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Tuesday, 8 December 2009

हेडली पर आरोप तय होना बड़ी कामयाबी


अमेरिकी अदालत द्वारा पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक और लश्कर-ए-तैयबा के संदिग्ध आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली के खिलाफ मुंबई हमलों की साजिश में शामिल होने का आरोप तय करना भारत के लिए एक बड़ी कामयाबी है। इसके अलावा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत को पहली बार अमेरिका से सही मदद मिलती दिख रही है क्योंकि हेडली-राणा मामले में चल रही जांच के नतीजे साझा करने के लिए एफबीआई का एक दल भारत आया हुआ है। यह भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान उनके समक्ष जताई गई मामले में करीबी सहयोग करने की राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रतिबध्दता दर्शाता है। गौरतलब है कि ओबामा ने वादा किया था कि एफबीआई की जांच के नतीजों को साझा करने में अमेरिका पूरा समर्थन देगा।

मुंबई हमला मामले में पाकिस्तान की अदालतों ने तो एक साल बाद भी अनमना सा रवैया अपनाया हुआ है जबकि अमेरिकी अदालत ने अक्तूबर में गिरफ्तार किए गए हेडली पर आरोप भी तय कर दिए हैं। सोमवार को शिकागो की एक अदालत ने हेडली पर मुम्बई हमलों की साजिश में शामिल होने और उसके तथा लश्कर एवं हरकत-उल-जेहाद इस्लामी (हूजी) के बीच सम्पर्क स्थापित करवाने वाले पाकिस्तानी सेना के मेजर से सम्बन्ध रखने का आरोप तय किया। शिकागो में फेडरल कोर्ट में दायर आरोपपत्र में कहा गया कि हेडली ने मुम्बई में हमलों से पहले दो साल से ज्यादा वक्त तक अपने लक्ष्यों की सघन रेकी की थी। उसने सितम्बर 2006, फरवरी तथा सितम्बर 2007, अप्रैल एवं जुलाई 2008 में मुम्बई की पांच बार यात्रा की थी। इस दौरान उसने हमलों का निशाना बनाए जाने वाले लक्ष्यों की फोटो और वीडियो तस्वीरें ली थीं। हेडली के खिलाफ आपराधिक सूचना, भारत में सार्वजनिक स्थानों पर बम विस्फोट करने की योजना बनाने, भारत तथा डेनमार्क में लोगों की हत्या करने और हड़कंप मचाने, विदेशी आतंकवादी साजिशों में साजोसामान संबंधी सहयोग करने, लश्कर-ए-तैयबा को भी ऐसी ही मदद करने तथा भारत में अमेरिकी नागरिकों की हत्या करने के आरोप तय किए गए हैं। इलिनाय के अमेरिकी अटार्नी पैट्रिक जे। फिट्जगेराल्ड और फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआई) के शिकागो कार्यालय के स्पेशल एजेंट इंचार्ज ने आरोपों की घोषणा की।

हेडली और उसके एक अन्य सहयोगी तहव्वुर हुसैन राणा को लश्कर की शह पर भारत में हमले करने और डेनमार्क के एक अखबार को निशाना बनाने की साजिश रचने के आरोप में अक्तूबर में एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया था। मेजर रहमान का नाम पहले इस मामले में शामिल नहीं था लेकिन राणा और हेडली के खिलाफ आरोपों की शुरुआती जांच में रहमान का नाम भी सामने आया। रहमान ने हेडली तथा उससे जुड़े अन्य लोगों के बीच बातचीत करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। हेडली पर लगाए गए आरोपों के मुताबिक उसने 15 फरवरी 2006 को फिलाडेल्फिया में अपना नाम दाउद गिलानी से बदलकर डेविड कोलमैन हेडली रख लिया था। उसने ऐसा इसलिए किया ताकि भारत में घुसने में आसानी हो और इस प्रयास में वह न तो मुस्लिम और न ही पाकिस्तानी नागरिक लगे। आरोप के मुताबिक सितम्बर 2006 से जुलाई 2008 के बीच हेडली ने जितनी बार भारत की यात्रा की, वह लौटकर पाकिस्तान ही गया और वहां अपने सह-षडयंत्रकारियों से मिलकर उन्हें हमलों का निशाना बनाए जाने वाले स्थानों के फोटो और वीडियो दिखाए। आरोपों में कहा गया है कि मार्च 2008 में हेडली और उनके सह-षडयंत्रकारियों ने हमलावरों के दल के मुम्बई में समुद्र के रास्ते दाखिल होने के सम्भावित स्थलों के बारे में बातचीत की थी। हेडली को निर्देश दिए गए थे कि वह मुम्बई में बंदरगाह के अंदर और उसके आसपास नौकाएं लाए तथा वह सर्विलांस वीडियो अपने साथ रखे जो उसने अप्रैल 2008 में भारत यात्रा के दौरान बनाया था।

