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Monday, 3 September 2012

'राज' नीतिक आतंकवाद से भी सख्ती से निपटें


हाल ही में अफवाहें फैलाकर पूर्वोत्तर भारत के लोगों को देश के विभिन्न राज्यों से पलायन के लिए मजबूर करने वाली साजिशों के खिलाफ केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों ने तेजी से कार्रवाई की जिससे देश की एकता कायम रह सकी लेकिन दूसरी ओर उत्तर भारतीयों खासकर महाराष्ट्र में रह रहे बिहार के लोगों को स्पष्ट रूप से धमकी दे रहे राज ठाकरे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। राज ठाकरे ठीक उसी तरह 'अलगाववाद' की भावना भड़का रहे हैं जिस तरह हुर्रियत के कट्टरपंथी गुट घाटी में भड़काते हैं। आज जरूरत आतंकवाद के सभी रूपों से लड़ने की है जिनमें राज ठाकरे द्वारा फैलाया जा रहा 'राजनीतिक आतंकवाद' भी शामिल है।
आजकल मुंबई पुलिस के रहनुमा बनने का दिखावा कर रहे राज ने सभी बिहारियों को घुसपैठिया करार देने और उन्हें राज्य से खदेड़ देने की धमकी दी है। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा है क्योंकि बिहार के एक युवक की गिरफ्तारी पर बिहार सरकार ने मुंबई पुलिस के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कही थी। राज ठाकरे ने हिंदी न्यूज चैनलों को भी बंद करवा देने की धमकी दी है क्योंकि उनके अनुसार वह उनकी बिहारी विरोधी टिप्पणियों के लिए उन्हें खलनायक की तरह पेश कर रहे हैं। राज ठाकरे के समर्थकों ने शुरुआत के तौर पर भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन कर रहे सिनेमाघरों पर तोड़फोड़ की। संभव है कि इस मामले में इक्का-दुक्का गिरफ्तारी हुई भी हो लेकिन क्या धमकी वाले मामले में राज ठाकरे से पूछताछ और उनके खिलाफ कार्रवाई की गई?

राज ठाकरे जिस अंदाज में 'भड़काऊ' राजनीति कर रहे हैं क्या उस पर लगाम लगाने का माद्दा किसी में नहीं है? आज महाराष्ट्र की कई विपक्षी पार्टियों में से एक एमएनएस का यह नेता यदि विपक्ष में रह कर इस तरह की दादागिरी कर रहा है तो सोचिए यदि उसकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह क्या करेगा? राज ठाकरे उत्तर भारतीय विरोध तक ही सीमित नहीं हैं। राज ने एक टीवी कार्यक्रम में पाकिस्तानी कलाकारों के साथ मंच साझा करने के प्रति सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले को भी चेतावनी दी और उनसे ऐसा नहीं करने को कहा। खबरें हैं कि ऐसी ही चेतावनी माधुरी दीक्षित को भी दी गई है। कुछ समय पहले कुछ विदेशी कलाकारों की एमएनएस कार्यकर्ताओं ने पिटाई भी की थी और फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ कर निर्माताओं से सह-कलाकारों की भूमिका में महाराष्ट्र के लोगों को लेने को कहा था।

राज ठाकरे जिस 'हौसले' के साथ कभी उत्तर भारतीयों के खिलाफ आग उगलते हैं तो कभी बिहारियों के महापर्व 'छठ पूजा' का मजाक उड़ाते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती उससे साफ है कि उन्हें राजनीतिक शह प्राप्त है। आरोप लगते हैं कि यह शह किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस ने उन्हें दी हुई है ताकि वह शिवसेना भाजपा के मतों में विभाजन करा सकें। कांग्रेस जानती है कि राज ठाकरे जितने मजबूत होंगे शिवसेना भाजपा उतने ही कमजोर होंगे। हाल ही में मुंबई पुलिस के प्रमुख को जब राज ने हटाने की मांग की तो दो दिन बाद ही उन्हें हटा दिया गया और कहा गया कि उनके तबादले की योजना पहले से ही थी और राज की मांग से इसका लेना देना नहीं है।

लेकिन हकीकत को बयां करने के लिए और भी वाकये काफी हैं। जब राज उत्तर भारतीयों के खिलाफ आग उगलते हैं तो महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता तो चुप बैठे रहते हैं लेकिन दिल्ली में उत्तरी राज्यों के नेता जरूर इसकी निंदा करते हैं क्योंकि उन्हें वहां पर अपने वोटों की फिक्र है। शिवसेना भी चूंकि मराठी मानुष की ही राजनीति करती है इसलिए उसकी ओर से विरोध का सवाल ही नहीं उठता। राकांपा की ओर से गृह मंत्रालय संभाल रहे आरआर पाटिल राज विरोधी के रूप में पहचाने जाने के कारण उनकी टिप्पणियों पर नाराजगी प्रकट करते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी के अजित पवार जोकि राज्य के उपमुख्यमंत्री भी हैं, वह हिंदी दिवस संबंधी प्रश्न का भी मराठी में जवाब देते हुए कहते हैं कि मैं महाराष्ट्र का नेता हूं और मराठी में ही बोलूंगा। हैरत तो इस बात की होती है कि उत्तर भारत में ही प्रमुखतः जनाधार रखने वाली भाजपा के महाराष्ट्र के नेता भी राज ठाकरे की ओर से उत्तर भारतीयों के खिलाफ विषवमन के दौरान चुप बैठे रहते हैं दिल्ली में एकाध नेताओं से राज के बयानों की आलोचना करवा कर खानापूर्ति कर दी जाती है। दरअसल भाजपा को लगता है कि शिवसेना यदि कमजोर हुई तो राज का सहारा लिया जा सकता है। यदि राज ठाकरे के माध्यम से सभी पार्टियों के नेता राजनीतिक हित नहीं साध रहे हैं तो क्या नितिन गडकरी, पृथ्वीराज चव्हाण राज ठाकरे के बयानों की निंदा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं?

