी संगठन है और मंत्रिमंडल की विभिन्न समितियों से भी ज्यादा गहनता के साथ आंतरिक सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता और आपसी सद्भावना जैसे विषयों पर चर्चा करता है और मुद्दों के हल की दिशा में काम करता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि देश या समाज पर किसी भी विपत्ति के समय उसके साथ खड़े होने वाले इस संगठन के साथ इस समय भाजपा के अलावा कोई खड़ा नहीं दिखाई दे रहा। यह बात सभी जानते हैं कि दिग्विजय संघ विरोध की जो धारा बहा रहे हैं उसके पीछे उनकी कोई बड़ी राजनीतिक मंशा है। संघ के लिए सुखद बात यह है कि आप चाहे कितने भी आॅनलाइन फोरमों पर होने वाली चर्चा को देख लीजिए, शायद ही कोई दिग्विजय की बात से इत्तेफाक रखता हो। लेकिन यह भी सही है कि संघ को वह समर्थन खुले रूप से नहीं मिल पा रहा है जिसका वह हकदार है।

संघ को घेरने की रणनीति बनाते रहने में मशगूल रहने वाले दिग्विजय की बांछें तब और खिलीं जब कुछ समय पूर्व समझौता ट्रेन विस्फोट मामले की चल रही जांच के लीक हुए अंशों में दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत के नेता असीमानंद और संघ नेता इंद्रेश कुमार का नाम कथित रूप से सामने आया। इसके बाद ता दिग्विजय ने अब संघ पर हमला और तेज करते हुए आरएसएस पर देश में संघी आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया है। दिग्विजय ने संघ प्रमुख मोहन भागवत से पूछा है कि अगर संघ आतंकवाद नहीं फैला रहा है तो इन मामलों में पकड़े जाने वाले लोगों के तार आरएसएस से क्यों जुड़े हुए मिलते हैं? दिग्विजय ने तो भाजपा की राज्य सरकारों पर भी कथित संघी आतंकवादियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए उदाहरण दिया कि समझौता विस्फोट मामले के आरोपी असीमानंद ने गुजरात में जाकर शरण ली थी। दिग्विजय वर्षों पहले से ही संघ पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह अपने कार्यकर्ताओं को बम बनाने का प्रशिक्षण देता है। यह सब कह कर दिग्विजय न सिर्फ आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान का पक्ष मजबूत कर रहे हैं बल्कि एक राष्ट्रवादी संगठन को आतंकवाद के साथ जोड़कर ‘महापाप’ भी कर रहे हैं। यह पूरी कवायद आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई से ध्यान भटकाएगी।

राजनीतिक मेधावी दिग्विजय अपने बयानों के जरिए सामंजस्य बनाने की कला भी बखूभी जानते हैं वह जहां भाजपा और संघ परिवार पर रोजाना नए तरीके से निशाना साधते हैं वहीं सरकार खासकर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी आड़े हाथों लेते रहते हैं। पहले उन्होंने नक्सल समस्या से निबटने की रणनीति को लेकर चिदम्बरम की कार्यशैली पर सवाल उठाए तो अब मौत की सजा पाए कैदियों की अपील पर एक समय सीमा में निर्णय करने की बात कह कर अफजल गुरु और अजमल कसाब की फांसी में जानबूझकर देरी करने के भाजपा के आरोपों को भी हवा दी। ऐसे बयानों से दिग्विजय कभी कभार खुद अपनी ही पार्टी को भी परेशानी में डाल देते हैं लेकिन वह जो ‘लक्ष्य’ लेकर चल रहे हैं उसे देखते हुए पार्टी आलाकमान भी उनके विरुद्ध सख्त रुख अख्तियार नहीं करता क्योंकि उसे पता है कि जो काम वर्षों से कोई कांग्रेस नेता नहीं कर पाया वह मात्र कुछ महीनों में दिग्विजय ने कर दिखाया है। यह कार्य है संघ को आतंकवाद से जोड़ने का। दिग्विजय अपने बयानों के जरिए संघ को संदिग्ध बना देना चाहते हैं और इसके लिए ऐसे बयान देते हैं जिससे कि लोगों का ध्यान आकर्षित हो।