बहरहाल, आरोप तय होने के बाद अब उम्मीद है कि अमेरिकी अदालत जल्द से जल्द इस मामले की सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुनाएगी। अमेरिका इस संबंध में भारत को जो सूचनाएं मुहैया करा रहा है, उस पर मीडिया की खबरों के अनुसार भारतीय सुरक्षा एजेंसियां त्वरित कदम उठा रही हैं। दोनों देशों के बीच जारी इस सहयोग ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत किया है। आपसी विश्वास को बढ़ाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। एफबीआई प्रमुख राबर्ट एस मुलर का यह कहना कि एफबीआई अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से साझीदारी बढ़ाने की दिशा में काम जारी रखेगी, बहुत सकारात्मक बयान है इससे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों के नेटवर्क का पता लगाने और उनसे निपटने में आसानी होगी। हेडली का मामला आतंकवाद से लड़ाई में वैश्विक सहयोग की जरूरत दर्शाता है, इस बात को ध्यान में रख कर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को तेज किया जाना चाहिए।

भारत माता की जय

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 26 November 2009

26/11: एक वर्ष बाद भी जख्म हैं ताजा

मुंबई पर आतंकवादी हमले को हुए आज एक वर्ष भले हो गया हो लेकिन उस दौरान जो जख्म मिले वह अब तक भरे नहीं हैं। क्योंकि इस हमले के मुख्य षडयंत्रकर्ता अभी भी कानूनी पकड़ से दूर सीमा पार बैठे हैं। यही नहीं जैसा कि प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों कहा, उन्हें मिल रही खुफिया सूचनाओं के मुताबिक पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन भारत पर 26/11 जैसे हमले की साजिश रच रहे हैं। वह तो भला हो एफबीआई का जिसने भारत पर से एक बड़ा खतरा तब टाल दिया जब उसने डेविड कोलमन हेडली और तहाव्वुर हसन राणा को गिरफ्तार कर खुलासा किया कि यह दोनों लश्कर-ए-तैयबा के निर्देश पर भारत और डेनमार्क में आतंकवादी हमले करने की साजिश रच रहे थे। हेडली और राणा से पूछताछ से जो खुलासे हुए हैं उन्होंने कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये हैं। सवाल यह है कि हमारा खुफिया तंत्र मुंबई हमले के बाद एक बार फिर क्यों विफल रहा जब वह हेडली और राणा के भारत दौरे के उद्देश्यों को नहीं जान पाया।