भावनाएं भड़काने के लिए राज ठाकरे के खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले चल रहे हैं लेकिन सरकारी ढि़लाई के चलते ही उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो पा रहे। जब तक राज ठाकरे जैसे व्यक्ति को कड़ी सजा नहीं मिलेगी उनका हौसला बढ़ता जाएगा। जरूरत इस बात की है कि राज ठाकरे के खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई महाराष्ट्र के बाहर की अदालत में की जाए क्योंकि लगता है कि महाराष्ट्र सरकार या तो राज ठाकरे को गिरफ्तार नहीं करवाना चाहती या फिर उनकी संभावित गिरफ्तारी से उनके समर्थकों के भड़क जाने से डरती है। यदि सरकार कड़ा रुख अख्तियार कर ले तो राज ठाकरे और उनके समर्थक चूं भी नहीं कर सकते लेकिन सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की साफ कमी है।

राज ठाकरे वैसे तो बड़े शेर बनते हैं लेकिन जब मुंबई में सबसे बड़ा आतंकवादी हमला '26/11' को अंजाम दिया जा रहा था तब वह और उनके समर्थक हालात संभल जाने तक छिपे ही रहे। तब सीमा पार से आए आतंकवादियों से भिड़ने के लिए एनएसजी की जो टीम दिल्ली से भेजी गई थी उनमें बिहार के लोग भी थे जोकि प्रांतवाद या भाषावाद की भावना नहीं रखते थे। मुंबई और महाराष्ट्र के विकास में उत्तर भारतीयों का भी उतना ही योगदान रहा है जितना कि महाराष्ट्र के लोगों का। आज हिंदी फिल्म उद्योग में राज कर रहे कई प्रमुख अभिनेता, अभिनेत्री मूल रूप से उत्तर भारत के हैं। यही नहीं बॉलीवुड में इधर ऐसे सफल निर्देशकों की बाढ़ आई है जोकि उत्तर भारत खासकर बिहार से ताल्लुक रखते हैं। उत्तर और दक्षिण भारत की ऐसी सैकड़ों कंपनियां हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में अपनी इकाई स्थापित कर लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराया हुआ है।

बहरहाल, महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय यदि आज आशंकित मन से हैं तो इसका प्रमुख कारण यही है कि उनका नेतृत्व करने वाला कोई प्रमुख नेता नहीं है। उत्तर भारतीयों को वहां सिर्फ वोटर के रूप में ही देखा जाता है। चुनावों के समय भले उन्हें याद किया जाता हो लेकिन उसके बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। हाल ही में जब पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ अफवाहें फैलाई गईं तो पूर्वोत्तर राज्यों के मंत्री कई राज्यों में हालात का जायजा लेने गये लेकिन ऐसा कुछ कभी भी महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर आए संकट के दौरान नहीं देखा जाता। उत्तर भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए मुंबई आना तो भाता है लेकिन अपने राज्य से जुड़े लोगों की सुध वह अपनी राजधानियों में बैठे बैठे बयान जारी कर ही ले लेते हैं।

यह सही है कि राज ठाकरे को आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से अपनी पार्टी का आधार बढ़ाने का पूरा हक है। लेकिन इसके लिए उन्हें सत्ता पक्ष या अन्य विपक्षी दलों को निशाने पर लेना चाहिए। सरकार की कारगुजारियों और एमएनएस के नेतृत्व वाली नगर पालिकाओं के कार्यों की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए। प्रांतवाद या भाषावाद की भावनाएं भड़का कर राजनीतिक हित साधना गलत है।

आज जरूरत इस बात की है कि राज ठाकरे जैसे लोगों की वाणी पर लगाम लगाने में सरकारों की असफलता को देख कर अदालतों को स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ा फैसला सुनाना चाहिए क्योंकि बात सिर्फ बिहारियों की नहीं बल्कि भारत के एक राज्य के लोगों के प्रति दूसरे राज्य के लोगों के मन में भावनाएं भड़काने का है। आज जो व्यक्ति प्रांत और भाषा के नाम पर लोगों को भड़का रहा है कल को वह धर्म और जाति के नाम पर भी लोगों को भड़का सकता है। चुनाव आयोग को भी चाहिए कि वह राजनेताओं के विवादित बयानों पर चुनावों के समय ही नोटिस नहीं भेजे बल्कि किसी भी समय दिये गये नेताओं के विवादित बयानों पर विचार कर कड़ी कार्रवाई करे। यदि राज जैसे लोगों के बढ़ते हौसले पर लगाम नहीं लगाई गई तो कल को विभिन्न राज्यों में उनके जैसे लोग खड़े हो सकते हैं और फिर 'अनेकता में एकता' की हमारी विशिष्ट पहचान खतरे में पड़ सकती है।

भारत माता की जय
नीरज कुमार दुबे
 

Monday, 25 June 2012

अबू हमजा की गिरफ्तारी भारत की बड़ी कामयाबी


मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के प्रमुख आरोपी और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी सैयद जबीउद्दीन उर्फ रियासत अली उर्फ अबू हमजा का सुरक्षा एजेंसियों के हत्थे चढ़ना एक बड़ी कामयाबी है। उम्मीद है कि एक बार फिर दुनिया जानेगी कि किस प्रकार पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ आतंकवाद की साजिशें बनाई जाती हैं और उन्हें अंजाम देने के लिए क्या क्या यत्न किये जाते हैं। भारत पाकिस्तान से 26/11 के दोषियों को सजा देने की समय समय पर मांग करता रहा है लेकिन पाकिस्तान की इसमें कभी रूचि रही ही नहीं। मुंबई आए दस हमलावरों में से 9 को तो भारतीय सुरक्षा बलों ने सजा दे दी और एक अभी सजा पर अमल होने के इंतजार में है लेकिन हमले के साजिशकर्ताओं में शामिल रहे लोगों में से कोई पहली बार भारतीय कानून के शिकंजे में आया है। वैसे तो इस हमले के अन्य साजिशकर्ता डेविड हेडली और तहाव्वुर हुसैन राणा भी इस समय गिरफ्त में हैं लेकिन अमेरिका की।

यह बात जांच एजेंसियों ने भी साबित की और बाद में आतंकवादी अजमल कसाब ने भी अदालत में स्वीकार की कि 26 नवंबर 2008 को जो 10 फिदायीन आतंकवादी मुम्बई आए थे, उन्हें पाकिस्तान में जिन लोगों ने प्रशिक्षण दिया था उनमें से एक नाम अबू हमजा भी था जिसने दसों आतंकवादियों को अन्य चीजों के अलावा हिन्दी बोलना भी सिखाया था। डेविड हेडली से पूछताछ के दौरान भी हमजा का नाम सामने आया था।
लश्कर में अबू का मतलब होता है सेनापति और यहां सारे अबू का जो सरदार होता है, उसे अबू हमजा कहा जाता है। मूलत: अबू हमजा फिदायीन दस्ते का लीडर होता है। इस लिहाज से देखें तो अबू हमजा का काबू में आना यकीनन बहुत बड़ी बात है। रिपोर्टों की मानें तो लश्कर में आतंकवादियों को अबू उर्फ नाम बड़ी मुश्किल से मिलता है। इस लिहाज से देखें तो मुंबई पर हमला करने आए दस आतंकवादी लश्कर के लिए बहुत महत्व रखते थे क्योंकि जो 10 आतंकवादी मुम्बई आए थे, उनमें से ज्यादातर के उर्फ नाम का पहला शब्द अबू ही था। मसलन अजमल कसाब का उर्फ नाम अबू मजाहिद है, जबकि उसके साथ सीएसटी में गोलीबारी करने वाले इस्माइल खान का उर्फ नाम था अबू इस्माइल। ताज होटल में जो 4 आतंकवादी घुसे थे, उनमें से भी 2 के उर्फ नाम के पहले अबू ही जुड़ा था। ये दो आतंकवादी थे अबू अली और अबू उमेर। अबू अली का मूल नाम जावेद था, जबकि अबू उमेर का नजीर।

