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Monday 3 January 2011

सुरक्षा बलों पर राजनीति करने से बचिए ‘सरकार’

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के सशस्त्र कैडरों को निहत्था करने और केंद्रीय सुरक्षा बलों के कथित दुरुपयोग के आरोपों पर जो राजनीति शुरू हुई है वह अंततः राज्य में माओवादियों और नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रही है। जहां केंद्र का सारा ध्यान माओवादियों से निपटने की राज्य की नाकामी को प्रचारित करने और ममता बनर्जी को खुश करने के लिए राज्य सरकार को विभिन्न तरीकों से घेरने पर लगा हुआ है वहीं राज्य सरकार भी सिर्फ इसी बात के लिए अथक प्रयास कर रही है कि किस प्रकार सत्ता में पुनर्वापसी हो सके।

पिछले सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्रालय और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच शुरू हुआ ‘पत्र युद्ध’ अभी कितना और चलेगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन इस ‘पत्र युद्ध’ के दौरान दोनों ओर से इस्तेमाल किये गये बयान रूपी अस्त्रों शस्त्रों से यह तो पता चल ही गया कि ‘राजनीति’ के लिए फिलहाल नक्सल विरोधी अभियान की किसी को चिंता नहीं है।

लोकतंत्र को परिपक्व बनाने और संवैधानिक दायित्वों को कर्मठता से निभाने का दावा करने वाली कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार में यह देख कर अचम्भा हुआ कि किस प्रकार राजनीति की वेदी पर केंद्र राज्य संबंधों को क्षति पहुंचाई जा रही है। जब संसद के मानसून सत्र को विपक्ष ने जेपीसी की मांग नहीं माने जाने पर नहीं चलने दिया था तो प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान बयान दिया था कि उन्हें संसदीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता हो रही है लेकिन उन्हें यह भी चिंता करनी चाहिए कि उनके मंत्री और मंत्रालय क्या क्या कर रहे हैं। आखिर क्यों और कैसे केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा किसी मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र मुख्यमंत्री को मिलने से पहले ही मीडिया में लीक कर दिया गया? यह भी बड़ा सवाल है कि क्यों गृह मंत्रालय और बंगाल सरकार की ओर से पत्रों के अंश पावक को पत्र मिलने से पूर्व मीडिया को जारी कर दिये गये?

इसे भी चुनावी राजनीति नहीं तो और क्या कहेंगे कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने चुनावों की ओर बढ़ रहे राज्य के मुख्यमंत्री को भेजे गये पत्र के बारे में आधिकारिक वक्तव्य में बताया कि मुख्यमंत्री को गृह मंत्री की ओर से लिखे गये पत्र स्पीड पोस्ट और फैक्स से भेज दिये गये हैं। गृह मंत्रालय की अपनी जो प्रतिष्ठा और संवैधानिक कद है वह यह नहीं कहता कि कोई भी पत्र भेजने पर वह वक्तव्य जारी कर बताए कि पत्र का जवाब भेज दिया गया है और किस माध्यम से भेजा गया है।

यह देख कर भी अचम्भा हुआ कि एक मंत्री द्वारा किसी मुख्यमंत्री को लिखे गये पत्र के बारे में दूसरा मंत्री मुख्यमंत्री से जवाब मांगे। यह सही है कि वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बंगाल से होने के नाते वहां से जुड़े मसलों पर दखल देने का अधिकार रखते हैं लेकिन गृह मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री बुद्धदेव को लिखे गये पत्र का जवाब देने की मुख्यमंत्री से मांग करना उन्हें शोभा नहीं देता।

रही बात बुद्धदेव भट्टाचार्य की तो उन्होंने भी गृहमंत्री की ओर से उठाए गए सशस्त्र कैडरों के संवदेनशील मुद्दे को हल्का बनाते हुए चिदंबरम के पत्र में प्रयोग किए गए ‘हरमद’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए इसे ही बड़ा मुद्दा बना दिया। बुद्धदेव को पता है कि माकपा के सशस्त्र गुटों के बारे में उनके पास कोई जवाब नहीं है इसलिए उन्होंने ‘हरमद’ शब्द पर अपनी आपत्ति को ही प्रमुखता से उठा कर राजनीति की। जिन सशस्त्र कैडरों को चुनावों से पहले निहत्था करने की जरूरत है, उन्हें निहत्था कैसे किया जाए इस बात पर चर्चा होने की बजाय उनको पुकारा किस नाम से जाए, इस पर विवाद को देखते हुए कहा जा सकता है कि ‘इट हैप्पन्स ओनली इन इंडिया’ क्योंकि कहीं और शायद हर चीज को चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखे जाने की इतनी कट्टर परम्परा नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वाममोर्चा के शासन में अनेकों खामियां हैं तथा बंगाल आज भी पिछड़ा हुआ है और वहां आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन ऐसा करने के लिए हमें लोकतंत्र की मान्य परम्पराओं के आधार पर ही कदम आगे बढ़ाना चाहिए साथ ही उन सुरक्षा बलों के मनोबल को कम करने का ऐसा कोई भी प्रयास नहीं करना चाहिए जो दिन रात माओवादी, नक्सली चुनौती का सामना कर रहे हैं।

जय हिन्द, जय हिन्दी
नीरज कुमार दुबे

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