बहरहाल, अब देखना यह है कि दिग्विजय की सियासत अभी और क्या गुल खिलाती है या और क्या क्या विवाद खड़े करती है लेकिन इतना तो है ही कि उन्होंने संघ के सामने कई दशकों में पहली बार कोई बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

जय हिन्द, जय हिन्दी

नीरज कुमार दुबे

Monday, 3 January 2011

सुरक्षा बलों पर राजनीति करने से बचिए ‘सरकार’

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के सशस्त्र कैडरों को निहत्था करने और केंद्रीय सुरक्षा बलों के कथित दुरुपयोग के आरोपों पर जो राजनीति शुरू हुई है वह अंततः राज्य में माओवादियों और नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रही है। जहां केंद्र का सारा ध्यान माओवादियों से निपटने की राज्य की नाकामी को प्रचारित करने और ममता बनर्जी को खुश करने के लिए राज्य सरकार को विभिन्न तरीकों से घेरने पर लगा हुआ है वहीं राज्य सरकार भी सिर्फ इसी बात के लिए अथक प्रयास कर रही है कि किस प्रकार सत्ता में पुनर्वापसी हो सके।

पिछले सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्रालय और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच शुरू हुआ ‘पत्र युद्ध’ अभी कितना और चलेगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन इस ‘पत्र युद्ध’ के दौरान दोनों ओर से इस्तेमाल किये गये बयान रूपी अस्त्रों शस्त्रों से यह तो पता चल ही गया कि ‘राजनीति’ के लिए फिलहाल नक्सल विरोधी अभियान की किसी को चिंता नहीं है।

लोकतंत्र को परिपक्व बनाने और संवैधानिक दायित्वों को कर्मठता से निभाने का दावा करने वाली कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार में यह देख कर अचम्भा हुआ कि किस प्रकार राजनीति की वेदी पर केंद्र राज्य संबंधों को क्षति पहुंचाई जा रही है। जब संसद के मानसून सत्र को विपक्ष ने जेपीसी की मांग नहीं माने जाने पर नहीं चलने दिया था तो प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान बयान दिया था कि उन्हें संसदीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता हो रही है लेकिन उन्हें यह भी चिंता करनी चाहिए कि उनके मंत्री और मंत्रालय क्या क्या कर रहे हैं। आखिर क्यों और कैसे केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा किसी मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र मुख्यमंत्री को मिलने से पहले ही मीडिया में लीक कर दिया गया? यह भी बड़ा सवाल है कि क्यों गृह मंत्रालय और बंगाल सरकार की ओर से पत्रों के अंश पावक को पत्र मिलने से पूर्व मीडिया को जारी कर दिये गये?

इसे भी चुनावी राजनीति नहीं तो और क्या कहेंगे कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने चुनावों की ओर बढ़ रहे राज्य के मुख्यमंत्री को भेजे गये पत्र के बारे में आधिकारिक वक्तव्य में बताया कि मुख्यमंत्री को गृह मंत्री की ओर से लिखे गये पत्र स्पीड पोस्ट और फैक्स से भेज दिये गये हैं। गृह मंत्रालय की अपनी जो प्रतिष्ठा और संवैधानिक कद है वह यह नहीं कहता कि कोई भी पत्र भेजने पर वह वक्तव्य जारी कर बताए कि पत्र का जवाब भेज दिया गया है और किस माध्यम से भेजा गया है।

यह देख कर भी अचम्भा हुआ कि एक मंत्री द्वारा किसी मुख्यमंत्री को लिखे गये पत्र के बारे में दूसरा मंत्री मुख्यमंत्री से जवाब मांगे। यह सही है कि वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बंगाल से होने के नाते वहां से जुड़े मसलों पर दखल देने का अधिकार रखते हैं लेकिन गृह मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री बुद्धदेव को लिखे गये पत्र का जवाब देने की मुख्यमंत्री से मांग करना उन्हें शोभा नहीं देता।