26/11 और उससे पहले जयपुर, अहमदाबाद, दिल्ली, असम आदि राज्यों में जो बम विस्फोटों की घटनाएं हुईं, उसने केन्द्रीय गृहमंत्री के कामकाज पर सवालिया निशान लगाया तो शिवराज पाटिल की इस पद से विदाई हुई और उसके बाद पी। चिदंबरम इस पद पर आए। यह सही है कि चिदंबरम ने एक प्रोफेशनल की भांति अपने मंत्रालय पर ध्यान दिया और देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। चिदंबरम की पहलों का भी इसमें योगदान कहा जाएगा कि 26/11 के बाद देश पर कोई आतंकी हमला नहीं हुआ लेकिन चिदंबरम लगता है कि सिर्फ आतंकवाद पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए हुए हैं देश में पनप रहे नक्सलवाद/माओवाद के प्रति उनके बयानों में ही गंभीरता दिखती है। कभी तो वह इनके खिलाफ कार्रवाई की बात कहते हैं तो कभी बयान देते हैं कि केन्द्र उनके खिलाफ कोई अभियान नहीं चला रहा। आतंकवाद या किसी ऐसी ही अन्य बुराई से लड़ने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है इसमें राजनीति नहीं आड़े आने देनी चाहिए।

समय आ गया है जब आतंकवाद के खिलाफ बयान और साझा घोषणापत्र जारी करने से आगे बढ़ा जाए। वैसे आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना सिर्फ सरकार का ही काम नहीं है, इस पर यदि विजय पानी है तो हम सभी को अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहना चाहिए। आइए आज सबसे पहले उन निर्दोष लोगों की आत्माओं की शांति के लिए प्रभु से प्रार्थना करें जिन्होंने मुंबई हमले के दौरान अपनी जान गंवाई। साथ ही हम यह भी प्रण्ा लें कि आतंकवाद के खिलाफ हम सभी एक रहेंगे, इसमें कोई राजनीति आड़े नहीं आने दी जाएगी, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हमारे बीच कोई मतभेद नहीं रहेगा, जब कभी देश पर बुरी नजर उठाने की कोशिश की गई तो सुरक्षा बलों समेत आम जन उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे। भारत माता की जय।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 7 August 2009

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी सफलता


अमेरिकी ड्रोन के मिसाइल हमले में पाकिस्तान के सर्वाधिक वांछित आतंकवादी बैतुल्ला महसूद का मारा जाना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में बड़ी जीत है। महसूद के मारे जाने से पाक तालिबान तालिबान सदस्य अपनी गतिविधियों को स्थगित करने पर मजबूर होंगे। यह जीत मुख्य रूप से अमेरिका की है और उसने अपने उस रुख को सही साबित किया है जिसमें उसने पाक के कबायली क्षेत्रों में आतंकवाद के खिलाफ अभियान की कमान पाक के हाथों में देने से मना कर दिया था।

बैतुल्ला का मारा जाना कितनी बड़ी कामयाबी है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि अमेरिका ने उस पर 50 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम रख रखा था। पाकिस्तान सरकार ने भी महसूद के मारे जाने पर 615000 डॉलर के इनाम की घोषणा की थी। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या और पाकिस्तान भर में कई आत्मघाती हमलों की साजिश रचने के आरोपी तहरीक-ए-तालिबान प्रमुख महसूद की मौत से राहत भले पाकिस्तान और अमेरिका को मिली हो लेकिन आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में यह घटना मील का पत्थर है।

दूसरी ओर भारत में मुंबई महानगर में छह साल पहले गेटवे आफ इंडिया तथा जावेरी बाजार में दो विस्फोट करने के आरोप में एक दंपत्ति सहित लश्कर-ए-तैयबा के तीन सदस्यों को मौत की सजा सुनाया जाना भी सराहनीय कदम है। गौरतलब है कि इन विस्फोटों में 52 लोग मारे गए और 244 अन्य घायल हुए थे। अदालत का यह फैसला आतंकवाद में शामिल लोगों के लिए एक संदेश है कि यदि वे बर्बर काम करेंगे तो कानून उन्हें नहीं बख्शेगा।

इस बीच, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की पुलिस ने भी आतंकवाद के खिलाफ एक सफलता हासिल करते हुए हिज्बुल मुजाहिदीन के दो आतंकवादियों को पकड़ा है जोकि पुलिस के अनुसार पाकिस्तान में प्रशिक्षित कर यहां हमले करने के लिए भेजे गये थे। पुलिस के अनुसार, इन दोनों ने स्वीकार किया है कि इनके तार पाकिस्तान स्थित आतंकवादी गुटों से जुड़े हुए हैं।