26/11 के दोषी इस आतंकवादी के 26 नाम बताये जाते हैं। महाराष्ट्र के रहने वाले अबू राज्य के सभी इलाकों के बारे में अच्छी जानकारी रखता है तभी तो वह पाकिस्तान में अपने आकाओं के साथ टीवी पर पूरे ऑपरेशन को देखकर बीच-बीच में कसाब और उसके साथियों को हिंदी में निर्देश दे रहा था। 26/11 हमले के अलावा अबू हमजा की कई और आतंकवादी वारदातों में तलाश थी। फरवरी 2010 में पुणे की जर्मन बेकरी में हुए ब्लास्ट में भी वो आरोपी है। इस धमाके में 11 लोग मारे गए थे और 59 लोग घायल हुए थे। सितंबर 2010 में दिल्ली की जामा मस्जिद के पास बम प्लांट करने के मामले में भी उसका नाम आया था। मई 2006 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 10 एके 47 राइफलें बरामद हुईं थी, हमजा का नाम इस मामले में भी आया था।

अबू हमजा नाम से केवल एक ही आतंकी हो ऐसा भी नहीं है। पिछली कुछ खबरों पर गौर करें तो देखने को मिलता है कि लश्कर ने यह नाम कइयों को दिया हुआ है। जब संसद पर हमला हुआ था, तो उस वक्त भी एक अबू हमजा का नाम सामने आया था। वह अबू हमजा संसद के बाहर खड़े सुरक्षाकर्मियों के हाथों एनकाउंटर में मारा गया था। कुछ साल पहले एक अबू हमजा ठाणे पुलिस द्वारा भी पकड़ा गया था। यह अबू हमजा जम्मू-कश्मीर में हुई कई वारदातों में शामिल था, इसलिए ठाणे पुलिस ने उसे जम्मू-कश्मीर पुलिस को सौंप दिया था जिसकी हिरासत से वह भाग गया।

जय हिंद, जय हिंदी
नीरज कुमार दुबे

Wednesday, 4 April 2012

हाफिज सईद पर इनामः एक तीर से कई निशाने


लश्कर-ए-तय्यबा के संस्थापक हाफिज सईद के सिर पर अमेरिका की ओर से एक करोड़ डालर का इनाम घोषित करने के कदम से भारत को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अमेरिका भले यह कह रहा हो कि यह इनाम मुख्य रूप से 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले में सइर्द की भूमिका के लिए रखा गया है और वह उसे सजा मिलते देखना चाहता है, लेकिन असलियत यह है कि अमेरिका ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि सईद और उसके आतंकी संगठन पाकिस्तान पर अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में नाटो के लिए सप्लाई मार्ग खोले जाने की राह में रोड़ा बने हुए हैं।

यदि अमेरिका को मुंबई हमले का इतना ही दर्द है तो उस घटना के लगभग तीन साल बाद उसे साजिशकर्ताओं को सबक सिखाने की सुध क्यों आई? अमेरिका ने जो इनाम घोषित किया है उसकी टाइमिंग देखने से तो यही प्रतीत होता है कि उसने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक तो इससे पाकिस्तान सरकार पर दबाव बनेगा दूसरा भारत की सरकार अमेरिका के इस कदम से खुश हो जाएगी तथा अमेरिकी कंपनियों को भारत से और ठेके या फिर लाभ के करार करने के अवसर मिलेंगे। दूसरा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव भी आसन्न हैं, इस कदम के पीछे घरेलू राजनीतिक कारण ही ज्यादा नजर आ रहे हैं ताकि राष्ट्रपति बराक ओबामा के विरोधियों को यह कहने का मौका नहीं मिले कि अफगानिस्तान में अमेरिका नीत नाटो सेना की बुनियादी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

यह बात सब जानते हैं कि ओसामा बिन लादेन को ढूंढने में अमेरिका को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी, उसने अपनी खुफिया एजेंसियों और उपग्रहों के जरिए वर्षों बाद आखिरकार उसे ढूंढ निकाला था। लगभग ऐसी ही मेहनत अमेरिकी बलों ने सद्दाम हुसैन को ढूंढने में भी की थी लेकिन हाफिज सईद तो वर्षों से सबके सामने है। अमेरिकी न्यूज चैनलों और खबरिया वेबसाइटों पर न जाने कितनी बार उसकी रैलियों और भाषणों की खबरें प्रसारित, प्रकाशित हुई हैं। खुद पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी राजदूत और अन्य राजनयिक सईद की गतिविधियों से नित रूबरू होते रहते होंगे। सीआईए जैसी खुफिया एजेंसी भी यह न जानती हो कि सईद कहां पर है, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। अमेरिका यदि चाहे तो सईद का भी वही अंजाम हो सकता है जोकि ओसामा का हुआ क्योंकि अमेरिकी कानून इस बात की इजाजत देते हैं कि देश के दुश्मन को कहीं भी मार गिराने का अधिकार सुरक्षा बलों को है। यदि अमेरिका सचमुच सईद को आतंकवाद का सरगना मानता है तो इनाम घोषित करने की बजाय उस पर सीधे कार्रवाई ही करनी चाहिए थी। इनाम तो उस पर घोषित किया जाता है जिसका कोई अता पता न हो दूसरी ओर सईद खुलेआम अमेरिका को कार्रवाई की चुनौती देते हुए कह रहा है कि हम गुफा में छिप कर नहीं बैठे।

बहरहाल, अब जब इनाम घोषित कर ही दिया गया है तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया जाना चाहिए और सईद को गिरफ्तार करना चाहिए। लेकिन लगता है सारा मामला कागजी प्रक्रियाओं में ही उलझ कर रह जाने वाला है क्योंकि पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक का कहना है, ‘‘मुझे मीडिया से जानकारी मिली कि उसके सर पर इनाम रखा गया है। हमें अमेरिका से या किसी अन्य राजनयिक माध्यम से कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। इस विषय पर हमें मीडिया से जानकारी प्राप्त हुई है।‘‘ यह सच है कि पाकिस्तान सरकार किसी भी हालत में सईद को अमेरिका को नहीं सौंपेगी क्योंकि वह जानती है कि उसके द्वारा बनाये गये संगठनों का देश में व्यापक आधार है और देशभर में अमेरिका के खिलाफ माहौल के बीच सईद के खिलाफ कार्रवाई से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।