रही बात बुद्धदेव भट्टाचार्य की तो उन्होंने भी गृहमंत्री की ओर से उठाए गए सशस्त्र कैडरों के संवदेनशील मुद्दे को हल्का बनाते हुए चिदंबरम के पत्र में प्रयोग किए गए ‘हरमद’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए इसे ही बड़ा मुद्दा बना दिया। बुद्धदेव को पता है कि माकपा के सशस्त्र गुटों के बारे में उनके पास कोई जवाब नहीं है इसलिए उन्होंने ‘हरमद’ शब्द पर अपनी आपत्ति को ही प्रमुखता से उठा कर राजनीति की। जिन सशस्त्र कैडरों को चुनावों से पहले निहत्था करने की जरूरत है, उन्हें निहत्था कैसे किया जाए इस बात पर चर्चा होने की बजाय उनको पुकारा किस नाम से जाए, इस पर विवाद को देखते हुए कहा जा सकता है कि ‘इट हैप्पन्स ओनली इन इंडिया’ क्योंकि कहीं और शायद हर चीज को चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखे जाने की इतनी कट्टर परम्परा नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वाममोर्चा के शासन में अनेकों खामियां हैं तथा बंगाल आज भी पिछड़ा हुआ है और वहां आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन ऐसा करने के लिए हमें लोकतंत्र की मान्य परम्पराओं के आधार पर ही कदम आगे बढ़ाना चाहिए साथ ही उन सुरक्षा बलों के मनोबल को कम करने का ऐसा कोई भी प्रयास नहीं करना चाहिए जो दिन रात माओवादी, नक्सली चुनौती का सामना कर रहे हैं।

जय हिन्द, जय हिन्दी
नीरज कुमार दुबे

Monday, 27 December 2010

विनायक सेन को मिली सजा का भाव समझिए

राजद्रोह के आरोप में डाॅ। विनायक सेन और उनके दो साथियों को मिली उम्रकैद की सजा सही है या गलत, इसका निर्णय तो ऊपरी अदालत करेगी लेकिन छत्तीसगढ़ की स्थानीय अदालत ने अपने फैसले से उन लोगों को कड़ा संदेश दे दिया है जो जन सेवा की आड़ में अपने को कानून और देश से ऊपर समझने लगते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर कुछ भी कह देना सही नहीं है। ऐसा करने वालों को कड़ा सबक सिखाए जाने की जरूरत है।

यह देख कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि सेन को मिली सजा के खिलाफ कई बड़े पत्रकारों, लेखकों और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने आवाज उठाई। सेन के साथ काम कर चुके या कर रहे लोगों ने भी उन्हें भला आदमी बताते हुए अदालती फैसले पर हैरानी जताई है और इसे घोर अन्याय करार दिया है। यहां सवाल यह है कि जब माओवादी या नक्सली सुरक्षा बलों या निहत्थे ग्रामीणों पर हमला करते हैं और सरकार को चुनौती देने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेते हैं तब यह बड़े पत्रकार, लेखक, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन कहां चले जाते हैं, तब क्यों यह खामोश हो जाते हैं और पुलिसिया कार्रवाई होते ही उसकी निंदा करने के लिए फिर खड़े हो जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि सेन 80 के दशक से ही छत्तीसगढ़ में रह कर रोगियों की सेवा कर रहे हैं लेकिन इतने भर से यह पाप धुल नहीं जाता कि उन्होंने राज्य के खिलाफ माओवादियों का साथ दिया।