आतंकवाद के खिलाफ यह सभी सफलताएं दर्शाती हैं कि लड़ाई बिल्कुल सही दिशा में नहीं तो कमोबेश सही दिशा की ओर बढ़ती हुई लग रही है। आतंकवाद के खिलाफ हो रहे वैश्विक प्रयासों के लिए बधाई। आतंकवाद रूपी राक्षस का खात्मा करके ही कलयुग से सतयुग में प्रवेश किया जा सकता है लेकिन इसके लिए जबरदस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

नीरज कुमार दुबे

Monday, 13 July 2009

भारत के लिए तालिबान-से बनते जा रहे हैं नक्सली


देश के कुछ भागों में नक्सली जिस तरह से तांडव मचा रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई में जिस तरह सरकार लाचार नजर आ रही है उससे यही लग रहा है वह दिन जल्द आ सकता है जब देश के सामने वैसी ही स्थिति होगी जैसी कि तालिबान ने पाकिस्तान में कर रखी है। नक्सलियों को भारत के तालिबान और भारत के तालिबान को 'जालिमान' कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि दोनों ने कत्लेआम मचाया हुआ है। भले ही इसके पीछे उनके जो भी तर्क हों लेकिन हिंसा के आगे वह सभी खारिज हो जाते हैं। नक्सलियों ने हालिया वारदात छत्ताीसगढ़ में की। वहां के राजनांदगांव जिले में नक्सलियों ने पुलिस अधीक्षक समेत 30 जवानों की हत्या कर एक बार फिर राज्य में अपनी मजबूत स्थिति का अहसास कराया। नक्सलियों ने अब तक के सबसे बड़े हमले में पहली बार किसी पुलिस अधीक्षक की हत्या की है। वहीं राज्य में नक्सलियों ने पिछले साढ़े चार सालों में लगभग 1300 लोगों की हत्या की है जिसमें पुलिसकर्मी, विशेष पुलिस अधिकारी और आम नागरिक शामिल हैं। छत्ताीसगढ़ के वन्य क्षेत्रों में करीब तीन दशक पहले शुरू हुआ नक्सलियों का आंदोलन आज इस राज्य के लिए नासूर बन गया है। नक्सलियों के लगातार बढ़ते हमले और इसमें मरने वाले पुलिस जवानों और आम आदमी की संख्या से राज्य में नक्सल समस्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। राज्य में पिछले साढ़े चार सालों में नक्सलियों ने जमकर उत्पात मचाया है और इस समस्या के कारण 1296 पुलिसकर्मियों, विशेष पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों की मृत्यु हुई है। इस आंकड़े में मारे गए गोपनीय सैनिक या सरकारी कर्मचारी शामिल नहीं हैं।

इससे पहले माओवादियों और नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल के लालगढ़ पर कब्जा कर एक तरह से प्रशासन को चुनौती दी थी। वहां मामला चूंकि राजनीति से जुड़ा था इसलिए इस पर फौरी कार्रवाई हुई। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वाममोर्चा को घेरने के लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते इसलिए जब राज्य सरकार ने इस मामले में ढिलाई बरती तो केंद्र ने सख्ती दिखाई और उसके आदेश पर राज्य सरकार को माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई को विवश होना ही पड़ा। आखिरकार सुरक्षाबलों ने लालगढ़ को मुक्त करा लिया। इसके अलावा लोकसभा चुनावों के दौरान झारखंड, आंध्र प्रदेश, छत्ताीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार में नक्सलियों ने खूब कहर बरपाया। चुनावों के दौरान जो हिंसा कभी बूथ लुटेरे करते थे वह अब नक्सली करने लगे हैं।