यह बात सभी जानते हैं कि सईद को सरकार की ओर से पूरी शह मिलती रही है और उसके द्वारा प्रदान किये गये सुरक्षाकर्मी भी दिन रात सईद की सुरक्षा में लगे रहते हैं। सईद 2008 के मुंबई हमलों के आलोक में हल्का झटका खाने के बाद पाकिस्तान की जिहादी राजनीति में फिर से अहम किरदार बनकर उभरा है। अमेरिका ने उसका नाम दुनिया के पांच सबसे वांछित आतंकवादियों की सूची में भले अब डाला हो लेकिन भारत के लिए वह पांच सबसे वांछितों की सूची में बहुत पहले से रहा है। मुंबई आतंकी हमलों के बाद पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दबाव में सईद को नजरबंद किया गया था लेकिन पिछले साल इस आतंकी ने जोरदार वापसी की और डेफा ए पाकिस्तान परिषद (डीपीसी) नामक छद्म संगठन के तहत 40 कट्टर और चरमपंथी संगठनों को एक किया। पिछले साल नवंबर में नाटो के एक हवाई हमले में 24 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने के बाद अमेरिका विरोधी भावनाओं को भुनाते हुए डीपीसी ने पूरे देश में बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित की हैं। डीपीसी में कुख्यात प्रतिबंधित संगठन सिपाह ए सहाबा भी शामिल है। इन सभी आयोजनों में सईद जैसे आतंकियों ने अमेरिका और भारत को निशाना बनाते हुए जिहाद का नारा बुलंद किया।

मुंबई हमलों के बाद एक साल से ज्यादा समय तक सईद ने अपनी गतिविधियां कम रखीं और कुछ समय तक अधिकारियों ने उसके रैलियों में भाग लेने पर रोक लगा दी। हालांकि 2011 में उसने सार्वजनिक मंचों पर कदम रखा और पिछले साल 11 अप्रैल को कश्मीरी नेता मौलवी शौकत अहमद शाह के जनाजे में शामिल हुआ। इसके बाद, सईद ने सार्वजनिक बैठकों में पीएमएल-एन अध्यक्ष रजा जफरूल हक और पूर्व विदेश मंत्री जैसे शीर्ष राजनीतिकों के साथ मंच साक्षा किया। सईद की इन राजनीतिकों के साथ मेलजोल राजनीतक पार्टियों की ओर से उसकी स्वीकार्यता को दिखाता है। जमात.उद.दावा का पाकिस्तान भर में बहुत बड़ा नेटवर्क है और 2005 के भूकंप, 2010 के बाढ़ के बाद राहत अभियान चलाकर उसने लोगों के बीच अपनी अच्छी साख बनाने की कोशिश भी की।

बहरहाल, अब यह साफ है कि हाफिज सईद को सबसे वांछित व्यक्तियों की सूची में रखने का समय संदिग्ध है क्योंकि पाकिस्तान अमेरिकी संबंध अभी बदतर स्थिति में हैं। यह पाकिस्तानी सेना पर दबाव डालने का अमेरिकी रास्ता हो सकता है। अब वाकई बड़ी हास्यास्पद स्थिति है कि इस तथ्य के बावजूद सईद के सर पर इनामी राशि रखी गई है कि वह खुलेआम पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में सार्वजनिक रैलियां करता है।

जय हिंद, जय हिंदी
नीरज कुमार दुबे

Monday, 16 January 2012

दिग्विजय जी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी

26 जनवरी 2009 को गणतंत्र दिवस पर राज पथ पर उपस्थित जनों को रक्षा मंत्रालय की ओर से प्रकाशित जो पत्रिका दी जा रही थी उसमें देश के महत्वपूर्ण वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित होने वाले लोगों के बारे में जानकारी दी गयी थी। पत्रिका में मोहन चन्द शर्मा के बारे में लिखा गया था-

''श्री मोहन चन्द शर्मा, इन्सपेक्टर, दिल्ली पुलिस को 19 सितम्बर 2008 को एक खास सूचना मिली कि दिल्ली श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के संबंध में वांछित एक संदिग्ध व्यक्ति जामिया नगर, दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में स्थित बटला हाउस के एक फ्लैट में छिपा हुआ है। श्री शर्मा सात सदस्यीय दल का नेतृत्व करते हुये तुरंत उस फ्लैट पर पहुंचे। ज्यों ही उन्होंने फ्लैट में अन्य दरवाजे से प्रवेश किया, उनको फ्लैट के अंदर छुपे हुये आतंकवादियों की ओर से गोलीबारी का पहली बौछार लगी। निभ्रीकता के साथ उन्होंने गोलीबारी का जवाब दिया। इस प्रकार शुरू हुई दोनों तरफ की गोलीबारी में दो आतंकवादी मारे गये तथा एक पकड़ा गया। श्री मोहन चन्द शर्मा ने आतंकवादियों से लड़ते हुये अनुकरणीय साहस और कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।''

अब दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के उस बयान को देखें जिसमें वह इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए इसकी न्यायिक जांच की मांग की रट लगाये हुए हैं। यहां सवाल यह उठता है कि राष्ट्रपति की ओर से गणतंत्र दिवस पर जिस व्यक्ति को मरणोपरांत सम्मानित किया जा रहा हो और जिसकी वीरगाथा के ब्यौरे वाली सरकारी पत्रिका राज पथ पर वितरित की गयी हो, उसके अंशों पर यकीन किया जाए या फिर दिग्विजय सिंह जैसे बयानबाजी करने वाले नेता की बातों पर? सियासत के लिए नेता शहादत के महत्व को कैसे कम कर देते हैं इसकी मिसाल सिर्फ मोहन चन्द शर्मा के मामले में ही देखने को नहीं मिलती बल्कि दिग्विजय ने तो मुंबई हमले में मारे गये एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर भी अप्रत्यक्ष रूप से यह कहते हुए सवाल उठा दिया था कि वह मालेगांव धमाके की जांच के चलते कथित रूप से भगवा खेमे के निशाने पर थे। जबकि सच्चाई यह है कि करकरे आतंकवादियों की गोलीबारी में शहीद हुए थे।