अदालत ने सेन सहित दो अन्य लोगों- नक्सल विचारक नाराय्ाण सान्य्ााल अ©र क¨लकाता के कार¨बारी पीय्ाूष गुहा क¨ भारतीय्ा दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्र¨ह) अ©र 120बी (षड्य्ांत्र) तथा छत्तीसगढ़ विशेष ल¨क सुरक्षा कानून के तहत द¨षी ठहराय्ाा है। अदालती आदेश पर उंगली उठाने वालों को यह पता होना चाहिए कि कोई भी अदालत पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में फैसला नहीं सुनाती उस पर से यदि उम्रकैद जैसी बड़ी सजा दी जा रही है तो उसके पीछे पर्याप्त कारणों का मजबूत आधार जरूर होगा। छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े करने से पहले यह भी सोचना चाहिए कि आखिर उनकी विनायक सेन से क्या व्यक्तिगत दुश्मनी हो सकती है। सरकार और पुलिस की लड़ाई तो माओवादियों, नक्सलियों से है और जो उनका साथ देगा वह कानून की जद में आएगा ही भले ही उसने कितने परोपकार के कार्य किये हों या फिर मानवता के लिए कितना भी बड़ा बलिदान दिया हो। कानून सबके लिए बराबर है। सेन पर यदि कोई फौजदारी अथवा अन्य मुकदमा होता तो उनके मानवतावादी कार्यों के चलते शायद अदालत उन्हें कुछ राहत दे भी देती लेकिन राजद्रोह जैसे संगीन आरोप में उन्हें कोई रियायत न देकर अदालत ने जो संदेश देश भर में दिया है उसकी सराहना की जानी चाहिए।

अदालती निर्णय की आलोचना कर हम मात्र एक व्यक्ति को बचाना चाह रहे हैं जबकि ऐसा करने से उन लोगों के हौसले बुलंद होंगे जो अपने बयानों और कार्यों के चलते न सिर्फ लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं बल्कि देश के आंतरिक मामलों को विश्व में विवादित बनाकर सरकार की मुश्किलें भी बढ़ाते हैं। नक्सलियों से जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सेन, कोबाद गांदी और अरुंधति राय जैसे लोगों के चलते सरकार के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। सेन और कोबाद जैसे लोगों पर आरोप है कि वह नक्सलियों के प्रबुद्ध वर्ग हैं और उनकी विचारधारा को फैला रहे हैं। यदि यह आरोप सही है तो उन्हें खुल कर अपना कार्य करना चाहिए क्योंकि जन सेवा की आड़ में ऐसा कर वह सभी को मूर्ख बना रहे हैं।

निश्चित रूप से जन सेवा के कार्यों के लिए विनायक सेन की सराहना होनी चाहिए लेकिन यदि उन्होंने राज्य्ा के खिलाफ संघर्ष का नेटवर्क तैय्ाार करने के लिए माअ¨वादिय्ा¨ं के साथ साठगांठ की, (इस आरोप में वह दोषी ठहराये गये हैं) तो इसकी निंदा भी की जानी चाहिए। विनायक सेन को मिली सजा के विरोध में खड़े लोगों को यह समझना चाहिए कि उनका समर्थन अरुंधति राय और हुर्रियत नेता गिलानी जैसे लोगों का हौसला बढ़ाएगा और भारतीय सरजमीं पर ही भारत विरोधी बातें करने की और घटनाएं होती रहेंगी। सेन को मिली सजा की मात्रा कितनी सही है या कितनी गलत इसका निर्णय करने का अधिकार ऊपरी अदालत पर छोड़ दें क्योंकि देश का न्याय तंत्र बेहद लोकतांत्रिक और परिपक्व है।

जय हिन्द, जय हिन्दी
नीरज कुमार दुबे

Monday, 13 December 2010

शहादत पर सियासत से कैसे रुकेगा आतंकवाद?