कई बार खबरों में यह देखने-सुनने को मिलता रहा है कि नक्सलियों के साथ नेताओं के संबंध हैं और उनका राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया जाता रहा है। ऐसे में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के परिणामों को लेकर संशय होना लाजिमी है। नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर केंद्रीय स्तर पर रणनीति बनाई जानी चाहिए जिसमें नक्सल प्रभावित राज्यों को विश्वास में लेकर संयुक्त कार्रवाई की जाए तो परिणाम अच्छे निकल सकते हैं। लेकिन देखना यह है कि सरकार इस समस्या की ओर गंभीर कब होती है?

बहरहाल, छत्ताीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हुए सभी पुलिसकर्मियों को श्रध्दांजलि अर्पित करते हुए भगवान से कामना करता हूं कि उनके परिजनों को इतना बल प्रदान करे कि वह इस अपार दु:ख को सहन कर सकें और उनके जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आए।

नीरज कुमार दुबे

Friday, 1 May 2009

चलो माना तो सही, लेकिन अब कुछ करोगे भी क्या?


आखिरकार अमेरिका ने आज मान ही लिया कि भारत विश्व के सर्वाधिक आतंकवाद प्रभावित देशों में से एक है। हालांकि इसके साथ ही अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अभियान की धीमी प्रक्रिया पर भी चिंता जताई है और यह भी कहा है कि भारत में हुए आतंकी हमले और ऐसी ही अन्य घटनाएं बताती हैं कि आतंकी चंदे की मोटी राशि मिलने के कारण आर्थिक रूप से काफी समृध्द हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक 'कंट्री रिपोर्ट्स आन टेरेरिज्म-2008' में कहा गया है मुंबई और देश भर में हुए ऐसे ही हमले बताते हैं कि आतंकियों को चंदे में मोटी रकम मिल रही है और वे आर्थिक रूप से बहुत समृध्द हैं। रिपोर्ट में 26/11 के मुंबई हमलों के अलावा 2008 में देश में हुए अन्य प्रमुख हमलों का भी उल्लेख है जिनमें जयपुर विस्फोट, काबुल में भारतीय दूतावास के अलावा अहमदाबाद, दिल्ली और असम के विस्फोट भी शामिल हैं। मुंबई हमलों पर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अधिकारियों का मानना है कि आतंकियों ने क्रेडिट कार्ड्स के अलावा हवाला और दान से मिले पैसे समेत कई स्रोतों का उपयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मानना है कि हमलों का उद्देश्य भारत पाक के संबंधों को बिगाड़ना, देश में हिंदू मुस्लिम हिंसा को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था को बिगाड़ना है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत का मानना है कि देश में बड़े आतंकी हमलों के पीछे लश्कर-ए-तैय्यबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (बांग्लादेश) जैसे इस्लामिक चरमपंथी संगठनों का हाथ है। वहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आतंकवादी आधुनिक तकनीक से भी भरपूर परिचित हैं। मुंबई हमलों को देश के सबसे खतरनाक हमले की उपमा देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में स्थानीय और प्रदेश की पुलिस प्रशिक्षण्ा के मामले में बहुत कमजोर है और सभी के बीच समन्वय की भारी कमी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि भारत ने बाहर से आने वाले यात्रियों की जानकारी पाने के लिए विकसित यात्री सूचना प्रणाली लागू कर दी है लेकिन यह अमेरिका और यूरोपियन संघ की प्रणाली से जानकारी बांटने के अनुरूप नहीं है।

बहरहाल, अब जब अमेरिका ने यह मान लिया है तो उसे चाहिए कि वह आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को और धारदार बनाने के लिए अपना सहयोग प्रदान करे लेकिन उसका यह सहयोग निस्वार्थ होना चाहिए लेकिन अमेरिका से ऐसी अपेक्षा करना बेकार है। लेकिन उसने बीच चुनावों में विपक्ष के हाथ बड़ा मुद्दा तो थमा ही दिया है जोकि आतंकवाद के मुद्दे पर संप्रग सरकार को पहले ही घेरे हुए है।
नोट:- यह पूरी रिपोर्ट आप निम्न लिंक पर जाकर डाउनलोड़ कर सकते हैं- http://www.scribd.com/doc/11536774/Country-Reports-on-Terrorism-Report-२००८