दरअसल, दिग्विजय ने बटला मुठभेड़ मामले को ‘बोतल में बंद जिन्न’ के रूप में रखा हुआ है। जब कभी उन्हें जरूरत पड़ती है तो वह बोतल का ढक्कन खोल देते हैं। इस बार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यकों के मत अपनी पार्टी को दिलाने के प्रयास में इस जिन्न को बाहर निकाला। जिन्न ने भी बाहर आते ही एक दूसरे को भिड़ाने का काम शुरू कर दिया है। दिग्विजय ने जब मुठभेड़ को एक बार फिर फर्जी बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इस मामले की न्यायिक जांच के पक्षधर नहीं थे तो तुरंत ही गृह मंत्री ने इस दावे का खंडन करते हुए मुठभेड़ को ‘असली’ करार दिया। प्रदेश में सरकार बनाने की दौड़ में अपने को आगे मान रही समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां ने इस मामले में दिल्ली की शीला सरकार को घेरते हुए मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमे और उन्हें जेल भेजने की मांग की तो भाजपा ने पूरे मामले पर श्वेतपत्र की तथा प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की प्रतिक्रिया की मांग की है। कुछ छुटभैये नेताओं को भी यह मामला अनुकूल लगा तो दिल्ली में चुनाव लड़ने के इच्छुक एक शख्स ने रातोंरात लोकप्रिय होने की चाहत में बटला मुठभेड़ पर योगगुरु स्वामी रामदेव की टिप्पणी से नारज होकर उन पर कालिख फेंक दी।

कांग्रेस पर पहले भी तुष्टिकरण की नीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन हाल ही में पार्टी का ‘दोमुंहापन’ तब देखने को मिला जब केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने पर मुसलमानों को पिछड़े वर्ग के कोटे से 9 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता ने इसे उनका निजी विचार करार दिया। दिग्विजय ने बटला मुठभेड़ की असलियत पर सवाल उठाये तो गृह मंत्री ने मुठभेड़ को असली करार दिया। यदि यह ‘दोमुहांपन’ सिर्फ वोटों की ही खातिर है तो इसे काफी खतरनाक कहा जाएगा क्योंकि यह आतंकवादी ताकतों के आगे समर्पण करना ही माना जाएगा। उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी कांग्रेस को वह उदाहरण याद रखना चाहिए जिसमें भाजपा को विभिन्न चुनावों में अफजल को फांसी और आतंकवाद को मुद्दा बनाने का नतीजा भुगतना पड़ा।

दिग्विजय जोकि पूर्व में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामाजी’ कह कर संबोधित कर चुके हैं, वह अल्पसंख्यकों के हित में जो कदम उठाना चाहते हैं वह सही भले हो लेकिन उस कदम को उठाने का तरीका कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जनता यह जानना चाहती है कि जिस बटला मुठभेड़ को सरकार के अलावा तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने असली बताया हो और अदालतों ने जिसकी जांच की मांग खारिज कर दी हो, उसके ‘फर्जी’ होने की बात दिग्विजय आखिर किस विशेषज्ञता के आधार पर कह रहे हैं?

जय हिंद, जय हिंदी

नीरज कुमार दुबे

Friday, 25 November 2011

किशनजी की मौत से आतंक का एक और अध्याय समाप्त


देश के नक्सल प्रभावित राज्यों में आतंक का दूसरा पर्याय बन चुके शीर्ष माओवादी नेता मोलाजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मौत से नक्सल आंदोलन का एक प्रमुख अध्याय समाप्त हो गया है। 26/11 के मुंबई हमलों की बरसी से ठीक पहले आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर यह सचमुच सरकार और जनता के लिए बड़ी राहत की खबर है। यकीनन नक्सल विरोधी कमांडो बटालियन कोबरा ने नक्सली आंदोलन पर जो कमरतोड़ कार्रवाई की है उससे उसका शीर्ष नेतृत्व ही लगभग ध्वस्त हो गया है।

हालांकि इस घटनाक्रम के बाद माओवादियों की ओर से बदला लेने की कोई बड़ी कार्रवाई की जा सकती है इसलिए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इस समय अत्यधिक सुरक्षा बरते जाने की जरूरत है साथ ही सुरक्षा बलों को चाहिए कि नेतृत्व के धराशायी होने से हताश माओवादियों को संभलने का मौका दिए बिना उनके खात्मे का प्रयास तेजी के साथ जारी रखें और ‘लाल गलियारे’ के लक्ष्य को नेस्तनाबूत कर दें। माओवादी और नक्सली देश के विकास की राह में बहुत बड़े बाधक हैं और यह भारत के लिए तालिबान से कम नहीं हैं। सभ्य समाज में इनकी कोई जरूरत नहीं है। यह जो भी सवाल उठाते रहे हैं उसके पीछे कारण चाहे जो हों लेकिन कानून अपने हाथ में लेना, आतंक फैलाना और अपने देश के खिलाफ आईएसआई जैसे विदेशी संगठनों की मदद से अभियान चलाना किसी भी तरह से क्षमा लायक नहीं है।

किशनजी की मौत की खबर हालांकि इससे पहले भी एक बार उड़ी थी लेकिन इस बार उसका शव मुठभेड़ के बाद बरामद किया गया और पहचान की गई। किशनजी माओवादी पोलित ब्यूरो का सदस्य था और जंगलमहल में 2009 से सशस्त्र संघर्ष के नेतृत्व करने वालों के पदसोपान में तीसरे नम्बर पर था। इलाके में किशनजी की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद अभियान चलाने वाले सीआरपीएफ, बीएसएफ और कोबरा के 1,000 जवानों ने सराहनीय काम किया है क्योंकि इन्होंने न सिर्फ नक्सली व माआेवादी हमलों में मारे गये सुरक्षा बलों की मौत का बदला लिया बल्कि आगे के लिए भी अपने साथियों सहित जनता को महफूज करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया।

किशनजी को घेरे जाने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस के कुछ कायर्कर्ताआें की हत्या के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह ठान लिया था कि 'अब बहुत हो चुका*। यही नहीं पिछले दिनों उन्होंने माओवादियों को आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक भी बताया था। खबरों के मुताबिक इस बार किशनजी की योजना झारखंड के मालाबल जंगल में भाग जाने की थी लेकिन सुरक्षा बलों ने बच कर निकलने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया और उसे बुरीसोल जंगल में रोक दिया और मार गिराया।
किशनजी की मौत अपने शासन के छह महीने बाद जनता और विपक्ष के सवालों से घिरीं ममता बनर्जी के लिए जबरदस्त राहत लेकर आई है। किशनजी की मौत के बाद कुछ लोग उन्हें ‘दुर्गा’ की उपाधि दे रहे हैं लेकिन उन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि ममता पर चुनावों के समय माओवादियों का साथ लेने के आरोप भी लगते रहे हैं। खुद ममता ने चुनावों से पहले कई बार उनसे सहानुभूति दर्शाई थी लेकिन उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’।

किशनजी की मौत पर राजनीति भी शुरू हो गयी है। पश्चिम बंगाल की विपक्षी पार्टी माकपा इस 'कामयाबी' को तवज्जो नहीं दे रही है और कह रही है कि इससे माओवादियों पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें राष्ट्रविरोधी ताकतों का समर्थन प्राप्त है। यही नहीं राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सूर्यकांत मिश्रा ने तो यहां तक कहा कि ''यदि वह जिंदा पकड़े जाते, तो मुझे ज्यादा खुशी होती है। मेरी उनके परिवार के प्रति सहानुभूति है।'' बहरहाल, राजनीतिज्ञ इस घटनाक्रम से अपने फायदे और नुकसान का आकलन लगाते रहें लेकिन सुरक्षा बलों के लिए तो यह बहुत ही बड़ी कामयाबी है जोकि माओवादी हमलों के सबसे ज्यादा शिकार रहे हैं।

इसके साथ ही इस बात को लेकर भी बहस शुरू हो गयी है कि क्या भाकपा (माओवादी) संगठन में तीसरा स्थान मनहूस है, यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि सुरक्षा बलों की ओर से जिन दो शीर्ष नक्सली नेताओं किशनजी और आजाद को मारा गया तब वे अधिक्रम में तीसरा स्थान ही हासिल किये हुए थे। मूलत: तेलुगू भाषी किशनजी के सिर पर 19 लाख रुपये का इनाम था और वह नक्सलियों की शीर्ष संस्था पोलित ब्यूरो में तीसरा 'इन कमांड' थे। इससे पहले पिछले साल आजाद को आंध्र प्रदेश पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था। उस समय आजाद के पास भी नंबर तीन का स्थान हासिल था। गौरतलब है कि गृह मंत्रालय की ओर से तैयार डोजियर के अनुसार, भाकपा (माओवादी) पोलित ब्यूरो का शीर्ष प्रमुख महासचिव गनपति है जिनके सिर पर 24 लाख रुपए का इनाम है। दूसरा 'इन कमांड' एन॰ केशव राव है जिनके सिर पर 19 लाख रुपए का इनाम घोषित है। पोलित ब्यूरो के अन्य सदस्य कत्तम सुदर्शन, माल्लोजुला वेणुगोपाल, प्रशांत बोस उर्फ किशन दा और मल्लाराजी रेड्डी हैं।

जय हिंद, जय हिंदी
नीरज कुमार दुबे

Thursday, 8 September 2011

आतंकवाद पसार रहा पांव, फेल हो रहे सरकारी दांव



देश की राजधानी दिल्ली फिर दहली, फिर मारे गये आम नागरिक, फिर शुरू हुई आरोप प्रत्यारोप की राजनीति, फिर बिठाई गई जांच, फिर सामने आई सुरक्षा में चूक की बात, फिर फेल हुई खुफिया एजेंसियां, फिर ढूंढा गया एक और घटना को बयान करने के लिए शार्टकट ‘9/7’ और इसके साथ ही अंत में हमने फिर नहीं सीखा कोई सबक। यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि देश में आतंकवादी घटनाएं पांव पसारती जा रही हैं और केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे है। जिन ‘कड़ी सुरक्षाओं’ और ‘सुरक्षा के पुख्ता प्रबंधों’ का हवाला दिया जा रहा है वह तो सिर्फ नेताओं, वीवीआईपी, होटलों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों तक ही सीमित हैं। नेताओं की सुरक्षा की तो समय समय पर समीक्षा की जाती है और उन्हें कभी जेड तो कभी वाई तो कभी एनएसजी तो कभी किसी और उच्च स्तर की सुरक्षा मुहैया करायी जाती है लेकिन आम जनता को तो भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया है।

जनता की उच्च सुरक्षा की बात तो छोडि़ये स्थानीय पुलिस थानों में भी पर्याप्त कर्मी नहीं होते हैं जो इलाके पर नजर रख सकें। दिल्ली उच्च न्यायालय में हालांकि कड़ी सुरक्षा रहती है लेकिन जहां आम आदमी अंदर जाने के लिए प्रवेश पास बनवाता है उस स्थल की सुरक्षा का ख्याल किसी को नहीं आया। यही नहीं उच्च न्यायालय परिसर के भीतर तो सीसीटीवी कैमरा मौजूद हैं लेकिन जहां पर सिर्फ आम जनता को काम पड़ता है वहां इन कैमरों की व्यवस्था नहीं की गयी। इस बारे में दिल्ली पुलिस की ओर से कहा जा रहा है कि सीसीटीवी लगाने के लिए वह पहले ही सीपीडब्ल्यूडी को पत्र लिख चुकी है। यहां सवाल यह उठता है कि आम आदमी की जान की कोई कीमत इस सरकार और प्रशासन की नजर में है या नहीं? किसी भी घटना के बाद मुआवजा घोषित कर सरकार अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती है लेकिन उन परिवारों से जाकर पूछिये जो ऐसी घटनाओं में अपने प्रियजनों को खो बैठते हैं कि उन पर क्या बीती है और क्या यह मुआवजा उनको हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति कर सकता है?

दिल्ली उच्च न्यायालय के स्वागत कक्ष के बाहर हुए विस्फोट के तत्काल बाद एक पुलिस अधिकारी का टीवी चैनलों पर यह कहना कि वह एरिया हमारे कंट्रोल में नहीं था, बेहद आपत्तिजनक है। दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी पूरी दिल्ली की सुरक्षा की है ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी परिसर के अमुक इलाके की सुरक्षा हमारे जिम्मे नहीं है। दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी का पता भी इस बात से चलता है कि तीन महीने तेरह दिन पहले जिस जगह (दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर पार्किंग में) धमाका हुआ उस जगह की सुरक्षा के उसने क्या प्रबंध किये थे। 25 मई को हुए उस धमाके की जांच अब तक जारी है और पुलिस के हाथ पूरी तरह खाली हैं। मीडिया रिपोर्टों पर गौर करें तो दिल्ली में हुए पिछले कई धमाकों की जांच भी अभी चल ही रही है। यही नहीं दिल्ली पुलिस गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के संसद में दिये गये उस बयान के बाद भी सवालों के घेरे में है, जिसमें गृहमंत्री ने कहा कि उसे खुफिया सूचना दी गयी थी। लेकिन पुलिस का कहना है कि यह सूचना 15 अगस्त के लिए थी। दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना ने भी कहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से आतंकवादी हमले को लेकर खास खुफिया जानकारियां साझा नहीं की गई थीं। अब सवाल उठता है कि कौन सही बोल रहा है चिदम्बरम या फिर दिल्ली पुलिस और उपराज्यपाल? यह बात भी दिल्ली पुलिस के लिए यह शर्मनाक ही है कि धमाके की जांच एनआईए को सौंपी गयी। यह पहला ऐसा मामला है जिसकी जांच पहले ही दिन से एनआईए को सौंपी गयी। यह दर्शाता है कि शायद केंद्र सरकार को भी दिल्ली पुलिस की कार्यक्षमता पर संदेह नजर आ रहा है। हालांकि एनआईए का भी अब तक का कार्यकाल कोई उल्लेखनीय नहीं रहा है और कथित भगवा आतंकवाद के मामलों को छोड़कर वह देश में हुए विभिन्न आतंकवादी धमाकों के मामले में जांच ही कर रही है।