अपने बड़बोले बयानों से पहले भी विवाद खड़ा करते रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का यह कहना कि हेमंत करकरे ने मुंबई हमले से कुछ घंटे पहले मुझे फोन कर कहा था कि उन्हें हिंदू आतंकवादियों से खतरा है, सोची समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेतृत्व भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष की ओर से बनाए जा रहे दबाव के चलते परेशानी में है और संसद का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया तथा कई महत्वपूर्ण विधेयकों के पास नहीं होने के चलते सरकार अजीब संकट की स्थिति में है। साथ ही वाराणसी में हुए विस्फोट मामले में भी केंद्र को ही निशाने पर लिया जा रहा है।

भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जनता को उद्वेलित करने में विपक्ष कामयाब नहीं हो जाए इसके लिए कांग्रेस की ओर से देश का राजनीतिक माहौल बदलने का बीड़ा दिग्विजय सिंह ने उठाया। मुंबई हमला चूंकि देश पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला था और इसे लेकर जनता में अब भी आक्रोश है, सो दिग्विजय ने कहा कि तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को हिंदुत्ववादी ताकतों से खतरा था। हिंदुत्ववादी ताकतों से उनका सीधा आशय हमेशा से संघ परिवार से ही रहा है। जब उनके इस बयान पर विवाद हुआ और खुद उनकी ही पार्टी ने दिग्विजय के इस बयान से अपने को दूर कर लिया तो दिग्विजय भी पलटी मार गए। लेकिन पलटी मारते मारते भी दिग्विजय यह कहने से नहीं चूके कि उन्होंने मुंबई हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकवादियों’ का हाथ होने की बात नहीं की। ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द को स्थापित करने में जीजान से जुटे दिग्विजय ने यह बयान भले ही अपनी सियासी रणनीति के तहत दिया हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके इस बयान से भारत का यह पक्ष कमजोर हुआ कि मुंबई हमला पूरी तरह पाकिस्तान आधारित हमला था और इसे पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों ने अंजाम दिया।

दिग्विजय ने अपनी पार्टी के हित के लिए इस बयान से 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला तथा राष्ट्रमंडल खेल घोटाले को लेकर गर्म राजनीतिक माहौल से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश की लेकिन वेबसाइट विकीलीक्स पर जारी अमेरिकी दस्तावेजों ने पार्टी की मुश्किलें यह कह कर बढ़ा दीं कि मुंबई हमले के बाद कुछ कांग्रेसी नेताओं ने धर्म की राजनीति शुरू कर दी थी। इससे अब तक दूसरे दलों पर साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाती रही कांग्रेस खुद ही ऐसे आरोपों से घिर गई। विकीलीक्स पर जारी दस्तावेजों के मुताबिक भारत में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने देश में भेजी रिपोर्ट में कहा कि अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन मंत्री एआर अंतुले ने 26/11 में हिंदुत्ववादी ताकतों का हाथ होने का आरोप लगाया और कांग्रेस ने इस बयान का सियासी लाभ उठाने के लिए इसे खारिज नहीं किया।

दिग्विजय और विकीलीक्स के खुलासे कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष होने के दावों को विरोधाभासी करार देते हैं। इससे विपक्ष के उन आरोपों को भी बल मिलता है कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों को साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर चुनावी लाभ अर्जित करती रही है।