नीरज कुमार दुबे

Thursday, 26 March 2009

आईएसआई-तालिबान गठजोड़ की बात फिर सामने आई

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की पोल खोलती एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआई के लोग तालिबान को लगातार मदद पहुंचा रहे हैं और वर्ष 2008 में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले में आईएसआई के एजेंटों का हाथ होने के सुबूत मिलने के बाद से हालात में मामूली सा बदलाव आया है। आज के न्यूयार्क टाइम्स ने अमेरिकी सरकार के अधिकारियों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कुछ लोग दक्षिणी अफगानिस्तान में तालिबान की मुहिम को सीधे मदद मुहैया करा रहे हैं जबकि सरकारी दावा है कि आईएसआई ने चरमपंथियों से संबंध तोड़ लिए है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह की पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा था कि आईएसआई तालिबान को मदद नहीं पहुंचा रही है जबकि इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय सेना से मुकाबले के लिए आईएसआई के सहयोग में तालिबान कमांडरों को धन मुहैया कराना, सैन्य आपूर्ति और सामरिक योजना के लिए मार्गदर्शन शामिल है। अखबार ने अधिकारियों के हवाले से कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लोग तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों के सहयोग और समर्थन की व्यवस्था का समन्वय कर रहे हैं।

एक और अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जरनल ने भी अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा है कि भरोसेमंद मुखबिरों और खास इलेक्ट्रानिक उपकरणों के जरिए तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के बीच गठजोड़ पकड़ में आया है। इसमें कहा गया है कि जलालुद्दीन हक्कानी के गुट ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर बीते साल बमबारी की थी। हमले में 54 लोग मारे गए थे। इसमें कहा गया है कि इस बात के भी सबूत हैं कि आईएसआई के लोग नियमित रूप से तालिबान कमांडरों से मुलाकात करते हैं और अफगानिस्तान में होने वाले चुनावों से पहले हिंसा का स्तर बढ़ाने या हिंसा बंद करने के बारे में विचार-विमर्श करते हैं। न्यूयार्क टाइम्स की यह रिपोर्ट आईएसआई के आला अधिकारियों के उस दावे के ठीक विपरीत है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि गुप्तचर एजेंसी ने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों से संबंध तोड़ लिए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने माना है कि उन्हें आईएसआई और तालिबान लड़ाकों की निष्ठा को समझने में दिक्कत आ रही है।

लेकिन न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक पाकिस्तान का कहना है कि अमेरिकी अधिकारी जितना खतरा समझ रहे हैं दरअसल उतना खतरा है नहीं। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का कहना है खुफिया तंत्र में आपको अपने शत्रु के भी संपर्क में रहना पड़ता है वरना आप अंधेरे में तीर चला रहे होते हैं। न्यूयार्क टाइम्स ने पाकिस्तान के जिन अधिकारियों का साक्षात्कार किया उन्होंने कहा कि उन्हें तालिबान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के बीच संबंध की जानकारी है हालांकि वह इस बात से इंकार करते हैं कि समझौते से आतंकवाद मजबूत हो रहा है। अखबार का कहना है कि काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले के संबंध में अमेरिकी सबूतों के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने बीते साल प्रतिज्ञा ली थी कि आईएसआई से निपटा जाएगा और आतंकवादियों के साथ काम करने वालों को बर्खास्त कर दिया जाएगा। पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जरदारी सरकार का भविष्य अनिश्चित है इसलिए आईएसआई पर लगाम की बात तो वह फिलहाल सोच भी नहीं सकते।