आतंकवादी हमलों के बाद खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं और अब भी उठ रहे हैं। इस कार्य में लगी सभी एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय बढ़ाने और श्रेय लेने की होड़ को खत्म करने की जरूरत है। इन एजेंसियों की ओर से अपना दायरा बढ़ाने की भी तत्काल जरूरत है। आरोप लगते रहे हैं कि इन खुफिया एजेंसियों का सत्तारुढ़ दल विपक्षियों पर नजर रखने में उपयोग करते रहे हैं, यदि यह सही है तो यह चलन खत्म किया जाना चाहिए और उन्हें वही काम करने देना चाहिए जिसके लिए उनकी स्थापना हुई है।

दूसरी ओर गृहमंत्री पी. चिदम्बरम हर माह के आखिर में भले अपने मंत्रालय के कामकाज का ब्यौरा प्रस्तुत कर अन्य मंत्रियों की अपेक्षा ज्यादा पारदर्शी लगते हों लेकिन उनके कार्यकाल में पुणे, मडगांव, वाराणसी, मुंबई और दिल्ली में हुए धमाके (यहां उत्तर पूर्व में हुए कुछ धमाकों का उल्लेख नहीं है क्योंकि उनकी गूंज शायद सरकार के कानों में पड़ती ही नहीं है), उनके इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं कि ‘आतंकवाद से निपटने के लिए कड़े कदम उठाये गये हैं’। चिदंबरम को चाहिए कि वह गृहमंत्री के रूप में अपनी सारी ऊर्जा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर ही नहीं खर्च करें। उन्होंने विस्फोट के बाद संसद में जो बयान दिया उसमें भी कोई नयी बात नहीं थी। उन्होंने घटना की जो जानकारी दी वह टीवी चैनलों पर पहले से दिखायी जा रही थी, उन्होंने कहा कि दिल्ली आतंकवाद के निशाने पर है, यह बात सभी जानते हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, यह रटारटाया बयान है। संतोष इस बात का है कि उन्होंने मुंबई में हुए धमाकों के बाद दिल्ली में वह बयान नहीं दोहराया कि हम इतने समय तक शहर को विस्फोटों से बचाये रखने में सफल रहे।

जिस आतंकी संगठन हूजी ने दिल्ली में धमाके की जिम्मेदारी ली है उसकी ओर से कथित रूप से यह कहा गया है कि उसने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की रिहाई की मांग के लिये यह कदम उठाया है। यदि यह सही है तो इससे सरकार को चेतना चाहिए कि अफजल और कसाब जैसे कुख्यात आतंकवादियों को और पालना देश के लिए घातक हो सकता है। आतंकवादी अपने साथियों को छुड़ाने के लिए फिर कोई कंधार कांड या विस्फोटों को अंजाम दे सकते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर विस्फोट कर आतंकवादियों ने अदालतों को भी यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह आतंकी मामलों के दौरान फैसले सुनाते समय उनका भय ध्यान में रखें। लेकिन भारत की न्यायपालिका को वह शायद जानते नहीं जोकि निर्भय तथा बिना किसी दबाव में आकर पूरी निष्पक्षता के साथ फैसले सुनाती है।

यह आंकड़ा चौंकाने के साथ दुखद भी है कि पिछले छह वर्षों में आतंकवादियों ने दिल्ली को पांच बार निशाना बनाया, जबकि देश की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई को 1993 के बाद से 14 बार निशाना बनाया गया है। सरकार को चाहिए कि आगे ऐसी घटनाएं न दोहरायी जा सकें इसके लिए सुरक्षा और खुफिया तंत्र को मजबूत करने के साथ ही अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति को भी दृढ़ बनाये और एक कड़ा आतंकवाद निरोधक कानून बनाकर इसके लिए विशेष अदालतें स्थापित करे। सरकार को इस पर भी गौर करना चाहिए कि जहां आतंकवादी तकनीक के मामले में हमसे आगे निकलते जा रहे हैं वहीं हम विभिन्न विभागों को सीसीटीवी कैमरा स्थापित करने के लिए पत्र लिखने में ही व्यस्त हैं।

जय हिंद, जय हिंदी

नीरज कुमार दुबे

Monday, 5 September 2011

आतंकवादियों को नहीं देश को बचाइये


आतंकवाद के ‘रंग’ को लेकर हुई सियासत के बाद अब आतंकवादियों को सुनाई गयी सजा को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है। यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है जिसमें कि जनभावनाओं का हवाला देते हुए उन आतंकवादियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है जिनकी मौत की सजा पर न सिर्फ उच्चतम न्यायालय अपनी मुहर लगा चुका है बल्कि राष्ट्रपति भी उनकी दया याचिका खारिज कर चुकी हैं।

तमिलनाडु विधानसभा की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी नहीं देने का सर्वसम्मति से पास किया गया प्रस्ताव भानुमति का पिटारा खोल देने जैसा है। राज्य विधानसभा के इस कदम के बाद विभिन्न राज्यों में पार्टियां अपने चुनावी फायदे को देखते हुए ऐसे ही खतरनाक खेल खेल सकती हैं। इसकी शुरुआत हो भी गयी है। तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि यदि जम्मू-कश्मीर विधानसभा अफजल गुरु को माफी के संबंध में प्रस्ताव पास करती तो क्या प्रतिक्रिया होती? इससे पहले देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को माफी दिलाने के लिए पंजाब के सभी पार्टियों के नेता एक हो ही चुके हैं।