विवादित बयान देकर भाजपा पर ही सवालों की झड़ी लगाने वाले दिग्विजय से भी कुछ सवाल पूछे जाने चाहिएं। पहला सवाल तो यही है कि यह बात उन्होंने दो वर्ष तक छिपाए क्यों रखी? उन्होंने मुंबई हमलों की जांच से जुड़ी एजेंसियों को यह बात अब तक किस कारण से नहीं बताई थी? दिग्विजय के बयान से यह सवाल भी उठता है कि कोई एटीएस प्रमुख किसी राजनीतिक पार्टी के नेता से अपनी मुश्किलें क्यों बयां करेगा? इससे तो उन आशंकाओं को बल मिलता है कि कोई जांच किसी पार्टी द्वारा निर्देशित की जा रही है। गौरतलब है कि करकरे मालेगांव विस्फोट मामले की जांच कर रहे थे और उन पर हिंदुत्ववादी ताकतों ने साध्वी प्रज्ञा और अन्य को बेबुनियाद आरोपों में फंसाने का आरोप लगाया था। दिग्विजय और करकरे के इस कथित वार्तालाप पर कांग्रेस के अन्य महासचिव जनार्दन द्विवेदी की इस सफाई को ‘मासूम’ ही कहा जाएगा कि करकरे का परिवार मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखता था इसलिए उनकी दिग्विजय से जान पहचान थी। पता नहीं कितने ऐसे एटीएस प्रमुख होंगे जिनका किसी और राज्य से नाता हो तो क्या वह भी वहां के किसी राजनीतिक पार्टी के नेता को अपनी मुश्किलें बताते हैं? यदि करकरे को कोई मुश्किल थी तो वह महाराष्ट्र के पुलिस प्रमुख, गृह सचिव, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यपाल को बता सकते थे ऐसे में वह भला दिग्विजय को क्यों चुनते। यदि वह दोनों मित्र भी थे तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि यह मित्रता कब से थी और किस स्तर की थी? जो व्यक्ति इस दुनिया में नहीं हो, उसके बारे में कोई भी दावा किया जा सकता है लेकिन ऐसा करने से पहले जरा नैतिकता की बात करने वालों को यह तो सोच लेना चाहिए कि उन्हें सिर्फ अपना सियासी भला ही क्यों नजर आता है?

दिग्विजय के बयान के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने तथ्यों को एकत्रित कर गृहमंत्री और पुलिस विभाग से चर्चा करने की बात कही है, लेकिन सच सामने आ पाएगा इसमें संदेह है क्योंकि आखिरकार मुख्यमंत्री तो कांग्रेस पार्टी का ही है। जिस तरह दिग्विजय ने राजनीतिक दांव खेलने के लिए यह विवादित बयान दिया उसी प्रकार कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए उसकी सहयोगी राकांपा तथ्यों को एकत्रित करने की बात कर रही है। जबकि सुबूतों से यह बात साबित हो चुकी है कि समुद्र के रास्ते आए पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई हमले को अंजाम दिया और करकरे सहित विभिन्न पुलिसकर्मी उनकी गोलियों के शिकार हुए। करकरे की पत्नी ने भी दिग्विजय के बयान के बाद साफ कहा है कि उनके पति की शहादत का मजाक नहीं बनाया जाए। कविता करकरे ने कहा, ’’यह कहना गलत है कि मेरे पति को हिंदू संगठनों ने मारा है। वह आतंकी हमले में शहीद हुए हैं।’’
उक्त विवादित बयान के बाद भले ही दिग्विजय ने पलटी मार ली हो लेकिन वह भाजपा सहित संघ परिवार के निशाने पर एक बार फिर आ गए हैं। भाजपा ने इसे नया विवाद खड़ा करने की सोची समझी रणनीति बताते हुए प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष से सफाई मांगी है तो शिवसेना ने कहा कि इससे यह बात साफ हो गई है कि कांग्रेस नेता मालेगांव मामले की जांच को नियंत्रित कर रहे हैं। यही नहीं दिग्विजय को अपने इस बयान के लिए अपनी ही पार्टी के भीतर भी आलोचना सुनने को मिल रही है। मुंबई से कांग्रेस सांसद संजय निरूपम ने दिग्विजय के बयान को गैरजरूरी करार दिया है।

दिग्विजय के इस बयान के सियासी कारणों पर निगाह डाली जाए तो फौरी तौर पर कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों पर खड़ी चुनौतियों के अलावा असम विधानसभा चुनाव भी हैं। दिग्विजय को हाल ही में असम का प्रभार सौंपा गया है। संभव है उन्होंने अल्पसंख्यक वोटों को लुभाने के लिए यह चाल चली हो। पहले भी वह उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दिल्ली के बाटला मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के आजमगढ़ स्थित घर जाकर राजनीतिक बवाल खड़ा कर चुके हैं।