एक बात और वह यह कि आईएसआई पर भरोसा करने के कितने भी बयान किसी की भी ओर से आ जाएं लेकिन वह भरोसा करने लायक संगठन है ही नहीं क्योंकि उसकी बुनियाद ही भारत विरोध पर रखी गई है।

नीरज कुमार दुबे

Tuesday, 3 March 2009

पाक को आतंकवादी देश घोषित किया जाए


लाहौर में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर दुस्साह हमला वाकई दिल दहला देने वाला है। पाकिस्तान से संचालित आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा है यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। इस हमले ने एक बात को और स्पष्ट किया है कि पाक सरकार का देश की कानून व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं रह गया है और आतंकी जो चाहे कर सकते हैं इसलिए आतंकवादी ढांचों को नष्ट करने की दिशा में कदम उठाना खुद पाकिस्तान के हित में है। अभी कल ही अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स का बयान आया था कि तमाम आतंकवादी संगठनों के लिए पाकिस्तान सुरक्षित पनाहगाह है और आज यह हमला हो गया। यह हमला उस खतरे की घातकता को रेखांकित करता है जो पाकिस्तान केंद्रित आतंकवाद से उपज रहा है। भारत हमेशा से ही पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचों को ध्वस्त करने पर जोर दे रहा है और इस हमले ने एक बार फिर ऐसा करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

अब समय आ गया है जब दुनिया को भारत की चिंताओं को समझना चाहिए। यह घटना पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के लिए विश्व समुदाय को विवश करेगी। यह केवल क्रिकेट पर हमला नहीं है बल्कि शांति चाहने वाले विश्व बंधुत्व पर भी हमला है।

वैसे श्रीलंका अगर भारत के पाक दौरा रद्द करने के बाद उसकी जगह खेलने के लिए राजी नहीं होता तो उसके क्रिकेटर आतंकवादी हमले से बच सकते थे। गौरतलब है कि टीम आज जब मेजबान के खिलाफ दूसरे क्रिकेट टेस्ट के तीसरे दिन के खेल के लिए गद्दाफी स्टेडियम जा रही थी तो टीम बस पर हुए आतंकी हमले में उसके छह क्रिकेटर जख्मी हो गये। श्रीलंका अगर जल्दबाजी में आयोजित की गई श्रृंखला में खेलने के लिए राजी नहीं होता तो यह त्रासदी टल सकती थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक भारत को जनवरी-फरवरी में पाकिस्तान का दौरा करना था लेकिन मुंबई में 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले के बाद इस दौरे को रद्द कर दिया गया। भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से महेंद्र सिंह धोनी की टीम को सरहद पार जाने की इजाजत नहीं दी थी। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसी टीमों के पहले दौरे पर आने से इंकार करने के बाद घर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से महरूम पाकिस्तान भारत का विकल्प ढूंढने के लिए बेताब था।

तत्कालीन अध्यक्ष अर्जुन रणतुंगा की अगुआई में श्रीलंका क्रिकेट ने पाकिस्तान की मदद के लिए हाथ बढ़ाया और टीम दो चरण का दौरा करने पर राजी हुई जो अब आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया है। श्रीलंका ने जनवरी में पाकिस्तान में वनडे श्रृंखला खेली जिसमें कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। भारत के खिलाफ घरेलू सरजमीं पर वनडे श्रृंखला में शिकस्त के बाद टीम पिछले महीने के मध्य में टेस्ट श्रृंखला के लिए पाकिस्तान लौटी थी। भारत के खिलाफ श्रृंखला का आयोजन भी जल्दबाजी में किया गया था। महेला जयवर्धने की टीम का दौरा अगर सफल रहता तो पाकिस्तान को क्रिकेट जगत को यह साबित करने में मदद मिलती कि देश खेलने के लिए सुरक्षित है। लेकिन श्रीलंकाई टीम पर हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय मेजबान के रूप में पाकिस्तान के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।

नीरज कुमार दुबे