गौरतलब है कि देश में कई ऐसे मुजरिम या आतंकवादी हैं जिन्हें मौत की सजा सुनाई गयी है। अब जो सिलसिला शुरू हुआ है उससे संभव है कि जिस जिस की सजा की तारीख नजदीक आती जायेगी उसके पक्ष में अपना चुनावी नफा नुकसान देख राजनीतिक पार्टियां उसके पक्ष में खड़ी होती रहेंगी। तमिलनाडु विधानसभा द्वारा शुरू किया गया यह सिलसिला चल निकला तो यकीनन आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश देने के हमारे प्रयासों को क्षति ही पहुंचेगी।
आखिर यह राजनीति नहीं तो और क्या है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा के मामले पर पहले तो कहा कि राष्ट्रपति के आदेश में संशोधन करने का उनके पास कोई अधिकार नहीं है लेकिन जब उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि ने राजीव के हत्यारों की मौत की सजा को रद्द करने की वकालत करते हुए कहा कि यदि उन्हें छोड़ दिया जाता है तो तमिल लोग खुश होंगे तो जयललिता ने एकाएक पैंतरा बदल लिया और अगले ही दिन विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करा दिया जिसमें दोषियों की फांसी की सजा को माफ करने का आग्रह किया गया। यही नहीं राज्य के कई अन्य पार्टियों के नेता भी इस मामले से संभावित चुनावी लाभ का आकलन करते हुए मैदान में कूद पड़े। वाइको तो अदालत पहुंच गये और वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी के तर्कों की बदौलत दोषियों की सजा को आठ सप्ताह तक टलवाने में सफल भी रहे। श्रीलंका के भी कुछ सांसदों ने भारत के राष्ट्रपति और अन्य नेताओं को पत्र लिखकर राजीव के हत्यारों को फांसी नहीं देने की मांग कर डाली। अब तो कांग्रेस के कुछ नेता भी इसी धारा के साथ चलना लाभप्रद मान रहे हैं। मणिशंकर अय्य्ार का कहना है कि तीनों दोषियों को फांसी नहीं देनी चाहिए और उन्हें शेष जीवन जेल में बिताने देना चाहिए। यह दोहरा रवैया नहीं तो और क्या है कि एक ओर जहां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का मत है कि कानूनी प्रक्रिया को अपना काम करने देना चाहिए वहीं राज्य स्तर पर उसके नेताओं को कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप से कोई गुरेज नहीं है। यहां दोष सिर्फ एक दल का नहीं बल्कि सभी पार्टियों का है क्योंकि हर कोई राजीव के हत्यारों को फांसी में अपना चुनावी नुकसान देख रहा है।

दूसरी ओर बात जम्मू-कश्मीर की करें तो यकीनन यह एक संवेदनशील राज्य है। यह बात जब सभी को पता है तो निश्चित रूप से वहां के मुख्यमंत्री इससे अनजान नहीं होंगे। लेकिन उनके हालिया बयान पर गौर किया जाये तो कुछ सवाल उठ खड़े होते हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु के संबंध में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि क्या हो जब राज्य विधानसभा अफजल को माफी के संबंध में प्रस्ताव पास करे? अपनी इस टिप्पणी पर उन्हें सिर्फ अपने पिता के अलावा किसी अन्य राष्ट्रीय स्तर के नेता का समर्थन नहीं मिला तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन उमर की टिप्पणी ने राजनीतिक गुल खिलाना तो शुरू कर ही दिया है और यह शायद उनकी टिप्पणी का ही कमाल है कि एक निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल रशीद ने राज्य विधानसभा को एक प्रस्ताव सौंपा है जिसमें मानवीय आधार पर अफजल के लिए क्षमादान की मांग की गयी है। मान लीजिये यदि 26 सितंबर से शुरू होने वाले विधानसभा के सत्र में यह प्रस्ताव पास भले न हो लेकिन यदि इस पर सिर्फ चर्चा ही हो जाये तो क्या यह उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति के आदेशों की अवमानना नहीं होगी और क्या इससे बहुत मुश्किल से शांत हुए राज्य में फिर से हालात बिगड़ सकने की संभावनाएं प्रबल नहीं होंगी? भारतीय लोकतंत्र के प्रतीक संसद पर हमले के दोषी के लिए यदि माफी की मांग की जा रही है तो कल को कोई अजमल कसाब के लिए भी माफी की अपील कर सकता है और चुनावी लाभ की संभावना देखते हुए कोई विधानसभा में इस मुद्दे पर भी प्रस्ताव ला सकता है। यह बात वाकई समझ से परे है कि कुछ समय पूर्व तक अलगाववादियों के खिलाफ कड़ा रुख रखने वाले उमर के सुर अब उन (हुर्रियत नेताओं) जैसे क्यों होते जा रहे हैं।

तीसरी स्थिति पंजाब की है जोकि बड़ी मुश्किल से आतंकवाद के साये से बाहर निकला था। वहां के नेताओं को चाहिए कि वह इस मुद्दे पर अपना रुख लगातार कड़ा बनाये रखें लेकिन हो इसका उलटा रहा है। फांसी की सजा सुनाये गये देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को माफी देने के पक्ष में जब पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह खड़े हुए तो मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी होने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर भुल्लर को माफी देने की मांग कर डाली। हाल के घटनाक्रमों के बाद संभव है कि किसी कट्टरपंथी धड़े से जुड़ा कोई विधायक भुल्लर की माफी के लिए भी प्रस्ताव पेश कर दे। पंजाब में विधानसभा चुनाव निकट हैं इसलिए कोई भी दल नहीं चाहेगा कि वह कथित जनभावनाओं के विपरीत जाये या फिर उसे किसी वर्ग का विरोध झेलना पड़े।

इन सभी घटनाक्रमों पर गौर के बाद यहां सवाल यह खड़ा होता है कि आतंकवादियों को माफी के लिए जिन जनभावनाओं का हवाला दिया जा रहा है उसका कथित आंकड़ा राजनीतिक दलों के पास कहां से आया? क्या कोई सर्वेक्षण कराया गया है अथवा कोई जनमत संग्रह? जनता हमेशा से आतंकवादियों और अपराधियों के साथ कड़ाई से निबटने की प्रबल पक्षधर रही है, यह सिर्फ राजनीतिक दल ही हैं जो अपने लाभ के लिये जनभावनाओं का झूठा हवाला देते रहे हैं। जनता को चाहिए कि वह राजनीतिक दलों की ओर से कथित जनभावनाओं की आड़ लेकर राजनीतिक रोटियां सेंके जाने पर सवाल उठाये और अपना मत भी बेहिचक उजागर करे। देश के न्यायालयों की ओर से सुनाये गये फैसलों का पालन कराना भले प्रशासन की जिम्मेदारी हो लेकिन इन फैसलों के साथ खड़े होना जनता का भी कर्तव्य है।

बहरहाल, जहां तक बात मौत की सजा के नैतिक पक्ष की है तो यह सही है कि दुनिया भर में इसका प्रचलन कम हो रहा है और मीडिया रिपोर्टों के आंकड़ों के मुताबिक 139 देश फांसी की सजा को हटा चुके हैं। अपने देश में भी फांसी की सजा को खत्म करने की बहस वर्षों से चल रही है लेकिन किसी तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंच पायी है। जब तक इस मामले में कोई एकराय नहीं बन जाती तब तक जघन्य अपराधों, कांडों में शामिल लोगों की सजा पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे सिर्फ आतंकवादियों और अपराधियों का हौसला ही बुलंद होगा क्योंकि उन्हें पता है कि पहले तो मुकदमा वर्षों तक चलेगा और जब सजा सुना भी दी जायेगी तो राजनीतिक कारणों से इसमें विलंब होता रहेगा।

जय हिंद, जय हिंदी

नीरज कुमार दुबे