आजकल आरएसएस और हिंदुत्ववादी ताकतों को विशेष रूप से अपने निशाने पर लिए दिग्विजय कांग्रेस में दूसरे ‘अर्जुन सिंह’ बनने की कवायद में जुटे हुए हैं। यह सही है कि उन्होंने अपने बयानों से अब तक जो विवाद खड़े किए उससे कांग्रेस भी मुश्किलों में फंसी चाहे वह नक्सल समस्या से निबटने में चिदंबरम की विफलता को लेकर उनका लिखा लेख हो या फिर बाटला मुठभेड़ पर सवाल उठाने का, सभी मामलों में कांग्रेस मीडिया से आसानी से पल्ला नहीं छुड़ा पाई। लेकिन एक बात काबिले गौर है कि दिग्विजय जो भी विवाद खड़ा करें पार्टी के बड़े वर्ग का समर्थन उन्हें हासिल रहता है। चिदंबरम पर दिग्विजय की टिप्पणी के बाद ‘कांग्रेस संदेश’ में पार्टी अध्यक्ष ने नक्सल समस्या पर अपना जो मत रखा वह दिग्विजय के मत से मिलता जुलता था। यही नहीं दिग्विजय ने ही सबसे पहले ‘हिंदू आतंकवाद’ का मुद्दा उठाया और जब चिदंबरम ने भी यही बात कही तो यह बड़ा मुद्दा बन गया। दिग्विजय संघ और सिमी को एक जैसा काफी समय पहले से बताते रहे हैं लेकिन जब राहुल गांधी ने यही बात कही तो यह भी बड़ा मुद्दा बन गया। साफ है कि कांग्रेस के भीतर से उन्हें शह हासिल है। वह पहले तीर छोड़ते हैं यदि वह निशाने पर जा लगे तो पार्टी आलाकमान उसे बड़ा हथियार बना देता है।
अपने बयान पर विवाद होने के बाद अब भले ही दिग्विजय कह रहे हैं कि उनके कहने का मतलब यह नहीं था कि मुंबई हमले को आरएसएस ने अंजाम दिया लेकिन आरएसएस की छवि बिगाड़ने के अपने दायित्व को बखूभी निभा रहे दिग्विजय ने अपना काम तो कर ही दिया। पर विकीलीक्स के खुलासों से कांग्रेस मुश्किल में आ गई है क्योंकि एक तो इस पर वह स्पष्ट रूप से कुछ कह नहीं पा रही है दूसरे विपक्ष के अनुसार इससे कांग्रेस की इस योजना पर कुछ तो ग्रहण लगा ही है कि साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर लाभ अर्जित किया जाए।

बहरहाल, इस प्रकरण से कांग्रेस के सामने जो नई मुश्किल खड़ी हुई है उससे बाहर निकलना इतना आसान नहीं है क्योंकि विकीलीक्स के खुलासों ने विपक्ष को भी धारदार हथियार मुहैया करा दिया है। 2009 के लोकसभा चुनावों में एक बार फिर विजय प्राप्त करने के बाद शायद ही कांग्रेस ने सोचा होगा कि डेढ़ साल के भीतर सरकार बड़ी मुश्किलों का सामना करती दिखाई देगी। अब देखना यह है कि मुंबई हमले को राजनीतिक रंग देने की दिग्विजय की कवायद क्या गुल खिलाती है? यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या सचमुच इसके कारण देश का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दों से हट जाएगा?

आज संसद पर हुए आतंकवादी हमले को पूरे 9 वर्ष हो गए इस मौके पर संसद हमले के दौरान शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों और संसद भवन कर्मचारियों को सच्चे मन से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उम्मीद करता हूं कि सरकार कुम्भकर्णी नींद से जागेगी और इस हमले के गुनहगार अफजल गुरु को फांसी की सजा पर जल्द से जल्द तामील करेगी।

जय हिन्द
भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे